भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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संस्थापन-सभोंका शास्त्रसम्मत सयुक्तिक वर्णन किया गया है। यह एक ही ग्रन्थ मुमुक्षुओंको परमपदकी प्राप्ति करा सकता है।

इस ग्रन्थमें चार प्रकरण हैं। उनमें क्रमशः २९, ३८, ४८ और १०० इस प्रकार कुल २१५ कारिकाएँ हैं। पहला आगमप्रकरण है। इसमें सम्पूर्ण माण्डूक्योपनिषद् और उसकी व्याख्याभूत कारिकाओं- के सिवा जगदुत्पत्तिके अनेकों प्रयोजनोंका वर्णन करके उनका खण्डन किया गया है। कोई भगवान्‌की इच्छामात्रको सृष्टिमें हेतु मानते हैं, कोई कालसे भूतोंकी उत्पत्ति मानते हैं, कोई भोगके लिये सृष्टि स्वीकार करते हैं और कोई क्रीडाके लिये जगत्‌की उत्पत्ति मानते हैं। इन सब पक्षोंको अस्वीकार करते हुए भगवान् कारिका- कार कहते हैं—‘देवस्यैष स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहा’ (१।९) अर्थात् पूर्णकाम भगवान्‌को सृष्टिका कोई प्रयोजन नहीं है; यह तो उनका स्वभाव ही है। अतः यह जो कुछ प्रपञ्च है बिना हुआ ही भास रहा है। परमार्थदर्शियोंका इसके प्रति आदर नहीं होता।

माण्डूक्योपनिषद्में ओंकारकी तीन मात्रा अ उ म के द्वारा स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरके अभिमानी विश्व, तैजस और प्राज्ञ- का वर्णन करते हुए उनका समष्टि-अभिमानी वैश्वानर, हिरण्यगर्भ एवं ईश्वरके साथ अभेद किया गया है। इनकी अभिव्यक्तिकी अवस्थाएँ क्रमशः जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति हैं तथा इनके भोग स्थूल सूक्ष्म और आनन्द हैं। जाग्रत् अवस्थामें जीव दक्षिण नेत्रमें रहता है, स्वप्नावस्थामें कण्ठमें और सुषुप्तिके समय हृदयमें रहता है। इसीका नाम प्रपञ्च है। परमार्थतत्त्व इस सबसे विलक्षण, इसमें अनुगत तथा इसका अधिष्ठान और साक्षी है। उसे ओंकारके चतुर्थ- पाद अमात्र तुरीयात्मरूपसे वर्णन किया गया है। कोई भी भ्रम बिना अधिष्ठानके नहीं हो सकता; अतः इस प्रपञ्चभ्रमका भी कोई अधिष्ठान होना चाहिये। वह अधिष्ठान तुरीय ही है। तुरीय नित्य, शुद्ध, ज्ञानस्वरूप, सर्वात्मा और सर्वसाक्षी है। वह प्रकाशस्वरूप है; उसमें अन्यथाग्रहणरूप स्वप्न और तत्त्वाग्रहणरूप सुषुप्तिका सर्वथा अभाव है। जिस समय अनादिमायासे सोया हुआ जीव जगता है उसी समय उसे इस अजन्मा तथा स्वप्न और निद्रासे रहित अद्वैत-