माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ३६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| (संस्कृत) | (हिन्दी अनुवाद) |
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| प्रज्ञादिभ्योऽन्यत्वे सिद्धे नान्तः-<br>प्रज्ञमित्यादिप्रतिषेधोऽनर्थकः । | चौथे पादका अन्तःप्रज्ञादि विशेषणों-<br>से भिन्न होना तो सिद्ध ही है; अतः<br>यह “नान्तःप्रज्ञम्” इत्यादि प्रतिषेध<br>तो व्यर्थ ही है । |
| (आत्मावगतौ अनात्मप्रतिषेध एव प्रमाणम्)<br>न; सर्पादिविकल्पप्रतिषेधेनैव<br>रज्जुस्वरूपप्रतिपत्ति-<br>वत्त्रयवस्थस्यैवात्म-<br>नस्तुरीयत्वेन प्रति-<br>पिपादयिषितत्वात्,<br>तत्त्वमसीतिवत् । यदि हि त्र्यव-<br>स्थात्मविलक्षणं तुरीयमन्यत्तत्प्र-<br>तिपत्तिद्वाराभावाच्छास्त्रोपदेशा-<br>नर्थक्यं शून्यतापत्तिर्वा ।<br>रज्जुरिव सर्पादिभिर्विकल्प्य-<br>माना स्थानत्रयेऽप्यात्मैक एवान्तः-<br>प्रज्ञादित्वेन विकल्प्यते यदा<br>तदान्तःप्रज्ञत्वादिप्रतिषेधविज्ञान-<br>प्रमाणसमकालमेवात्मन्यनर्थप्रप-<br>ञ्चनिवृत्तिलक्षणफलं परिसमाप्तम्,<br>इति तुरीयाधिगमे प्रमाणान्तरं<br>साधनान्तरं वा न मृग्यम् । | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है;<br>क्योंकि जिस प्रकार सर्पादि विकल्प-<br>का प्रतिषेध करनेसे ही रज्जुके<br>स्वरूपका ज्ञान हो जाता है उसी<br>प्रकार, जैसा कि “तत्त्वमसि” इत्यादि<br>वाक्यमें देखा जाता है, यहाँ<br>[जाग्रदादि] तीनों अवस्थाओंमें स्थित<br>आत्माका ही तुरीयरूपसे प्रतिपादन<br>करना इष्ट है । यदि तुरीय आत्मा<br>अवस्थात्रयविशिष्ट आत्मासे सर्वथा<br>भिन्न होता तो उसकी उपलब्धिका<br>कोई उपाय न रहनेके कारण<br>शास्त्रोपदेशकी व्यर्थता अथवा<br>शून्यवादकी प्राप्ति हो जाती । जब<br>कि सर्पादि (सर्प, धारा, भूच्छिद्रादि)<br>रूपसे विकल्पित रज्जुके समान<br>[जाग्रदादि] तीनों स्थानोंमें एक ही<br>आत्मा अन्तःप्रज्ञादिरूपसे विकल्पित<br>हो रहा है तब तो अन्तःप्रज्ञत्वादिके<br>प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाणकी उत्पत्ति-<br>के समकाल ही आत्मामें अनर्थ-<br>प्रपञ्चकी निवृत्तिरूप फल सिद्ध हो<br>जाता है; अतः तुरीयका साक्षात्कार<br>करनेके लिये इसके सिवा किसी<br>अन्य प्रमाण अथवा साधनकी खोज<br>करनेकी आवश्यकता नहीं है; जैसे |