माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ३२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ०का० |
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| घनप्रज्ञ एव भवति; मनोव्यापाराभावात् । दर्शनस्मरणे एव हि मनःस्पन्दिते; तदभावे हृद्येवाविशेषेण प्राणात्मनावस्थानम् । "प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्ते" (छा० उ० ४।३।३) इति श्रुतेः। तैजसो हिरण्यगर्भो मनःस्थत्वात् । "लिङ्गं मनः" (बृ० उ० ४।४।६) । "मनोमयोऽयं पुरुषः" (बृ० उ० ५।६।१) इत्यादिश्रुतिभ्यः । | कारण एकीभूत और घनप्रज्ञ ही हो जाता है। दर्शन और स्मरण ही मनका स्फुरण हैं, उनका अभाव हो जानेपर जो जीवका हृदयके भीतर ही निर्विशेष प्राणरूपसे स्थित होना है [वही जाग्रत्में सुषुप्ति है]। "प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन कर लेता है" इस श्रुतिसे यहाँ प्रमाणित होता है। मनःस्थित होनेके कारण तैजस ही हिरण्यगर्भ है।* "[सत्रह अवयववाला] लिङ्गरूप मन" "यह पुरुष¹ मनोमय है" इत्यादि श्रुतियोंसे भी [तैजस और हिरण्यगर्भकी एकता सिद्ध होती है]। |
| ननु व्याकृतः प्राणः सुषुप्ते । तदात्मकानि करणानि भवन्ति । कथमव्याकृतता ? | शंका— सुषुप्तिमें भी प्राण तो व्याकृत (विशेषभावापन्न) ही होता है † तथा ['प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्ते' इस श्रुतिके अनुसार] इन्द्रियाँ भी प्राणरूप ही हो जाती हैं। फिर उसकी अव्याकृतता कैसे कही गयी? |
* क्योंकि तैजसकी उपाधि व्यष्टि मन है और हिरण्यगर्भकी समष्टि मन तथा समष्टि-व्यष्टिका परस्पर अभेद है।
१-यहाँ हिरण्यगर्भको ही 'पुरुष' कहा गया है।
† क्योंकि सोये हुए पुरुषके पास बैठे हुए लोगोंको वह ऐसा ही दिखायी देता है।