माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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श्रीगौडपादाचार्य भी संन्यासी ही थे। उनके शिष्य श्री-गोविन्दपादाचार्य थे और गोविन्दपादाचार्यके शिष्य भगवान् शङ्कराचार्य थे। शाङ्करसम्प्रदायमें जो आचार्यवन्दनात्मक मंगलाचरण प्रसिद्ध है उसमें आरम्भसे लेकर श्रीपद्मपादाचार्य आदि भगवान् शङ्करके शिष्योंपर्यन्त इस सम्प्रदायके आचार्योंकी शिष्य-परम्परा इस प्रकार बतलायी है—
नारायणं पद्मभवं वसिष्ठं शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च।
व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम् ॥
श्रीशङ्कराचार्यमथास्य पद्मपादञ्च हस्तामलकं च शिष्यम् ।
तं त्रोटकं वार्तिककारमन्यानस्मद्गुरून्सन्ततमानतोऽस्मि ॥*
इससे विदित होता है कि श्रीगौडपादाचार्य भगवान् शुकदेव-जीके शिष्य थे।
भगवान् गौडपादाचार्यके ग्रन्थोंमें उनकी कारिकाएँ जगत्प्रसिद्ध हैं। उनका एक ग्रन्थ श्रीउत्तरगीताका भाष्य भी है, जो वाणी-विलास प्रेस श्रीरंगम्से प्रकाशित हुआ है। उस भाष्यसे उनका महान् योगी होना सिद्ध होता है। इनके सिवा उनका रचा हुआ एक सांख्यकारिकाओंका भाष्य भी प्रसिद्ध है। परन्तु वह उनका रचा है या नहीं—इस विषयमें विद्वानोंका मतभेद है। अस्तु, हमें तो इस समय उनकी कारिकाओंपर ही कुछ विचार करना है।
कारिकाओंकी रचना बड़ी ही उदात्त और मर्मस्पर्शिनी है। उनकी गणना संसारके सर्वोत्कृष्ट साहित्यमें हो सकती है। यह तो ऊपर कहा ही जा चुका है कि वे अद्वैतसिद्धान्तकी आधारशिला हैं। जिस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीताके विषयमें यह प्रसिद्ध है कि ‘गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैश्शास्त्रविस्तरैः’ उसी प्रकार अद्वैत-बोधके लिये यह दृढ़तापूर्वक कहा जा सकता है कि एकमात्र इस ग्रन्थरत्नका सावधानीपूर्वक किया हुआ अनुशीलन ही पर्याप्त हो सकता है। इसमें साधन, सिद्धान्त, परमतनिराकरण और स्वमत-
*शाङ्करसम्प्रदायमें शास्त्राध्ययनसे पूर्व आचार्य और शिष्यगण इस मंगलाचरणका उच्चारण किया करते हैं।