माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण २९
| सर्वं जनयति प्राणश्चेतों-शूनंशव इव रवेश्चिदात्मकस्य पुरुषस्य चेतोरूपा जलार्कसमाः प्राज्ञतैजसविश्वभेदेन देवतिर्यगादिदेहभेदेषु विभाव्यमानाश्चेतोंशवो ये तान्पुरुषः पृथग्विषयभावविलक्षणानग्निविस्फुलिङ्गवत् सलक्षणाञ्जलार्कवच्च जीवलक्षणांस्त्वितरान् सर्वभावान् प्राणो बीजात्मा जनयति “यथोर्णनाभिः” (मु० उ० १।१ ।७) “यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः” (बृ० उ० २।१।२०) इत्यादिश्रुतेः ॥६॥ | सब पदार्थोंको [बीजरूप] प्राण ही उत्पन्न करता है। तथा जो जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके समान देव, मनुष्य और तिर्यगादि विभिन्न शरीरोंमें प्राज्ञ, तैजस एवं विश्वरूपसे भासमान चिदात्मक पुरुषके किरणरूप चिदाभास हैं, उन विषयभावसे विलक्षण तथा अग्निकी चिनगारी और जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यके समान सजातीय जीवोंको पुरुष अलग ही उत्पन्न करता है। उनके सिवाय अन्य समस्त पदार्थोंको बीजात्मक प्राण उत्पन्न करता है, जैसा कि “जिस प्रकार मकड़ी [जाला बनाती है]” तथा “जैसे अग्निसे छोटी-छोटी चिनगारियाँ निकलती हैं” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है ॥६॥ |
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सृष्टिके विषयमें भिन्न-भिन्न विकल्प
विभूतिं प्रसवं त्वन्ये मन्यन्ते सृष्टिचिन्तकाः ।
स्वप्नमायासरूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिता ॥ ७ ॥
सृष्टिके विषयमें विचार करनेवाले दूसरे लोग भगवान्की विभूतिको ही जगत्की उत्पत्ति मानते हैं तथा दूसरे लोगोंद्वारा यह सृष्टि स्वप्न और मायाके समान मानी गयी है ॥७॥