माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 54, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 54
| ३४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
| नापि गुणवत्त्वं नीलादिवन्निर्गुणत्वात् । अतो नाभिधानेन निर्देशमर्हति । | निर्गुण होनेके कारण नीलता आदिके समान गुणवत्त्व ही है । इसलिये उसका किसी भी नामसे निर्देश नहीं किया जा सकता । |
| शशविषाणादिसमत्वान्निरर्थकत्वं तर्हि । | पूर्व०— तब तो शशशृङ्गादिके समान [ असद्रूप होनेके कारण ] उसकी निरर्थकता ही सिद्ध होती है। |
| तुरीयावगमस्य सार्थकत्वम्<br>न; आत्मत्वावगमे तुरीयस्यानात्मतृष्णाव्यावृत्तिहेतुत्वाच्छुक्तिकावगम इव रजततृष्णायाः । न हि तुरीयस्यात्मत्वावगमे सत्यविद्यातृष्णादिदोषाणां सम्भवोऽस्ति। न च तुरीयस्यात्मत्वानवगमे कारणमस्ति; सर्वोपनिषदां तादर्थ्येनोपक्षयात् । “तत्त्वमसि” (छा०उ०६।८-१६) ; “अयमात्मा ब्रह्म” (बृ० उ० २ । ५ । १९) । “तत्सत्यं स आत्मा” (छा० उ० ६ । ८ । १६) “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” ( बृ० उ० ३ । ४ । १ ) । “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” ( मु० उ० २ । १ । २) । “आत्मैवेदँ सर्वम्” ( छा० उ० ७ । २५ । २ ) इत्यादीनाम् । | सिद्धान्ती— नहीं; क्योंकि शुक्तिका ज्ञान होनेपर जिस प्रकार [ उसमें आरोपित ] चाँदीकी तृष्णा नष्ट हो जाती है उसी प्रकार तुरीय हमारा आत्मा है—ऐसा ज्ञान होनेपर वह अनात्मसम्बन्धिनी तृष्णाको निवृत्त करनेका कारण होता है । तुरीयको अपना आत्मा जान लेनेपर अविद्या एवं तृष्णादि दोषोंकी सम्भावना नहीं रहती । और तुरीयको अपने आत्मस्वरूपसे न जाननेका कोई कारण भी नहीं है, क्योंकि “तत्त्वमसि” “अयमात्मा ब्रह्म” “तत्सत्यं स आत्मा” “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” “सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः” “आत्मैवेदँ सर्वम्” इत्यादि समस्त उपनिषद्वाक्योंका पर्यवसान इसी अर्थमें हुआ है । |