माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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३० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| विभूतिर्विस्तार ईश्वरस्य सृष्टि- | यह सृष्टि ईश्वरकी विभूति यानी |
| रिति सृष्टिचिन्तका मन्यन्ते न | उसका विस्तार है—ऐसा सृष्टिके |
| तु परमार्थचिन्तकानां सृष्टावादर | विषयमें विचार करनेवाले लोग मानते |
| इत्यर्थः। "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप | हैं। तात्पर्य यह है कि परमार्थ-चिन्तन करनेवालोंका सृष्टिके विषयमें आदर नहीं होता; जैसा कि "इन्द्र (परमात्मा) मायासे अनेक रूप- |
| ईयते" (बृ० उ० २।५।१९) | वाला हो जाता है" इस श्रुतिसे सिद्ध |
| इति श्रुतेः। न हि मायाविनं | होता है, [केवल बहिर्मुख पुरुष ही उसकी उत्पत्तिके विषयमें तरह- |
| सूत्रमाकाशे निक्षिप्य तेन | तरहकी कल्पना किया करते हैं]। |
| सायुधमारुह्य चक्षुर्गोचरतामतीत्य | आकाशमें सूत फेंककर उसपर शस्त्रोंसहित आरूढ़ हो नेत्रेन्द्रियकी |
| युद्धेन खण्डशश्छिन्नं पतितं | पहुँचसे परे जाकर युद्धके द्वारा अनेकों टुकड़ोंमें विभक्त होकर गिरे |
| पुनरुत्थितं च पश्यतां तत्कृत- | हुए मायावीको पुनः उठता देखने-वाले पुरुषोंको उसकी रची हुई माया |
| मायादिसत्त्वतत्त्वचिन्तायामादरो | आदिके स्वरूपके चिन्तनमें आदर |
| भवति। तथैवायं मायाविनः सूत्र- | नहीं होता। उस मायावीके सूत्र-विस्तारके समान ही ये सुषुप्ति एवं |
| प्रसारणसमः सुषुप्तस्वप्नादिविका- | स्वप्नादिके विकास हैं; तथा उस (सूत्र) पर चढ़े हुए मायावीके |
| रस्तदारूढमायाविसमश्च तत्स्थः | समान ही उन (सुषुप्ति आदि अवस्थाओं) में स्थित प्राज्ञ एवं |
| प्राज्ञतैजसादिः। सूत्रतदारूढाभ्या- | तैजस आदि हैं। किन्तु वास्तविक |
| मन्यः परमार्थमायावी स एव | मायावी तो सूत्र और उसपर चढ़े हुए मायावीसे भिन्न है और वही |
| भूमिष्ठो मायाच्छन्नोऽदृश्यमान एव | जैसे मायासे आच्छादित रहनेके कारण दिखलायी न देता हुआ ही |
| स्थितो यथा तथा तुरीयाख्यं | पृथिवीपर स्थित रहता है वैसा ही |