माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| शां० भा० ] आगम-प्रकरण | २३ |
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| (सुषुप्तौ प्राणानामव्याकृतत्वम्) <br><br> नैष दोषः, अव्याकृतस्य देशकालविशेषाभावात्। यद्यपि प्राणाभिमाने सति व्याकृततैव प्राणस्य तथापि पिण्डपरिच्छिन्नविशेषाभिमाननिरोधः प्राणे भवतीत्यव्याकृत एव प्राणः सुषुप्ते परिच्छिन्नाभिमानवताम्। <br><br> यथा प्राणलये परिच्छिन्नाभिमानिनां प्राणोऽव्याकृतस्तथा प्राणाभिमानिनोऽप्यविशेषापत्तावव्याकृतता समाना प्रसवबीजात्मकत्वं च तदध्यक्षश्चैकोऽव्याकृतावस्थः। परिच्छिन्नाभिमानिनामध्यक्षाणां च तेनैकत्वमिति पूर्वोक्तं विशेषणमेकीभूतः प्रज्ञानघन इत्याद्युपपन्नम्। तस्मिन्नुक्तहेतुत्वाच्च। | समाधान— यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि अव्याकृत पदार्थमें देश-कालरूप विशेष भावका अभाव होता है। यद्यपि [ जैसा कि स्वप्नावस्थामें होता है ] प्राणका अभिमान रहते हुए तो उसकी व्याकृतता है ही तथापि सुषुप्तावस्थामें प्राणमें पिण्डपरिच्छिन्न विशेषका अभिमान [ अर्थात् यह मेरे शरीरसे परिच्छिन्न प्राण है—ऐसा अभिमान ] नहीं रहता; अतः परिच्छिन्नदेहाभिमानियोंके लिये भी उस समय वह अव्याकृत ही है। <br><br> जिस प्रकार प्राणका लय [ अर्थात् मृत्यु ] होनेपर परिच्छिन्न देहाभिमानियोंका प्राण अव्याकृतरूपमें रहता है उसी प्रकार प्राणाभिमानियोंको भी प्राणकी अविशेषता प्राप्त होनेपर उसकी अव्याकृतता और प्रसव-बीजरूपता वैसी ही है। अतः [ अव्याकृत और सुषुप्ति ] इन दोनों अवस्थाओंका साक्षी भी अव्याकृत अवस्थामें रहनेवाला एक ही [ चेतन आत्मा ] है। परिच्छिन्न देहोंके अभिमानी और उनके साक्षियोंकी उसके साथ एकता है; अतः [ प्राज्ञके लिये ] 'एकीभूतः प्रज्ञानघनः' आदि पूर्वोक्त विशेषण उचित ही हैं; विशेषतः इसलिये भी, क्योंकि इसमें [ अधिदैव अव्याकृत और अध्यात्म प्राज्ञकी एकतारूप ] उपर्युक्त हेतु भी विद्यमान है। |