माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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वासनारूपसे स्थित भेदसमूहको व्यक्त करता है। यह माया न सत् है न असत् है और न सदसत् है; न भिन्न है न अभिन्न है और न भिन्नाभिन्न है; यह न सावयव है न निरवयव है और न उभयरूप है। वस्तुतः स्वरूप-विस्मृति ही माया है; अतः स्वरूपज्ञानसे ही उसकी निवृत्ति होती है। जिस प्रकार मन्द अन्धकारमें रज्जुतत्त्वका निश्चय न होनेपर उसमें सर्प, धारा, सूच्छिद्र आदि अनेक प्रकारके विकल्प हो जाते हैं किन्तु रज्जुका ज्ञान होनेपर एकमात्र रज्जु ही रह जाती है उसी प्रकार मायामोहित जीवको ही भेदप्रपञ्चकी भ्रान्ति हो रही है; मायाका पर्दा हटते ही एकमात्र अखण्ड अद्वैत वस्तु ही अवशिष्ट रह जाती है।
इसके आगे आचार्यने प्राणात्मवाद, भूतात्मवाद, गुणात्मवाद, तत्त्वात्मवाद, पादात्मवाद, विषयात्मवाद, लोकात्मवाद, देवात्मवाद, वेदात्मवाद और यज्ञात्मवाद आदि अनेकों मतवादोंका उल्लेख किया है। वहाँ वे कहते हैं कि लोकमें गुरु जिसको जिस भावकी शिक्षा दे देते हैं वह तन्मय भावसे उसी भावका आग्रह करने लगता है और अन्तमें उसे उसी भावकी प्राप्ति हो जाती है; किन्तु जो इन विभिन्न भावोंसे लक्षित इनके अधिष्ठानभूत अद्वितीय आत्मतत्त्वको जानता है वह निःशङ्क होकर वेदार्थकी कल्पना कर सकता है, अर्थात् इन सब भावोंकी संगति लगा सकता है। वस्तुतः तो जैसे स्वप्न, माया और गन्धर्वनगर होते हैं वैसा ही विज्ञजन इन प्रपञ्चको देखते हैं। तो फिर परमार्थ क्या है ? इसका उत्तर आचार्यने इस कारिकासे दिया है—
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः ।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥
( २।३२ )
तात्पर्य यह है कि एक अखण्ड चिद्घन वस्तुको छोड़कर उत्पत्ति, प्रलय, बद्ध, साधक, मुमुक्षु और मुक्त किसी भी प्रकारका व्यवहार नहीं है। यह तत्त्व अत्यन्त दुर्दर्श है, क्योंकि निरन्तर व्यवहारमें ही रहनेवाले व्यावहारिक जीवकी दृष्टि इस व्यवहारातीत वस्तुतक पहुँचनी बहुत ही कठिन है। जिन वेदके पारगामी मुनि-
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जनोंके राग, भय और क्रोधादि विकार सर्वथा निवृत्त हो गये हैं उन्हींको इस प्रपञ्चातीत अद्वय पदका बोध होता है। इसका बोध हो जानेपर वह महात्मा सर्वथा निर्द्वन्द्व और निर्भय हो जाता है तथा स्तुति, नमस्कार और स्वधाकारादि व्यवहारकोटिसे ऊँचा उठकर वह देह और आत्मामें ही विश्राम करनेवाला एवं यदृच्छालाभसन्तुष्ट हो जाता है। फिर बाहर-भीतर इसी तत्त्वको ओतप्रोत देख वह तत्त्वमय हो जानेसे उसीमें रमण करता हुआ कभी तत्त्वच्युत नहीं होता।
इस प्रकार वैतथ्यप्रकरणमें युक्तिपूर्वक द्वैताभावका प्रतिपादन कर फिर आगमप्रकरणमें शास्त्रप्रमाणसे सिद्ध हुए अद्वैततत्त्वको युक्तिद्वारा सिद्ध करनेके लिये अद्वैतप्रकरणका आरम्भ किया गया है। वहाँ आरम्भमें ही यह बतलाया गया है कि 'मेरा उपास्य अन्य है और मैं अन्य हूँ', इस प्रकारका उपासनाश्रित धर्म जातब्रह्म (कार्यब्रह्म) में है; किन्तु उत्पत्तिसे पूर्व यह सारा जगत् अजन्मा ब्रह्म ही है। अतः कार्यब्रह्मपरायण होनेके कारण यह उपासक कृपण ही है। केनोपनिषद्में भी कई पर्यायोंमें मन वाणी और प्राणादिके साक्षीको ही ब्रह्म बतलाकर 'नेदं यदिदमुपासते' इस वाक्यसे उपास्यका अब्रह्मत्व प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार कार्पण्यका निर्देश कर 'अजातिसमतां गतम्' अर्थात् समभावमें स्थित अजाति—अजन्मा वस्तु ही अकार्पण्य है—ऐसा कहा है। इसके पश्चात् घटाकाशादिके दृष्टान्तसे औपाधिक भेदका उल्लेख करते हुए आकाशस्थानीय आत्मतत्त्वकी अनुत्पत्ति और असंगताका प्रतिपादन किया है। वहाँ यह बतलाया है कि जिस प्रकार एक घटाकाशके धूम और धूलि आदिसे व्याप्त होनेपर अन्य समस्त घटाकाश उससे विकृत नहीं होते उसी प्रकार एक जीवके सुख-दुःखसे समस्त जीव सुखी या दुःखी नहीं होते; और वस्तुतः तो धूलि आदिसे आकाशका संसर्ग ही नहीं होता। इसी प्रकार आत्माका भी सुख-दुःखादिसे कभी सम्पर्क नहीं होता। जीवके मरण, उत्पत्ति, गमन, आगमन और स्थिति आदिसे भी आत्मामें कोई विलक्षणता नहीं होती; क्योंकि सारे संघात स्वप्नके समान आत्माकी
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मायासे ही कल्पित हैं। अतः आत्मा एक, अखण्ड, अजन्मा और निर्लेप है, इसीसे 'एकमेवाद्वितीयम्' 'इदं सर्वं यदयमात्मा' तथा 'द्वितीयाद्वै भयं भवति' 'उदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति' आदि श्रुतियोंसे अभेद दृष्टिकी प्रशंसा और भेददृष्टिकी निन्दा की गयी है। छान्दोग्योपनिषद्में मृत्तिका-घट, अग्नि-विस्फुलिंग और लोह-नखनिकृन्तनादि दृष्टान्तोंसे जो सृष्टिका वर्णन किया गया है वह जिज्ञासुकी बुद्धिमें प्रपञ्चका ब्रह्मके साथ अभेद बिठानेके लिये है; वस्तुतः प्रपञ्चभेद सिद्ध करनेके लिये नहीं है। अतः सिद्धान्त यही है कि जो कुछ भेद है वह व्यवहारदृष्टिसे है, परमार्थतः उसकी गन्ध भी नहीं है। यदि वास्तविक भेद माना जाय तो परमार्थतत्त्व उत्पत्तिशील सिद्ध होगा और इस प्रकार परिणामी होनेके कारण वह नित्य नहीं हो सकता। इसके सिवा यदि विचार किया जाय तो न तो सद्वस्तुका जन्म हो सकता है और न असत्का ही, क्यों-कि जो है ही उसका जन्म क्या होगा और जो शशशृङ्गके समान असत् है उसकी भी कैसे उत्पत्ति हो सकती है। अतः यह सारा द्वैत मनोदृश्यमात्र है मनके अमनीभावको प्राप्त होते ही द्वैतकी तनिक भी उपलब्धि नहीं होती।
इस प्रकार आत्मसत्यका बोध होनेपर जिस समय चित्त-संकल्प नहीं करता उसी समय मन अमनस्ताको प्राप्त हो जाता है। उसका यह अग्रह निरोधजनित नहीं होता बल्कि ग्राह्य वस्तुका अभाव होनेके कारण होता है। इसीको ब्रह्माकारवृत्ति या वृत्ति-व्याप्ति भी कहते हैं। उस अवस्थाका कारिकाकारने तैंतीससे लेकर अड़तीसवीं कारिकातक बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है। यही बोध-स्थिति है, इसीके लिये जिज्ञासुका सारा प्रयत्न होता है और इसी स्थितिको प्राप्त होनेपर मनुष्य कृतकृत्य होता है। कारिकाकारने इसे 'अस्पर्शयोग' कहा है। इस अभयस्थितिसे अन्य योगिजन भय मानते हैं क्योंकि यहाँ अहंकारका अत्यन्ताभाव होनेके कारण उन्हें आत्मनाश दिखायी देता है। यह योग केवल उत्तम अधिकारियोंके लिये है, जिनका इसमें प्रवेश नहीं है उनकी अभयस्थिति दुःखक्षय, बोध और अक्षयशान्ति मनोनिग्रहके अधीन है। वह मनोनिग्रह
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भी बड़े धीर-वीरका काम है उसके लिये अत्यन्त उत्साह, अनवरत अध्यवसाय और परम धैर्यकी आवश्यकता है। उसमें नाना प्रकारके विघ्न आते हैं। भगवान् कारिकाकारने बयालीससे लेकर पैंतालीसवीं कारिकातक उन विघ्नोंकी निवृत्तिके उपाय बतलाये हैं। उनके अनुसार साधन करते-करते जब चित्त निरुद्ध हो जाता है तो बोधका उदय होता है। उस स्थितिका वर्णन आचार्यने श्लोक ४६ और ४७ में किया है। इस प्रकार अद्वैततत्त्व और उसकी उपलब्धिके साधनोंका विवेचन कर उन्होंने निम्नलिखित श्लोकसे इस प्रकरणका उपसंहार करते हुए अपना सिद्धान्त स्थापित किया है—
न कश्चिज्जायते जीवः सम्भवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥
(३।४८)
इसके पश्चात् अलातशान्ति नामक चौथे प्रकरणमें आचार्यने अन्य मतालम्बियोंके पारस्परिक मतभेद दिखलाते हुए उन्हींकी युक्तियोंसे उनका खण्डन किया है। 'अलात' शब्दका अर्थ उल्का या मसाल है। मसालको घुमानेपर अग्निकी तरह-तरहकी आकृतियाँ दिखायी देती हैं और उसका घुमाना बन्द करते ही उनका दिखायी देना बन्द हो जाता है। यदि विचार किया जाय तो वस्तुतः वे मसालसे न तो निकलती हैं, न उसमें लीन होती हैं और न कहीं अन्यत्रसे ही उनका आना-जाना होता है। उनकी प्रतीति केवल मसालके स्पन्दनका ही फल है, वस्तुतः उनकी सत्ता नहीं है। इसी प्रकार यह दृश्य प्रपञ्च केवल मनके स्पन्दनके कारण प्रतीत होता है और मनके अमनीभावको प्राप्त होते ही न जाने कहाँ चला जाता है। किन्तु ये प्रपञ्चकी प्रतीति और अप्रतीति दोनों ही भ्रान्तिजनित हैं; परमार्थदृष्टिसे न उसकी उत्पत्ति होती है और न लय। इस भ्रान्तिका आधार परब्रह्म है, क्योंकि कोई भी भ्रान्ति निराधार नहीं हो सकती। अतः रज्जुमें सर्प अथवा शुक्तिमें रजतके समान परब्रह्ममें ही इस प्रपञ्चभ्रमकी प्रतीति हो रही है। यही इस प्रकरणका संक्षिप्त तात्पर्य है। इस प्रकरणमें आचार्यने सद्वाद, असद्वाद, बीजाङ्कुरसन्ततिवाद, विज्ञानवाद एवं शून्यवाद आदि सभी विपक्षी मतों-
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का खण्डन करके अजातवादकी स्थापना की है। वे एक ही कारिका- में सारे पक्षोंकी अनुपपत्ति दिखलाते हुए कहते हैं—
स्वतो वा परतो वापि न किञ्चिद्वस्तु जायते । सदसत्सदसद्वापि न किञ्चिद्वस्तु जायते । ( ४ । २२ )
अर्थात् कोई भी वस्तु न तो अपनेसे उत्पन्न हो सकती है और न किसी अन्यसे ही। जो घट अभीतक तैयार नहीं हुआ उससे वही घट कैसे उत्पन्न होगा ? तथा तैयार हुए घटसे भी कोई अन्य घट अथवा पट कैसे उत्पन्न होगा ? यही नहीं, सत् असत् अथवा सदसत्-रूपसे भी कोई वस्तु उत्पन्न नहीं हो सकती। जो वस्तु है उसकी उत्पत्ति क्या होगी और जिसका अत्यन्ताभाव है उसकी भी कहाँसे उत्पत्ति होगी ? तथा जो है और नहीं भी है ऐसी तो कोई वस्तु ही होनी सम्भव नहीं है। अतः किसी भी प्रकार किसी वस्तुकी उत्पत्ति सिद्ध नहीं होती । इसी प्रकार, कुछ आगे चलकर वे सब प्रकारके कार्य- कारणभावकी अनुपपत्ति दिखलानेके लिये कहते हैं—
नास्त्यसद्धेतुकमसत्सत्सदसद्धेतुकं तथा । सच्च सद्धेतुकं नास्ति सद्धेतुकमसत्कुतः ॥ ( ४ । ४० )
अर्थात् न तो आकाशकुसुमादि असत् कारणवाला कोई आकाशकुसुमादिरूप असत् पदार्थ हो सकता है और न ऐसे असत्कारणसे कोई सद्वस्तु ही उत्पन्न हो सकती है । इसी प्रकार घटादि सत्पदार्थ भी किसी अन्य सत्पदार्थके कारण नहीं हो सकते; फिर उनसे कोई असत्पदार्थ उत्पन्न होगा—ऐसी तो सम्भावना ही कहाँ है ?
इस प्रकार अनेकों युक्तियोंसे जिसे जन्मके निमित्तभूत द्वैतका अत्यन्ताभाव अनुभव हो गया है और जिसने कार्य-कारणभावशून्य परमार्थतत्त्वको जान लिया है वही सब प्रकारके शोक और संकल्प- से मुक्त होकर अभयपद प्राप्त करता है । उसकी स्थितिका वर्णन करते हुए आचार्य कहते हैं—
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निवृत्तस्याप्रवृत्तस्य निश्चला हि तदा स्थितिः । विषयः स हि बुद्धानां तत्साम्यमजमद्वयम् ॥ (४।८०)
अजमनिद्रमस्वप्नं प्रभातं भवति स्वयम् । सकृद्विभातो ह्येवैष धर्मो धातुस्वभावतः ॥ (४।८१)
इस प्रकार उस निरालम्ब स्थितिका वर्णन कर भगवान् गौड-पादाचार्य कहते हैं कि जिस-जिस धर्मका आग्रह हो जानेसे वह सर्वविशेषशून्य परमार्थतत्त्व अनायास ही आच्छादित हो जाता है और फिर वह पर्दा बड़ी कठिनतासे हटता है। इसीसे यह भगवान् अत्यन्त दुर्दर्श है। इसे आच्छादित करनेवाली कौन-कौनसी कोटियाँ हैं—उनका दिग्दर्शन करानेके लिये वे कहते हैं—
अस्ति नास्त्यस्ति नास्तीति नास्ति नास्तीति वा पुनः । चलस्थिरोभयाभावैरावृणोत्येव बालिशः ॥ (४।८३)
अर्थात् कोई कहते हैं भगवान् 'है', कोई कहते हैं 'नहीं है' किन्हींका मत है 'है और नहीं भी है' और कोई कहते हैं 'नहीं है, नहीं है'। इनमें अस्ति-भाव चल है, क्योंकि वह घटादि अनित्य पदार्थोंसे विलक्षण है; नास्तिभाव स्थिर है, कारण उसमें कोई विशेषता नहीं है; अस्ति-नास्तिभाव (सदसद्वाद) उभयरूप है और नास्ति-नास्तिभाव अभावरूप है। भगवान् इन सभी भावोंसे विलक्षण हैं, क्योंकि ये सभी व्यवहारकोटिके अन्तर्गत हैं। उस सर्वभावातीत भगवान्को जो जानता है वही सर्वज्ञ है—सर्वज्ञ इसलिये, कि वह सारे प्रपञ्चके अधिष्ठानको जानता है और जो अधिष्ठानको जानता है उसे अध्यस्तवर्गकी असलियतका ज्ञान है ही। जिसे ऐसा ज्ञान है उस अद्वयब्राह्मपदमें स्थित हुए महात्माके लिये फिर कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहता। उसका शम-दम आदि सात्त्विक व्यवहार भी लोकसंग्रहके लिये केवल लीलामात्र होता है। वस्तुतः उनकी गहनगतिका अवगाहन करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। उन्हींकी अलौकिक स्थितिको लक्ष्यमें रखकर भगवान्ने श्रीमद्भगवद्गीतामें कहा है—
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या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥
(२।६९)
जो संसार संसारी पुरुषोंकी दृष्टिमें ध्रुवसत्य है उसका वे अत्यन्ताभाव देखते हैं और जिस अखण्ड चिद्धनसत्तामें उनकी अविचल स्थिति रहती है उसतक बहिर्दशीं अविवेकियोंकी दृष्टि नहीं पहुँच सकती। इसीसे उनकी दृष्टिमें दिन-रातका अन्तर बतलाया गया है।
इस प्रकार समस्त वादियोंकी कुदृष्टियोंका खण्डन कर आचार्य-ने एक अद्वय अखण्ड तत्त्वको स्थापित किया है, और अन्तमें उसी-की वन्दना करते हुए ग्रन्थका उपसंहार किया है। वहाँ वे कहते हैं—
दुर्दर्शमतिगम्भीरमजं साम्यं विशारदम् ।
बुद्ध्वा पदमनानात्वं नमस्कुर्मो यथाबलम् ॥
(४।१००)
इन कारिकाओंके द्वारा भगवान् गौडपादाचार्यने अजातवादकी स्थापना की है। इस सिद्धान्तको ग्रहण करनेके लिये बहुत ऊँचे अधिकारकी आवश्यकता है। जो सब प्रकार साधनसम्पन्न हैं वे उच्चाधिकारी ही इसे ठीक-ठीक हृदयंगम कर सकते हैं। जिनके चित्त कुछ भी विषयप्रवण हैं वे इससे अधिक लाभ न उठा सकेंगे—इतना ही नहीं, अपि तु उन्हें हानि होनेकी भी सम्भावना है। यह तत्त्व अत्यन्त दुर्बोध है—ऐसा तो स्वयं आचार्यचरणने ही कह दिया है—'दुर्दर्शमतिगम्भीरम्'। किन्तु जिस महाभाग महापुरुष-की दृष्टि इस परमतत्त्वतक पहुँच जाती है उसके लिये फिर कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता। वह स्वयं जीवन्मुक्त हो जाता है और दूसरे अधिकारी पुरुषोंको भी भवबन्धनसे मुक्त कर देता है। वह महामुनि सबका वन्दनीय है, सबका गुरु है और सभीका परम सुहृद् है। भगवान् हमें ऐसे महापुरुषोंके चरणकमलोंका आश्रय देकर हमारे संसारतापसन्तप्त अन्तःकरणोंको शान्ति प्रदान करें।
—अनुवादक
श्रीहरिः
विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १. शान्तिपाठ | ... ... १ |
आगमप्रकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| २. भाष्यकारका मङ्गलाचरण | ... ... २ |
| ३. सम्बन्धभाष्य | ... ... ३ |
| ४. ॐ ही सब कुछ है | ... ... ६ |
| ५. ओंकारवाच्य ब्रह्मकी सर्वात्मकता | ... ... ८ |
| ६. आत्माका प्रथम पाद—वैश्वानर | ... ... १० |
| ७. आत्माका द्वितीय पाद—तैजस | ... ... १३ |
| ८. आत्माका तृतीय पाद—प्राज्ञ | ... ... १५ |
| ९. प्राज्ञका सर्वकारणत्व | ... ... १८ |
| १०. एक ही आत्माके तीन भेद | ... ... १९ |
| ११. विश्वादिके विभिन्न स्थान | ... ... २० |
| १२. विश्वादिका त्रिविध भोग | ... ... २६ |
| १३. त्रिविध भोक्ता और भोग्यके ज्ञानका फल | ... ... २६ |
| १४. प्राण ही सबकी सृष्टि करता है | ... ... २७ |
| १५. सृष्टिके विषयमें भिन्न-भिन्न विकल्प | ... ... २९ |
| १६. चतुर्थ पादका विवरण | ... ... ३२ |
| १७. तुरीयका स्वरूप | ... ... ३५ |
| १८. तुरीयका प्रभाव | ... ... ४२ |
| १९. विश्व और तैजससे तुरीयका भेद | ... ... ४३ |
| २०. प्राज्ञसे तुरीयका भेद | ... ... ४४ |
| २१. तुरीयका स्वप्न-निद्राशून्यत्व | ... ... ४६ |
| २२. बोध कब होता है ? | ... ... ४८ |
| २३. प्रपञ्चका अत्यन्ताभाव | ... ... ५० |
| २४. गुरु-शिष्यादि विकल्प व्यावहारिक है | ... ... ५१ |
| २५. आत्मा और उसके पादोंके साथ ओंकार और उसकी मात्राओंका तादात्म्य | ... ... ... ५२ |
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विषय पृष्ठ
२६. अकार और विश्वका तादात्म्य ... ... ५३ २७. उकार और तैजसका तादात्म्य ... ... ५४ २८. मकार और प्राज्ञका तादात्म्य ... ... ५६ २९. मात्राओंकी विश्वादिरूपता ... ... ५७ ३०. ओंकारोपासकका प्रभाव ... ... ५९ ३१. ओंकारकी व्यस्तोपासनाके फल ... ... ५९ ३२. अमात्र और आत्माका तादात्म्य ... ... ६० ३३. समस्त और व्यस्त ओंकारोपासना ... ... ६२ ३४. ओंकारार्थज्ञ ही मुनि है ... ... ६५
वैतथ्यप्रकरण
३५. स्वप्नदृष्ट पदार्थोंका मिथ्यात्व ... ... ६७ ३६. जाग्रद्दृश्य पदार्थोंके मिथ्यात्वमें हेतु ... ... ७१ ३७. स्वप्नमें मनःकल्पित और इन्द्रियग्राह्य दोनों ही प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं ... ... ... ७६ ३८. जाग्रत्में भी दोनों प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं ... ७७ ३९. इन मिथ्या पदार्थोंकी कल्पना करनेवाला कौन है ? ... ७८ ४०. इनकी कल्पना करनेवाला और इनका साक्षी आत्मा ही है ... ७९ ४१. पदार्थकल्पनाकी विधि ... ... ७९ ४२. आन्तरिक और बाह्य दोनों प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं ... ८० ४३. आन्तरिक और बाह्य पदार्थोंका भेद केवल इन्द्रियजनित है ... ८२ ४४. पदार्थकल्पनाकी मूल जीवकल्पना है ... ... ८३ ४५. जीवकल्पनाका हेतु अज्ञान है ... ... ८४ ४६. अज्ञाननिवृत्ति ही आत्मज्ञान है ... ... ८५ ४७. विकल्पकी मूल माया है ... ... ८६ ४८. मूलतत्त्वसम्बन्धी विभिन्न मतवाद ... ... ८७ ४९. आत्मा सर्वाधिष्ठान है ऐसा जाननेवाला ही परमार्थदर्शी है ... ९१ ५०. द्वैतका असत्यत्व वेदान्तवेद्य है ... ... ९२ ५१. परमार्थ क्या है ? ... ... ९४ ५२. अद्वैतभाव ही मङ्गलमय है ... ... १०० ५३. तत्त्ववेत्ताकी दृष्टिमें नानात्वका अत्यन्ताभाव है ... १०१ ५४. इस रहस्यके साक्षी कौन थे ? ... ... १०३
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| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ५५. तत्त्वदर्शनका आदेश | ... ... १०४ |
| ५६. तत्त्वदर्शीका आचरण | ... ... १०४ |
| ५७. अविचल तत्त्वनिष्ठाका विधान | ... ... १०६ |
अद्वैतप्रकरण
५८. भेददर्शी कृपण है | ... ... १०८ ५९. अकार्पण्यनिरूपणकी प्रतिज्ञा | ... ... ११० ६०. जीवकी उत्पत्तिके विषयमें दृष्टान्त | ... ... ११२ ६१. जीवके विलीन होनेमें दृष्टान्त | ... ... ११३ ६२. आत्माकी असंगतामें दृष्टान्त | ... ... ११४ ६३. व्यावहारिक जीवभेद | ... ... १२० ६४. जीव आत्माका विकार या अवयव नहीं है | ... ... १२१ ६५. आत्माकी मलिनता अज्ञानियोंकी दृष्टिमें है | ... ... १२२ ६६. आत्मैकत्व ही समीचीन है | ... ... १२७ ६७. श्रुत्युक्त जीव-ब्रह्मभेद गौण है | ... ... १२८ ६८. दृष्टान्तयुक्त उत्पत्ति-श्रुतिकी व्यवस्था | ... ... १३१ ६९. त्रिविध अधिकारी और उनके लिये उपासनाविधि | ... ... १३४ ७०. अद्वैतात्मदर्शन किसीका विरोधी नहीं है | ... ... १३६ ७१. अद्वैतात्मदर्शनके अविरोधी होनेमें हेतु | ... ... १३८ ७२. आत्मामें भेद मायाहीके कारण है | ... ... १३९ ७३. जीवोत्पत्ति सर्वथा असंगत है | ... ... १४१ ७४. उत्पत्तिशील जीव अमर नहीं हो सकता | ... ... १४२ ७५. सृष्टिश्रुतिकी संगति | ... ... १४३ ७६. श्रुति कार्य और कारण दोनोंका प्रतिषेध करती है | ... ... १४७ ७७. अनात्मप्रतिषेधसे अजन्मा आत्मा प्रकाशित होता है | ... ... १५० ७८. सद्वस्तुकी उत्पत्ति मायिक होती है | ... ... १५१ ७९. असद्वस्तुकी उत्पत्ति सर्वथा असम्भव है | ... ... १५३ ८०. स्वप्न और जाग्रति मनके ही विलास हैं | ... ... १५४ ८१. तत्त्वबोधसे अमनीभाव | ... ... १५६ ८२. आत्मज्ञान किसे होता है ? | ... ... १५७ ८३. शान्तवृत्तिका स्वरूप | ... ... १५८ ८४. सुषुप्ति और समाधिका भेद | ... ... १६० ८५. ब्रह्मका स्वरूप | ... ... १६१
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| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ८६. अस्पर्शयोगकी दुर्गमता ... ... | १६७ |
| ८७. अन्य योगियोंकी शान्ति मनोनिग्रहके अधीन है ... ... | १६८ |
| ८८. मनोनिग्रह धैर्यपूर्वक ही हो सकता है ... ... | १६९ |
| ८९. मनोनिग्रहके विघ्न ... ... | १६९ |
| ९०. मन कब ब्रह्मरूप होता है ? ... ... | १७३ |
| ९१. परमार्थ सत्य क्या है ? ... ... | १७५ |
अलातशान्तिप्रकरण
९२. नारायण-नमस्कार ... ... | १७८ ९३. अद्वैतदर्शनकी वन्दना ... ... | १८० ९४. द्वैतवादियोंका पारस्परिक विरोध ... ... | १८१ ९५. द्वैतवादियोंद्वारा प्रदर्शित अजातिका अनुमोदन ... ... | १८३ ९६. स्वभावविपर्यय असम्भव है ... ... | १८४ ९७. जीवका जरामरण माननेमें दोष ... ... | १८६ ९८. सांख्यमतपर वैशेषिककी आपत्ति ... ... | १८७ ९९. हेतु और फलके अन्योन्यकारणत्वमें दोष ... ... | १९१ १००. अजातवाद-निरूपण ... ... | १९८ १०१. सदसदादिवादोंकी अनुपपत्ति ... ... | १९८ १०२. हेतु-फलका अनादित्व उनकी अनुत्पत्तिका सूचक है ... ... | २०१ १०३. बाह्यार्थवाद-निरूपण ... ... | २०२ १०४. विज्ञानवादिकर्तृक बाह्यार्थवादनिषेध ... ... | २०४ १०५. विज्ञानवादका खण्डन ... ... | २०८ १०६. उपक्रमका उपसंहार ... ... | २१० १०७. प्रपञ्चके असत्यत्वमें हेतु ... ... | २१२ १०८. स्वप्नका मिथ्यात्वनिरूपण ... ... | २१३ १०९. स्वप्न और जाग्रत्का कार्य-कारणत्व व्यावहारिक है ... ... | २१५ ११०. जगदुत्पत्तिका उपदेश किनके लिये है ? ... ... | २२० १११. सन्मार्गगामी द्वैतवादियोंकी गति ... ... | २२१ ११२. उपलब्धि और आचरणकी अप्रमाणता ... ... | २२२ ११३. परमार्थ वस्तु क्या है ? ... ... | २२३ ११४. विज्ञानाभासमें अलातस्फुरणका दृष्टान्त ... ... | २२५ ११५. आत्मामें कार्य-कारणभाव क्यों असम्भव है ? ... ... | २३० ११६. हेतु-फलभावके अभिनिवेशका फल ... ... | २३१
[ ५ ]
| विषय | पृष्ठ | ||
|---|---|---|---|
| ११७. हेतु-फलके अभिनिवेशमें दोष | ... | ... | २३२ |
| ११८. जीवोंका जन्म मायिक है | ... | ... | २३४ |
| ११९. आत्माकी अनिर्वचनीयता | ... | ... | २३६ |
| १२०. द्वैताभावमें स्वप्नका दृष्टान्त | ... | ... | २३७ |
| १२१. अजाति ही उत्तम सत्य है | ... | ... | २४१ |
| १२२. चित्तकी असंगता | ... | ... | २४२ |
| १२३. व्यावहारिक वस्तु परमार्थतः नहीं होती | ... | ... | २४३ |
| १२४. आत्मा अज है—यह कल्पना भी व्यावहारिक है | ... | ... | २४४ |
| १२५. द्वैताभावसे जन्माभाव | ... | ... | २४५ |
| १२६. विद्वान्की अभयपदप्राप्ति | ... | ... | २४७ |
| १२७. मनोवृत्तियोंकी सन्धिमें ब्रह्मसाक्षात्कार | ... | ... | २४९ |
| १२८. आत्माकी दुर्दर्शताका हेतु | ... | ... | २५० |
| १२९. परमार्थका आवरण करनेवाले असदभिनिवेश | ... | ... | २५१ |
| १३०. ज्ञानीका नैष्कर्म्य | ... | ... | २५३ |
| १३१. त्रिविध ज्ञेय | ... | ... | २५५ |
| १३२. त्रिविध ज्ञेय और ज्ञानका ज्ञाता सर्वज्ञ है | ... | ... | २५८ |
| १३३. जीव आकाशके समान अनादि और अभिन्न हैं | ... | ... | २६० |
| १३४. आत्मतत्त्वनिरूपण | ... | ... | २६१ |
| १३५. आत्मज्ञ ही अकृपण है | ... | ... | २६३ |
| १३६. आत्मज्ञका महाज्ञानित्व | ... | ... | २६४ |
| १३७. जातवादमें दोषप्रदर्शन | ... | ... | २६६ |
| १३८. आत्माका स्वाभाविक स्वरूप | ... | ... | २६७ |
| १३९. अजातवाद बौद्धदर्शन नहीं है | ... | ... | २६८ |
| १४०. परमार्थपद-वन्दना | ... | ... | २७० |
| १४१. भाष्यकारकर्तृक वन्दना | ... | ... | २७० |
| १४२. शान्तिपाठ | ... | ... | २७३ |
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ओमित्येतदक्षरमिदँ सर्वम्
१. प्रथम प्रकरण — आगमप्रकरण (२९ कारिकाएँ)
ॐ
तत्सद्ब्रह्मणे नमः
माण्डूक्योपनिषद्
गौडपादीयकारिका, मन्त्रार्थ, शाङ्करभाष्य और भाष्यार्थसहित
जाग्रदादित्रयोन्मुक्तं जाग्रदादिमयं तथा।
ओङ्कारैकसुसंवेद्यं यत्पदं तन्नमाम्यहम् ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
हे देवगण ! हम कानोंसे कल्याणमय वचन सुनें । यज्ञकर्ममें समर्थ होकर नेत्रोंसे शुभ दर्शन करें तथा अपने स्थिर अंग और शरीरोंसे स्तुति करनेवाले हमलोग देवताओंके लिये हितकर आयुका भोग करें । त्रिविध तापकी शान्ति हो ।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
महान् कीर्तिमान् इन्द्र हमारा कल्याण करे; परम ज्ञानवान् [अथवा परम धनवान्] पूषा हमारा कल्याण करे, जो अरिष्टों (आपत्तियों) के लिये चक्रके समान [घातक] है वह गरुड हमारा कल्याण करे तथा बृहस्पतिजी हमारा कल्याण करें, त्रिविध तापकी शान्ति हो ।
१
आगम-प्रकरण
भाष्यकारका मङ्गलाचरण
प्रज्ञानांशुप्रतानैः स्थिरचरनिकरव्यापिभिर्व्याप्य लोकान्
भुक्त्वा भोगान्स्थविष्ठान्पुनरपि धिषणोद्भासितान्कामजन्यान् ।
पीत्वा सर्वान्विशेषान्स्वपिति मधुरभुङ् मायया भोजयन्नो
मायासंख्यातुरीयं परममृतमजं ब्रह्म यत्तन्नतोऽस्मि ॥१॥
जो अपनी चराचरव्यापिनी ज्ञानरश्मियोंके विस्तारसे सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त कर [ जाग्रत्-अवस्थामें ] स्थूल विषयोंका भोग करनेके अनन्तर फिर [ स्वप्नावस्थामें ] बुद्धिसे प्रकाशित वासनाजनित सम्पूर्ण भोगोंका पानकर मायासे हम सब जीवोंको भोग कराता हुआ [ स्वयं ] आनन्दका भोक्ता होकर शयन करता है तथा जो परम अमृत और अजन्मा ब्रह्म मायासे 'तुरीय' ( चौथी ) संख्यावाला हैं, उसे हम नमस्कार करते हैं ॥ १ ॥
यो विश्वात्मा विधिजविषयान् प्राश्य भोगान्स्थविष्ठान्
पश्चाच्चान्यान्स्वमतिविभवान् ज्योतिषा स्वेन सूक्ष्मान् ।
सर्वानैतान्पुनरपि शनैः स्वात्मनि स्थापयित्वा
हित्वा सर्वान्विशेषान्निर्गतगुणगणः पात्वसौ नस्तुरीयः ॥२॥
जो सर्वात्मा [ जाग्रत्-अवस्थामें ] शुभाशुभ कर्मजनित स्थूल भोगोंको भोगकर फिर [ स्वप्नकालमें ] अपनी बुद्धिसे परिकल्पित सूक्ष्म विषयोंको [ सूर्य आदि बाह्य ज्योतियोंका अभाव होनेके कारण ] अपने ही प्रकाशसे भोगता है और फिर धीरे-धीरे इन सभीको अपनेमें स्थापित कर सम्पूर्ण विशेषोंको छोड़कर निर्गुणरूपसे स्थित हो जाता है, वह तुरीय परमात्मा हमारी रक्षा करे ॥ २ ॥
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ३
सम्बन्धभाष्य
| [अनुबन्ध-विमर्शः] | |
|---|---|
| ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् ।<br>तस्योपव्याख्यानं<br>वेदान्तार्थसारसंग्रह-<br>भूतमिदं प्रकरण-<br>चतुष्टयमोमित्येतदक्षरमित्याद्या-<br>रभ्यते । अत एव न पृथक्सम्बन्धा-<br>भिधेयप्रयोजनानि वक्तव्यानि ।<br>यान्येव तु वेदान्ते सम्बन्धाभि-<br>धेयप्रयोजनानि तान्येवेह भवितु-<br>मर्हन्ति । तथापि प्रकरणव्या-<br>चिख्यासुना संक्षेपतो वक्तव्यानि। | ‘ॐ’ यह अक्षर ही यह सब कुछ है। उसका व्याख्यानरूप तथा वेदान्तार्थका सारसंग्रहभूत यह चार प्रकरणोंवाला ग्रन्थ ‘ओमित्येतदक्षर-मिदम्’ आदि मन्त्रद्वारा आरम्भ किया जाता है। इसीलिये इसके सम्बन्ध, विषय और प्रयोजनका पृथक् वर्णन करनेकी आवश्यकता नहीं है । वेदान्तशास्त्रमें जो-जो सम्बन्ध, विषय और प्रयोजन हुआ करते हैं वे ही इस ग्रन्थमें भी हो सकते हैं। तो भी [ व्याख्याकार ऐसा मानते हैं कि ] जिन्हें किसी प्रकरण-ग्रन्थकी व्याख्या करनेकी इच्छा हो उन्हें संक्षेपसे उनका वर्णन कर ही देना चाहिये । |
| तत्र प्रयोजनवत्साधनाभि-<br>व्यञ्जकत्वेनाभिधेयसम्बद्धं शास्त्रं<br>पारम्पर्येण विशिष्टसम्बन्धाभिधेय-<br>प्रयोजनवद्भवति । किं पुनस्त-<br>त्प्रयोजनमित्युच्यते, रोगा-<br>र्तस्येव रोगनिवृत्तौ स्वस्थता ।<br>तथा दुःखात्मकस्यात्मनो द्वैत- | तहाँ, प्रयोजनसिद्धिके अनुकूल साधन अभिव्यक्त करनेके कारण अपने प्रतिपाद्य विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला शास्त्र परम्परासे विशिष्ट सम्बन्ध, विषय और प्रयोजनवाला हुआ करता है। अच्छा तो, [ इस शास्त्रका ] वह क्या प्रयोजन है ? सो बतलाया जाता है—जिस प्रकार रोगी पुरुषको रोगकी निवृत्ति होनेपर स्वस्थता होती है उसी प्रकार दुःखाभिमानी आत्माको द्वैत- |
| ४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
| प्रपञ्चोपशमे स्वस्थता । अद्वैतभावः प्रयोजनम् । | प्रपञ्चकी निवृत्ति होनेपर स्वस्थता मिलती है। अतः अद्वैतभाव ही इसका प्रयोजन है । |
| द्वैतप्रपञ्चस्याविद्याकृतत्वाद्दिद्यया तदुपशमः स्यादिति ब्रह्मविद्याप्रकाशनायास्यारम्भः क्रियते । "यत्र हि द्वैतमिव भवति" (बृ० उ० २ । ४ । १४) "यत्र वान्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येदन्योऽन्यद्विजानीयात्" (बृ० उ० ४ । ३ । ३१) "यत्र वास्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्केन कं विजानीयात्" (बृ० उ० २ । ४ । १४) इत्यादिश्रुतिभ्योऽस्यार्थस्य सिद्धिः । | द्वैतप्रपञ्च अविद्याजनित है इसलिये उसकी निवृत्ति विद्यासे ही हो सकती है । अतः ब्रह्मविद्याको प्रकाशित करनेके लिये ही इसका आरम्भ किया जाता है । "जहाँ द्वैतके समान होता है" "जहाँ भिन्नके समान हो वहीं कोई दूसरा दूसरेको देख सकता है अथवा दूसरा दूसरेको जानता है" "जहाँ इसके लिये सब कुछ आत्मा ही हो गया है वहाँ यह किसके द्वारा किसे देखे ? और किसके द्वारा किसे जाने ?" इत्यादि श्रुतियोंसे इसी बातकी सिद्धि होती है । |
| [प्रकरण-चतुष्टय-प्रतिपाद्यार्थ-निरूपणम्]<br><br>तत्र तावदोङ्कारनिर्णयाय प्रथमं प्रकरणमागमप्रधानम् आत्मतत्त्वप्रतिपत्त्युपायभूतम् । यस्य द्वैतप्रपञ्चस्योपशमेऽद्वैतप्रतिपत्तौ रज्ज्वामिव सर्पादिविकल्पोपशमे रज्जुतत्त्व- | उन (चारों प्रकरणों) में पहला प्रकरण तो ओंकारके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये है । वह आगम-(श्रुति) प्रधान और आत्मतत्त्वकी प्राप्तिका उपायभूत है । रज्जुमें सर्पादि विकल्पकी निवृत्ति होनेपर जिस प्रकार रज्जुके स्वरूपका ज्ञान हो जाता है उसी प्रकार जिस द्वैतप्रपञ्चकी निवृत्ति होनेपर अद्वैत |
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५
| प्रतिपत्तिस्तस्य द्वैतस्य हेतुतो वैतथ्यप्रतिपादनाय द्वितीयं प्रकरणम् । तथाद्वैतस्यापि वैतथ्यप्रसङ्गप्राप्तौ युक्तितस्तथा-त्वदर्शनाय तृतीयं प्रकरणम् । अद्वैतस्य तथात्वप्रतिपत्तिप्रतिपक्ष-भूतानि यानि वादान्तराण्यवैदि-कानि तेषामन्योन्यविरोधि-त्वादतथार्थत्वेन तदुपपत्तिभिरेव निराकरणाय चतुर्थं प्रकरणम् । | तत्त्वका बोध होता है उसी द्वैतका युक्तिपूर्वक मिथ्यात्व प्रतिपादन करने-के लिये [ वैतथ्यनामक ] द्वितीय प्रकरण है । इसी प्रकार अद्वैतके भी मिथ्यात्वका प्रसंग उपस्थित न हो जाय इसलिये युक्तिद्वारा उसका सत्यत्व प्रतिपादन करनेके लिये तृतीय ( अद्वैत ) प्रकरण है । तथा अद्वैतके सत्यत्व-निश्चयके विपक्षी जो अन्य अवैदिक मतान्तर हैं वे परस्पर विरोधी होनेके कारण मिथ्या हैं, अतः उन्हींकी युक्तियोंसे उनका खण्डन करनेके लिये चतुर्थ (अलात शान्ति ) प्रकरण है । |
| कथं पुनरोङ्कारनिर्णय आत्म-तत्त्वप्रतिपत्त्युपा-यत्वं प्रतिपद्यत इत्युच्यते—<br>(ओंकारस्य आत्मप्रतिपत्ति-साधनत्वम्) | ओंकारका निर्णय किस प्रकार आत्मतत्त्वकी प्राप्तिका उपाय होता है, सो अब बतलाया जाता है— |
| “ओमित्येतत्” (क० उ० १।२।१५) “एतदालम्बनम्” (क० उ० १।२।१७) “एतद्वै सत्य-काम” (प्र० उ० ५।२) “ओमि-त्यात्मानं युञ्जीत” ( मैत्र्यु० ६।३ ) “ओमिति ब्रह्म” ( तै० उ० १।८।१ ) “ओङ्कार एवेदं सर्वम्” ( छा० उ० २।२३।३ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । | “ॐ यही [ वह पद ] है” “यही आलम्बन है” “हे सत्यकाम ! यह [ जो ओंकार है वही पर और अपर ब्रह्म है ]” “आत्माका ॐ इस प्रकार ध्यान करे” “ॐ यही ब्रह्म है” “यह सब ओंकार ही है” इत्यादि श्रुतियोंसे यही बात जानी जाती है । |
| रज्ज्वादिरिव सर्पादि- | सर्पादि विकल्पकी अधिष्ठानभूत |
| ६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
| ओंकारस्य सर्वास्पदत्वम् | |
|---|---|
| विकल्पस्यास्पदोऽद्वय आत्मा परमार्थः सन्प्राणादिविकल्पस्यास्पदो यथा तथा सर्वोऽपि वाक्प्रपञ्चः प्राणाद्यात्मविकल्पविषय ओङ्कार एव । स चात्मस्वरूपमेव, तदभिधायकत्वात् । ओङ्कारविकारशब्दाभिधेयश्च सर्वः प्राणादिरात्मविकल्पोऽभिधानव्यतिरेकेण नास्ति । "वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" (छा० उ० ६।१।४) "तदस्येदं वाचा तन्त्या नामभिर्दामभिः सर्वं सितम्" "सर्वं हीदं नामनि" इत्यादिश्रुतिभ्यः । <br><br> अत आह— | रज्जु आदिके समान जिस प्रकार अद्वितीय आत्मा परमार्थ सत्य होनेपर भी प्राणादि विकल्पका आश्रय है उसी प्रकार प्राणादि विकल्पको विषय करनेवाला सम्पूर्ण वाग्विलास ओंकार ही है। और वह (ओंकार) आत्माका प्रतिपादन करनेवाला होनेसे उसका स्वरूप ही है। तथा ओंकारके विकाररूप शब्दोंके प्रतिपाद्य आत्माके विकल्परूप समस्त प्राणादि भी अपने प्रतिपादक शब्दोंसे भिन्न नहीं हैं, जैसा कि "विकार केवल वाणीका विलास और नाममात्र है" "उस ब्रह्मका यह सम्पूर्ण जगत् वाणीरूप सूत्रद्वारा नाममयी डोरीसे व्याप्त है" "यह सब नाममय ही है" इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। <br><br> इसीलिये कहते हैं— |
ॐ ही सब कुछ है
ओमित्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥१॥
ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसीकी व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है ॥ १ ॥