माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
पृष्ठ 6, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ४ ]
तत्त्वका बोध होता है। इसी बातको आचार्यप्रवर गौडपाद इस प्रकार कहते हैं—
अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते । अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुध्यते तदा ॥ ( १ । १६ )
इस प्रकार आगमप्रकरणमें वस्तुका निर्देश कर जीव और ब्रह्मकी एकता तथा प्रपञ्चका मायामयत्व प्रतिपादित करते हुए वैतथ्यप्रकरणमें उसीको युक्ति और उपपत्तिपूर्वक पुष्ट किया है। वहाँ सबसे पहले स्वप्नदृश्यका मिथ्यात्व प्रतिपादन किया है; क्योंकि स्वप्नकी उपलब्धि देहके भीतर किसी नाडीविशेषमें होती है, जिसमें स्थानाभावके कारण पर्वत और हाथी आदिका होना सर्वथा असम्भव है। स्वप्नावस्थामें जीव देहसे बाहर जाकर स्वाप्न पदार्थोंको देखता हो—यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि एक क्षणमें ही सैकड़ों योजन दूरके पदार्थ दिखायी देने लगते हैं और उस अवस्थामें जिन व्यक्तियोंसे वह मिलता है, जाग जानेपर वे ऐसा नहीं कहते कि हमने तुम्हें देखा था। इसी प्रकार तरह-तरहकी युक्तियोंसे स्वप्नका मिथ्यात्व सिद्धकर उससे दृश्यत्वमें समानता होनेके कारण जाग्रत्कालीन दृश्यका भी मिथ्यात्व प्रतिपादन किया है। वहाँ यह बतलाया गया है कि जिस प्रकार स्वप्नावस्थामें चित्तमें कल्पना किये हुए पदार्थ असत्य और बाहर देखे जानेवाले पदार्थ सत्य जान पड़ते हैं किन्तु वस्तुतः वे दोनों ही असत्य हैं उसी प्रकार जाग्रदवस्थामें भी मानसिक और इन्द्रियग्राह्य दोनों ही प्रकारके पदार्थ असत्य हैं। इस प्रकार जाग्रत् और स्वप्न दोनों ही अवस्थाओंका मिथ्यात्व सिद्ध होनेपर यह प्रश्न होता है कि इन चित्तपरिकल्पित और बाह्य दृश्योंको देखता कौन है? इसके उत्तरमें कारिकाकार कहते हैं—
कल्पयत्यात्मनाऽऽत्मानमात्मा देवः स्वमायया । स एव बुध्यते भेदानिति वेदान्तनिश्चयः ॥ ( २ । १२ )
इस प्रकार भगवान् गौडपादाचार्यके मतमें प्रपञ्चकी प्रतीति मायाके ही कारण है। मायाकी महिमासे ही आत्मदेव अव्यक्त