भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 42
३२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ०का०
घनप्रज्ञ एव भवति; मनोव्यापाराभावात् । दर्शनस्मरणे एव हि मनःस्पन्दिते; तदभावे हृद्येवाविशेषेण प्राणात्मनावस्थानम् । "प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्ते" (छा० उ० ४।३।३) इति श्रुतेः। तैजसो हिरण्यगर्भो मनःस्थत्वात् । "लिङ्गं मनः" (बृ० उ० ४।४।६) । "मनोमयोऽयं पुरुषः" (बृ० उ० ५।६।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः ।कारण एकीभूत और घनप्रज्ञ ही हो जाता है। दर्शन और स्मरण ही मनका स्फुरण हैं, उनका अभाव हो जानेपर जो जीवका हृदयके भीतर ही निर्विशेष प्राणरूपसे स्थित होना है [वही जाग्रत्में सुषुप्ति है]। "प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन कर लेता है" इस श्रुतिसे यहाँ प्रमाणित होता है। मनःस्थित होनेके कारण तैजस ही हिरण्यगर्भ है।* "[सत्रह अवयववाला] लिङ्गरूप मन" "यह पुरुष¹ मनोमय है" इत्यादि श्रुतियोंसे भी [तैजस और हिरण्यगर्भकी एकता सिद्ध होती है]।
ननु व्याकृतः प्राणः सुषुप्ते । तदात्मकानि करणानि भवन्ति । कथमव्याकृतता ?शंका— सुषुप्तिमें भी प्राण तो व्याकृत (विशेषभावापन्न) ही होता है † तथा ['प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्ते' इस श्रुतिके अनुसार] इन्द्रियाँ भी प्राणरूप ही हो जाती हैं। फिर उसकी अव्याकृतता कैसे कही गयी?

* क्योंकि तैजसकी उपाधि व्यष्टि मन है और हिरण्यगर्भकी समष्टि मन तथा समष्टि-व्यष्टिका परस्पर अभेद है।
१-यहाँ हिरण्यगर्भको ही 'पुरुष' कहा गया है।
† क्योंकि सोये हुए पुरुषके पास बैठे हुए लोगोंको वह ऐसा ही दिखायी देता है।