माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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वासनारूपसे स्थित भेदसमूहको व्यक्त करता है। यह माया न सत् है न असत् है और न सदसत् है; न भिन्न है न अभिन्न है और न भिन्नाभिन्न है; यह न सावयव है न निरवयव है और न उभयरूप है। वस्तुतः स्वरूप-विस्मृति ही माया है; अतः स्वरूपज्ञानसे ही उसकी निवृत्ति होती है। जिस प्रकार मन्द अन्धकारमें रज्जुतत्त्वका निश्चय न होनेपर उसमें सर्प, धारा, सूच्छिद्र आदि अनेक प्रकारके विकल्प हो जाते हैं किन्तु रज्जुका ज्ञान होनेपर एकमात्र रज्जु ही रह जाती है उसी प्रकार मायामोहित जीवको ही भेदप्रपञ्चकी भ्रान्ति हो रही है; मायाका पर्दा हटते ही एकमात्र अखण्ड अद्वैत वस्तु ही अवशिष्ट रह जाती है।
इसके आगे आचार्यने प्राणात्मवाद, भूतात्मवाद, गुणात्मवाद, तत्त्वात्मवाद, पादात्मवाद, विषयात्मवाद, लोकात्मवाद, देवात्मवाद, वेदात्मवाद और यज्ञात्मवाद आदि अनेकों मतवादोंका उल्लेख किया है। वहाँ वे कहते हैं कि लोकमें गुरु जिसको जिस भावकी शिक्षा दे देते हैं वह तन्मय भावसे उसी भावका आग्रह करने लगता है और अन्तमें उसे उसी भावकी प्राप्ति हो जाती है; किन्तु जो इन विभिन्न भावोंसे लक्षित इनके अधिष्ठानभूत अद्वितीय आत्मतत्त्वको जानता है वह निःशङ्क होकर वेदार्थकी कल्पना कर सकता है, अर्थात् इन सब भावोंकी संगति लगा सकता है। वस्तुतः तो जैसे स्वप्न, माया और गन्धर्वनगर होते हैं वैसा ही विज्ञजन इन प्रपञ्चको देखते हैं। तो फिर परमार्थ क्या है ? इसका उत्तर आचार्यने इस कारिकासे दिया है—
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥
( २।३२ )
तात्पर्य यह है कि एक अखण्ड चिद्घन वस्तुको छोड़कर उत्पत्ति, प्रलय, बद्ध, साधक, मुमुक्षु और मुक्त किसी भी प्रकारका व्यवहार नहीं है। यह तत्त्व अत्यन्त दुर्दर्श है, क्योंकि निरन्तर व्यवहारमें ही रहनेवाले व्यावहारिक जीवकी दृष्टि इस व्यवहारातीत वस्तुतक पहुँचनी बहुत ही कठिन है। जिन वेदके पारगामी मुनि-