माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
पृष्ठ 8, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ६ ]
जनोंके राग, भय और क्रोधादि विकार सर्वथा निवृत्त हो गये हैं उन्हींको इस प्रपञ्चातीत अद्वय पदका बोध होता है। इसका बोध हो जानेपर वह महात्मा सर्वथा निर्द्वन्द्व और निर्भय हो जाता है तथा स्तुति, नमस्कार और स्वधाकारादि व्यवहारकोटिसे ऊँचा उठकर वह देह और आत्मामें ही विश्राम करनेवाला एवं यदृच्छालाभसन्तुष्ट हो जाता है। फिर बाहर-भीतर इसी तत्त्वको ओतप्रोत देख वह तत्त्वमय हो जानेसे उसीमें रमण करता हुआ कभी तत्त्वच्युत नहीं होता।
इस प्रकार वैतथ्यप्रकरणमें युक्तिपूर्वक द्वैताभावका प्रतिपादन कर फिर आगमप्रकरणमें शास्त्रप्रमाणसे सिद्ध हुए अद्वैततत्त्वको युक्तिद्वारा सिद्ध करनेके लिये अद्वैतप्रकरणका आरम्भ किया गया है। वहाँ आरम्भमें ही यह बतलाया गया है कि 'मेरा उपास्य अन्य है और मैं अन्य हूँ', इस प्रकारका उपासनाश्रित धर्म जातब्रह्म (कार्यब्रह्म) में है; किन्तु उत्पत्तिसे पूर्व यह सारा जगत् अजन्मा ब्रह्म ही है। अतः कार्यब्रह्मपरायण होनेके कारण यह उपासक कृपण ही है। केनोपनिषद्में भी कई पर्यायोंमें मन वाणी और प्राणादिके साक्षीको ही ब्रह्म बतलाकर 'नेदं यदिदमुपासते' इस वाक्यसे उपास्यका अब्रह्मत्व प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार कार्पण्यका निर्देश कर 'अजातिसमतां गतम्' अर्थात् समभावमें स्थित अजाति—अजन्मा वस्तु ही अकार्पण्य है—ऐसा कहा है। इसके पश्चात् घटाकाशादिके दृष्टान्तसे औपाधिक भेदका उल्लेख करते हुए आकाशस्थानीय आत्मतत्त्वकी अनुत्पत्ति और असंगताका प्रतिपादन किया है। वहाँ यह बतलाया है कि जिस प्रकार एक घटाकाशके धूम और धूलि आदिसे व्याप्त होनेपर अन्य समस्त घटाकाश उससे विकृत नहीं होते उसी प्रकार एक जीवके सुख-दुःखसे समस्त जीव सुखी या दुःखी नहीं होते; और वस्तुतः तो धूलि आदिसे आकाशका संसर्ग ही नहीं होता। इसी प्रकार आत्माका भी सुख-दुःखादिसे कभी सम्पर्क नहीं होता। जीवके मरण, उत्पत्ति, गमन, आगमन और स्थिति आदिसे भी आत्मामें कोई विलक्षणता नहीं होती; क्योंकि सारे संघात स्वप्नके समान आत्माकी