माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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२४: माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| प्राणशब्दस्य बीजब्रह्मपरत्वम् | |
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| कथं प्राणशब्दत्वमव्याकृतस्य। | **शंका—**किन्तु अव्याकृत 'प्राण' शब्दवाच्य कैसे हुआ ? |
| "प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः" (छा० उ० ६।८।२) इति श्रुतेः। | समाधान—"हे सोम्य ! मन प्राणके ही अधीन है" इस श्रुतिके अनुसार। |
| ननु तत्र "सदेव सोम्य" (छा० उ० ६।२।१) इति प्रकृतं सद्ब्रह्म प्राणशब्दवाच्यम्। | **शंका—**किन्तु वहाँ तो "सदेव सोम्य" इस श्रुतिके अनुसार प्रसङ्ग-प्राप्त सद्ब्रह्म ही 'प्राण' शब्दका वाच्य है। |
| नैष दोषः, बीजात्मकत्वाभ्युपगमात्सतः। यद्यपि सद्ब्रह्म प्राणशब्दवाच्यं तत्र तथापि जीवप्रसवबीजात्मकत्वमपरित्यज्यैव प्राणशब्दत्वं सतः सच्छब्दवाच्यता च। यदि हि निर्बीजरूपं विवक्षितं ब्रह्माभविष्यत् "नेति नेति" (बृ० उ० ४।४।२२, ४।५।१५) "यतो वाचो निवर्तन्ते" (तै० उ० २।९) "अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितात्" (के० उ० १।३) इत्यवक्ष्यत् "न सत्तन्नासदुच्यते" (गीता १३।१२) इति स्मृतेः। | **समाधान—**वहाँ यह दोष नहीं हो सकता, क्योंकि [उस प्रसङ्गमें] सद्ब्रह्मकी बीजात्मकता स्वीकार की है। यद्यपि वहाँ 'प्राण' शब्दका वाच्य सद्ब्रह्म है तथापि जीवोंकी उत्पत्तिकी बीजात्मकताका त्याग न करते हुए ही उस सद्ब्रह्ममें प्राणशब्दत्व और 'सत्' शब्दका वाच्यत्व माना गया है। यदि वहाँ 'सत्' शब्दसे निर्बीजब्रह्म कहना इष्ट हो तो उसे "यह नहीं है, यह नहीं है" "जहाँसे वाणी लौट आती है" "वह विदितसे अन्य है और अविदितसे भी ऊपर है" इत्यादि प्रकारसे कहा जायगा, जैसा कि "वह न सत् कहा जाता है और न असत्" इस स्मृतिसे भी सिद्ध होता है। |