भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 55
शां० भा० ]आगम-प्रकरण३५
सोऽयमात्मा परमार्थपरमार्थ-रूपश्चतुष्पादित्युक्तस्तस्यापरमार्थ-रूपमविद्याकृतं रज्जुसर्पादिसममुक्तं पादत्रयलक्षणं बीजाङ्कुरस्थानीयम् । अथेदानीमबीजात्मकं परमार्थस्वरूपं रज्जुस्थानीयं सर्पादिस्थानीयोक्तस्थानत्रयनिराकरणेनाह—नान्तःप्रज्ञमित्यादि ।वह यह आत्मा परमार्थ और अपरमार्थरूपसे चार पादवाला है—ऐसा कहा है । उसका बीजाङ्कुरस्थानीय पादत्रयस्वरूप अपरमार्थरूप रज्जुसर्पादिके समान अविद्याजनित कहा गया है । अब सर्पादिस्थानीय उक्त तीनों पादोंका निराकरणकर 'नान्तःप्रज्ञम्' इत्यादिरूपसे उसके रज्जुस्थानीय अबीजात्मक परमार्थस्वरूपका वर्णन करते हैं—

तुरीयका स्वरूप

नान्तःप्रज्ञं न वहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥७॥

[ विवेकीजन ] तुरीयको ऐसा मानते हैं कि वह न अन्तःप्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ है, न उभयतः (अन्तर्बहिः) प्रज्ञ है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ है, और न अप्रज्ञ है । बल्कि अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राहा, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, एकात्मप्रत्ययसार, प्रपञ्चका उपशम, शान्त, शिव और अद्वैतरूप है । वही आत्मा है और वही साक्षात् जाननेयोग्य है ॥७॥

नन्वात्मनश्चतुष्पात्त्वं प्रतिज्ञाय पादत्रयकथनेनैव चतुर्थस्यान्त-पूर्व—किन्तु आत्मा चार पादोंवाला है—ऐसी प्रतिज्ञाकर उसके तीन पादोंका वर्णन कर देनेसे ही