माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
| ३६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| (संस्कृत) | (हिन्दी अनुवाद) |
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| प्रज्ञादिभ्योऽन्यत्वे सिद्धे नान्तः-<br>प्रज्ञमित्यादिप्रतिषेधोऽनर्थकः । | चौथे पादका अन्तःप्रज्ञादि विशेषणों-<br>से भिन्न होना तो सिद्ध ही है; अतः<br>यह “नान्तःप्रज्ञम्” इत्यादि प्रतिषेध<br>तो व्यर्थ ही है । |
| (आत्मावगतौ अनात्मप्रतिषेध एव प्रमाणम्)<br>न; सर्पादिविकल्पप्रतिषेधेनैव<br>रज्जुस्वरूपप्रतिपत्ति-<br>वत्त्रयवस्थस्यैवात्म-<br>नस्तुरीयत्वेन प्रति-<br>पिपादयिषितत्वात्,<br>तत्त्वमसीतिवत् । यदि हि त्र्यव-<br>स्थात्मविलक्षणं तुरीयमन्यत्तत्प्र-<br>तिपत्तिद्वाराभावाच्छास्त्रोपदेशा-<br>नर्थक्यं शून्यतापत्तिर्वा ।<br>रज्जुरिव सर्पादिभिर्विकल्प्य-<br>माना स्थानत्रयेऽप्यात्मैक एवान्तः-<br>प्रज्ञादित्वेन विकल्प्यते यदा<br>तदान्तःप्रज्ञत्वादिप्रतिषेधविज्ञान-<br>प्रमाणसमकालमेवात्मन्यनर्थप्रप-<br>ञ्चनिवृत्तिलक्षणफलं परिसमाप्तम्,<br>इति तुरीयाधिगमे प्रमाणान्तरं<br>साधनान्तरं वा न मृग्यम् । | **सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है;<br>क्योंकि जिस प्रकार सर्पादि विकल्प-<br>का प्रतिषेध करनेसे ही रज्जुके<br>स्वरूपका ज्ञान हो जाता है उसी<br>प्रकार, जैसा कि “तत्त्वमसि” इत्यादि<br>वाक्यमें देखा जाता है, यहाँ<br>[जाग्रदादि] तीनों अवस्थाओंमें स्थित<br>आत्माका ही तुरीयरूपसे प्रतिपादन<br>करना इष्ट है । यदि तुरीय आत्मा<br>अवस्थात्रयविशिष्ट आत्मासे सर्वथा<br>भिन्न होता तो उसकी उपलब्धिका<br>कोई उपाय न रहनेके कारण<br>शास्त्रोपदेशकी व्यर्थता अथवा<br>शून्यवादकी प्राप्ति हो जाती । जब<br>कि सर्पादि (सर्प, धारा, भूच्छिद्रादि)<br>रूपसे विकल्पित रज्जुके समान<br>[जाग्रदादि] तीनों स्थानोंमें एक ही<br>आत्मा अन्तःप्रज्ञादिरूपसे विकल्पित<br>हो रहा है तब तो अन्तःप्रज्ञत्वादिके<br>प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाणकी उत्पत्ति-<br>के समकाल ही आत्मामें अनर्थ-<br>प्रपञ्चकी निवृत्तिरूप फल सिद्ध हो<br>जाता है; अतः तुरीयका साक्षात्कार<br>करनेके लिये इसके सिवा किसी<br>अन्य प्रमाण अथवा साधनकी खोज<br>करनेकी आवश्यकता नहीं है; जैसे |
मांडू० भा० ] आगम-प्रकरण ३७
| रज्जुसर्पविवेकसमकाल इव रज्ज्वां सर्पनिवृत्तिफले सति रज्ज्यधिगमस्य । | कि रज्जु और सर्पका विवेक होनेके समानकालमें ही रज्जुमें सर्पनिवृत्ति-रूप फलकी प्राप्ति होते ही रज्जुका ज्ञान हो जाता है [उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये] । |
|---|---|
| येषां पुनस्तमोऽपनयव्यतिरेकेण घटाधिगमे प्रमाणं व्यापार्यते तेषां छेद्यावयवसम्बन्धवियोग-व्यतिरेकेणान्यतरावयवेऽपि-च्छिदिक्रियाप्रियत इत्युक्तं स्यात् । | किन्तु जिनके मतमें घटज्ञानमें अन्धकारकी निवृत्तिके सिवा किसी और कार्यमें भी प्रमाणकी प्रवृत्ति होती है उनका तो मानों ऐसा कथन है कि छेद्य पदार्थोंके अवयवोंका सम्बन्धविच्छेद करनेके अतिरिक्त भी छेदनक्रियाका वस्तुके किसी एक अवयवमें कोई व्यापार होता है।* |
| यदा पुनर्घटतमसोर्विवेककरणे प्रवृत्तं प्रमाणमनुपादित्सिततमो-निवृत्तिफलावसानं छिदिरिव-च्छेद्यावयवसम्बन्धविवेककरणे प्रवृत्ता तदवयवद्वैधीभावफला- | छेद्य अवयवोंका सम्बन्धच्छेद करनेमें प्रवृत्त छेदनक्रिया जिस प्रकार उसके अवयवोंके विभक्त हो जानेमें समाप्त होनेवाली है उसी प्रकार जब कि घट और अन्धकारका पार्थक्य करनेमें प्रवृत्त प्रमाण अनिष्ट अन्धकारकी |
* तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अन्धकारमें रहते हुए घटका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अन्धकारकी निवृत्तिमात्र ही आवश्यक है, अन्य किसी क्रियाकी अपेक्षा नहीं है उसी प्रकार तुरीयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उसमें आरोपित अन्तःप्रज्ञत्वादिका निषेध ही कर्त्तव्य है। जो लोग घटज्ञानमें अन्धकार-निवृत्तिके सिवा उसके उत्पादक प्रमाणका कोई और व्यापार भी स्वीकार करते हैं वे मानों ऐसा कहते हैं कि छेदनक्रिया छेद्यपदार्थके अवयवोंका सम्बन्धच्छेद करनेके सिवा उसके किसी भी अवयवमें कोई अन्य कार्य भी कर देती है। परन्तु यह बात सर्वसम्मत है कि छेदनक्रियाका अवयवविश्लेषणके सिवा कोई अन्य व्यापार नहीं होता। इसीलिये उनका कथन माननीय नहीं है।
१. यदि प्रमाण अज्ञानका ही निवर्तक है तो विषयके स्फुरण होनेका तो
| ३८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० कां० |
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| वसाना तदा नान्तरीयकं घट- | निवृत्तिरूप फलमें ही समाप्त हो जाने- | | विज्ञानं न तत्प्रमाणफलम् । | वाला है तब घटज्ञान तो अवश्यम्भावी है, वह प्रमाणका फल नहीं है । | | न च तद्वदप्यात्मन्यध्यारो- | उसीके समान आत्मामें आरोपित | | पितान्तःप्रज्ञत्वादिविवेककरणे | अन्तःप्रज्ञत्वादिके विवेक करनेमें | | प्रवृत्तस्य प्रतिषेधविज्ञानप्रमाणस्य | प्रवृत्त प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाणका, | | अनुपादित्सितान्तःप्रज्ञत्वादिनि- | अनुपादित्सित (जिसका स्वीकार | | वृत्तिव्यतिरेकेण तुरीये व्यापारो- | करना इष्ट नहीं है उस) अन्तःप्रज्ञत्वादि- | | पपत्तिः । अन्तःप्रज्ञत्वादिनि- | की निवृत्तिके सिवा तुरीय आत्मामें | | वृत्तिसमकालमेव प्रमातृत्वादि- | कोई अन्य व्यापार होना सम्भव | | भेदन्निवृत्तेः । तथा च वक्ष्यति— | नहीं है, क्योंकि अन्तःप्रज्ञत्वादिकी | | "ज्ञाते द्वैतं न विद्यते" (माण्डू० | निवृत्तिके समकालमें ही प्रमातृत्वादि | | का० १ । १८) इति । ज्ञानस्य | भेदकी निवृत्ति हो जाती है । ऐसा | | द्वैतनिवृत्तिक्षणव्यतिरेकेण क्षणा- | ही "ज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं | | न्तरानवस्थानात् । अवस्थाने | रहता" इत्यादि वाक्यद्वारा आगे कहेंगे | | चानवस्थाप्रसङ्गादद्वैतानिवृत्तिः । | भी; क्योंकि वृत्तिज्ञानकी भी स्थिति | | | द्वैतनिवृत्तिके क्षणके सिवा दूसरे | | | क्षणमें नहीं रहती; और यदि स्थिति | | | मानी जाय तो अनवस्थाका प्रसङ्ग* | | | उपस्थित हो जानेसे द्वैतकी निवृत्ति |
कोई कारण दिखायी नहीं देता; अतः विषयज्ञान होना ही नहीं चाहिये—ऐसी आशङ्का करके आगेकी बात कहते हैं ।
* अद्वैत-बोधके लिये जिन-जिन प्रमाणोंका आश्रय लिया जाता है वे सब द्वैतप्रपञ्चके ही अन्तर्गत हैं । निखिलद्वैतकी निवृत्ति करनेवाला वृत्तिज्ञान भी वृत्तिरूप होनेके कारण द्वैतके ही अन्तर्गत है । यदि वह सम्पूर्ण द्वैतकी निवृत्ति करके भी बना रहे तो उसकी निवृत्तिके लिये किसी अन्य वृत्तिकी अपेक्षा होगी और उसके लिये किसी तीसरीकी । इस प्रकार अनवस्था दोष उपस्थित हो जायगा और द्वैतकी निवृत्ति कभी न हो पावेगी । इसलिये निखिलद्वैतकी निवृत्ति
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ३९
| तस्मात्प्रतिषेधविज्ञानप्रमाणव्यापा- | ही नहीं होगी । अतः यह सिद्ध |
| हुआ कि प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाणके | |
| रसमकालैवात्मन्यध्यारोपितान्तः- | प्रवृत्त होनेके समकालमें ही आत्मामें |
| आरोपित अन्तःप्रज्ञत्वादि अनर्थकी | |
| प्रज्ञत्वाद्यनर्थनिवृत्तिरिति सिद्धम्। | निवृत्ति हो जाती है । |
| नान्तःप्रज्ञमिति तैजसप्रतिषेधः। | 'अन्तःप्रज्ञ नहीं है' ऐसा कहकर |
| तैजसका प्रतिषेध किया है; 'बहि- | |
| न बहिष्प्रज्ञमिति विश्वप्रतिषेधः। | ष्प्रज्ञ नहीं है' इससे विश्वका निषेध |
| नोभयतःप्रज्ञमिति जाग्रत्स्वप्नयोः | किया है; 'उभयतःप्रज्ञ नहीं है' |
| इस वाक्यसे जाग्रत् और स्वप्नके | |
| अन्तरालावस्थाप्रतिषेधः । न | बीचकी अवस्थाका प्रतिषेध किया है; |
| प्रज्ञानघनमिति सुषुप्तावस्थाप्रति- | 'प्रज्ञानघन नहीं है' इससे सुषुप्तिका |
| प्रतिषेध हुआ है, क्योंकि वह बीज- | |
| षेधः। बीजभावाविवैकरूपत्वात्। | भावमय-अविवेकस्वरूपा है; 'प्रज्ञ |
| न प्रज्ञमिति युगपत्सर्वविषयप्रज्ञा- | नहीं है' इससे एक साथ सब |
| विषयोंके ज्ञातृत्वका प्रतिषेध किया है; | |
| तृत्वप्रतिषेधः । नाप्रज्ञमित्य- | तथा 'अप्रज्ञ नहीं है' इससे |
| चैतन्यप्रतिषेधः । | अचेतनताका निषेध किया है । |
| कथं पुनरन्तःप्रज्ञत्वादीना- | किन्तु जब कि अन्तःप्रज्ञत्वादि |
| धर्म आत्मामें प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं | |
| मात्मनि गम्यमानानां रज्ज्वादौ | तो केवल प्रतिषेधके ही कारण |
| उनका रज्जुमें प्रतीत होनेवाले | |
| सर्पादिवत्प्रतिषेधादसत्त्वं गम्यत | सर्पादिके समान असत्यत्व कैसे सिद्ध |
| हो सकता है ? इसपर कहते हैं— | |
| इत्युच्यते । ज्ञस्वरूपाविशेषेऽपि | रज्जु आदिमें प्रतीत होनेवाले सर्प, |
करनेके उत्तर-क्षणमें ही वृत्तिज्ञान स्वयं भी निवृत्त हो जाता है—यही मत समीचीन है ।
| ४० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| इतरेतरव्यभिचाराद्रज्जुवादाविव सर्पधारादिविकल्पितभेदवत् सर्वत्राव्यभिचाराद्रज्जुस्वरूपस्य सत्यत्वम् । <br><br> सुषुप्ते व्यभिचरतीति चेन्न । सुषुप्तस्यानुभूयमानत्वात् । “न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ० ४।३।३०) इति श्रुतेः । <br><br> अत एवादृष्टम् । यस्माददृष्टं तस्मादव्यवहार्यम् । अग्राह्यं कर्मेन्द्रियैः। अलक्षणमलिङ्गमित्येतद्-ननुमेयमित्यर्थः । अत एवाचिन्त्यम् । अत एवाव्यपदेश्यं शब्दैः । एकात्मप्रत्ययसारं जाग्रदादिस्थानेष्वेकोऽयमात्मेत्यव्यभिचारी यः प्रत्ययस्तेनानुसरणीयम् । अथ वैक आत्मप्रत्ययः | धारा आदि विकल्पभेदोंके समान उनके चित्स्वरूपमें कोई भेद न होनेपर भी परस्पर एक-दूसरेका व्यभिचार होनेके कारण वे असद्रूप हैं । किन्तु चित्स्वरूपका कहीं भी व्यभिचार नहीं है; इसलिये वह सत्य है । <br><br> यदि कहो कि सुषुप्तिमें उसका व्यभिचार होता है तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिका भी अनुभव हुआ करता है; जैसा कि “विज्ञाताकी विज्ञातिका लोप नहीं होता” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । <br><br> इसीलिये वह अदृश्य है । और क्योंकि अदृश्य है इसलिये अव्यवहार्य है तथा कर्मेन्द्रियोंसे अग्राह्य और अलक्षण यानी लिङ्गरहित है । तात्पर्य यह है कि उसका अनुमान नहीं किया जा सकता । इसीसे वह अचिन्त्य है अतएव शब्दोंद्वारा अकथनीय है । वह एकात्मप्रत्ययसार है । अर्थात् जाग्रत् आदि स्थानोंमें एक ही आत्मा है—ऐसा जो अव्यभिचारी प्रत्यय है उससे अनुसरण किये जाने योग्य है । |
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४१
| सारं प्रमाणं यस्य तुरीयस्याधिगमे तत्तुरीयमेकात्मप्रत्ययसारम् । "आत्मेत्येवोपासीत" (बृ० उ० १।४।७) इति श्रुतेः । <br><br> अन्तःप्रज्ञत्वादिस्यानिधर्मप्रतिषेधः कृतः। प्रपञ्चोपशममिति जाग्रदादिस्थानधर्माभाव उच्यते। <br><br> अत एव शान्तमविक्रियम्, शिवं यतोऽद्वैतं भेदविकल्परहितम् । चतुर्थं तुरीयं मन्यन्ते; प्रतीयमानपादत्रयरूपवैलक्षण्यात्। <br><br> स आत्मा स विज्ञेय इति प्रतीयमानसर्पभूच्छिद्रदण्डादिव्यतिरिक्ता यथा रज्जुस्तथा तत्त्वमसीत्यादिवाक्यार्थ आत्मा "अदृष्टो द्रष्टा" (बृ० उ० ३।७।२३) "न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते" (बृ० उ० ४।३।२३) इत्यादिभिरुक्तो यः। स विज्ञेय | अथवा "आत्मा है—इस प्रकार ही उपासना करे" इस श्रुतिके अनुसार जिस तुरीयका ज्ञान प्राप्त करनेमें एक आत्मप्रत्यय ही सार यानी प्रमाण है वह तुरीय एकात्मप्रत्ययसार है। <br><br> अन्तःप्रज्ञत्वादि स्थानियों (जाग्रत् आदि अवस्थाओंके अभिमानियों) के धर्मोंका प्रतिषेध किया गया, अब 'प्रपञ्चोपशमम्' इत्यादिसे जाग्रत् आदि स्थानों (अवस्थाओं) के धर्मोंका अभाव बतलाया जाता है। इसीलिये वह शान्त यानी अविकारी है; और क्योंकि वह अद्वैत अर्थात् भेदरूप विकल्पसे रहित है, इसलिये शिव है। उसे चतुर्थ यानी तुरीय मानते हैं; क्योंकि यह प्रतीत होनेवाले पूर्वोक्त तीन पादोंसे विलक्षण है। वही आत्मा है और वही ज्ञातव्य है। अतः जिस प्रकार रज्जु अपनेमें प्रतीत होनेवाले सर्प, दण्ड और भूच्छिद्र आदिसे सर्वथा भिन्न है उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंका अर्थस्वरूप आत्मा, जिसका कि "अदृश्य होकर भी देखनेवाला है" "द्रष्टाकी दृष्टिका लोप नहीं होता" इत्यादि श्रुतियोंने प्रतिपादन किया है, [अपनेमें अध्यस्त जाग्रदादि अवस्थाओंसे सर्वथा भिन्न है]। वही ज्ञातव्य है |
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४२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| इति भूतपूर्वगत्या; ज्ञाते द्वैताभावः ॥ ७ ॥ | -ऐसा भूतपूर्वगतिसे* कहा जाता हैं, क्योंकि उसका ज्ञान होनेपर द्वैतका अभाव हो जाता है ॥ ७ ॥ |
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तुरीयका प्रभाव
अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थमें ये श्लोक हैं—
निवृत्ते सर्वदुःखानामीशानः प्रभुरव्ययः ।
अद्वैतः सर्वभावानां देवस्तुर्यो विभुः स्मृतः ॥ १० ॥
तुरीय आत्मा सब प्रकारके दुःखोंकी निवृत्तिमें ईशान-प्रभु (समर्थ) है। वह अविकारी, सब पदार्थोंका अद्वैतरूप, देव, तुरीय और व्यापक माना गया है ॥ १० ॥
| प्राज्ञतैजसविश्वलक्षणानां सर्वदुःखानां निवृत्तेरीशानस्तुरीय आत्मा । ईशान इत्यस्य पदस्य व्याख्यानं प्रभुरिति । दुःखनिर्वृत्तिं प्रति प्रभुर्भवतीत्यर्थः । तद्विज्ञाननिमित्तत्वादूदुःखनिर्वृत्तेः । <br><br> अव्ययो न व्येति स्वरूपान्न व्यभिचरतीति यावत् । एतत्कुतः यस्मादद्वैतः । सर्वभावानां रज्जु- | तुरीय आत्मा प्राज्ञ, तैजस और विश्वरूप समस्त दुःखोंकी निवृत्तिमें ईशान है । 'ईशान' इस पदकी व्याख्या 'प्रभु' है । तात्पर्य यह है कि वह दुःखनिवृत्तिमें समर्थ है, क्योंकि उसका विज्ञान दुःखनिवृत्तिका कारण है । <br><br> अव्यय—जो व्यय (विकार) को प्राप्त नहीं होता; अर्थात् जो स्वरूपसे व्यभिचरित यानी च्युत नहीं होता । क्यों च्युत नहीं होता ? क्योंकि वह अद्वैत है । अन्य सब |
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* अर्थात् अविद्यावस्थामें आत्मामें जो ज्ञेयत्व मान रखा था उसीका आश्रय लेकर तुरीयको 'ज्ञातव्य' कहा जाता है । वास्तवमें तो जो अव्यवहार्य और अप्रमेय है उसे ज्ञातव्य भी नहीं कहा जा सकता ।
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४३
| सर्पवन्मृषात्वात्स एष देवो द्योतनात्तुरीयश्चतुर्थो विभुर्व्यापी स्मृतः ॥१०॥ | पदार्थ रज्जुमें अध्यस्त सर्पके समान मिथ्या हैं; इसलिये प्रकाशनशील होनेके कारण वह यह देव तुर्य यानी चतुर्थ और विभु यानी व्यापक माना गया है ॥ १० ॥ |
विश्व और तेजससे तुरीयका भेद
| विश्वादीनां सामान्यविशेषभावो निरूप्यते तुर्ययाथात्म्यावधारणार्थम्— | तुरीयका यथार्थ स्वरूप समझनेके लिये विश्व आदिके सामान्य और विशेष भावका निरूपण किया जाता है— |
कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतैजसौ ।
प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तौ तुर्ये न सिध्यतः ॥ ११ ॥
विश्व और तैजस—ये दोनों कार्य (फलावस्था) और कारण (बीजावस्था) से बँधे हुए माने जाते हैं; किन्तु प्राज्ञ केवल कारणावस्थासे ही बद्ध है। तथा तुरीयमें तो ये दोनों ही नहीं हैं ॥ ११ ॥
| कार्यं क्रियत इति फलभावः । | जो किया जाय उसे कार्य कहते हैं; वह फलभाव है। और जो करता |
| कारणं करोतीति बीजभावः । | है उसे कारण कहते हैं; वह बीजभाव है। ये उपर्युक्त विश्व और |
| तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणाभ्यां | तैजस तत्त्वके अग्रहण एवं अन्यथा- |
| बीजफलभावाभ्यां तौ यथोक्तौ | ग्रहणरूप बीजभाव और फलभावसे |
| विश्वतैजसौ बद्धौ संगृहीताविष्येते । | बँधे अर्थात् सम्यक् प्रकारसे पकड़े हुए माने जाते हैं। किन्तु प्राज्ञ |
| प्राज्ञस्तु बीजभावेनैव बद्धः । | केवल बीजभावसे ही बँधा हुआ है। |
| ४४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| तत्त्वाप्रतिबोधमात्रमेव हि बीजं प्राज्ञत्वे निमित्तम् । ततो द्वौ तौ बीजफलभावौ तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणे तुर्ये न सिध्यतो न विद्येते न सम्भवत इत्यर्थः ॥११॥ | तत्त्वका अप्रतिबोधरूप बीज ही उसके प्राज्ञत्वमें कारण है । इससे तात्पर्य यह है कि तुरीयमें वे बीज और फलभावरूप तत्त्वका अग्रहण एवं अन्यथा ग्रहण दोनों ही नहीं रहते; उनकी तो वहाँ रहनेकी सम्भावना ही नहीं है ॥ ११ ॥ |
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प्राज्ञसे तुरीयका भेद
| कथं पुनःकारणबद्धत्वं प्राज्ञस्य तुरीये वा तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणलक्षणौ बन्धौ न सिध्यत इति । यस्मात्— | किन्तु प्राज्ञकी कारणबद्धता किस प्रकार है ? तथा तुरीयमें तत्त्वका अग्रहण और अन्यथाग्रहणरूप बन्धन कैसे सिद्ध नहीं होते ? इसपर कहते हैं, क्योंकि— |
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नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् ।
प्राज्ञः किञ्चन संवेत्ति तुर्यं तत्सर्वदृक्सदा ॥ १२ ॥
प्राज्ञ तो न अपनेको, न परायेको और न सत्यको अथवा अनृतको ही जानता है किन्तु वह तुरीय सर्वदा सर्वदृक् है ॥ १२ ॥
| आत्मविलक्षणमविद्याबीजप्रसूतं बाह्यं द्वैतं प्राज्ञो न किञ्चन संवेत्ति यथा विश्वतैजसौ। ततश्चासौ तत्त्वाग्रहणेन तमसान्यथाग्रहणबीजभूतेन बद्धो भवति । यस्मात्तुरीयं तत्सर्वदृक्सदा तुरीयादन्यस्या- | प्राज्ञ आत्मासे भिन्न अविद्यारूप बीजसे उत्पन्न हुए वहिःस्थित वेद्यपदार्थरूप द्वैतको कुछ भी नहीं जानता, जैसा कि विश्व और तैजस उसे जानते हैं। इसीलिये यह अन्यथाग्रहणके बीजभूत तत्त्वाग्रहणरूप अन्धकारसे बँधा रहता है। और क्योंकि तुरीयसे भिन्न पदार्थका सर्वथा अभाव होनेके |
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४५
| भावात्सर्वदा सर्वैवेति सर्वं च तद्दृक्चेति सर्वदृक्तस्मान्न तत्त्वाग्रहणलक्षणं बीजं तत्र । तत्प्रसूतस्यान्यथाग्रहणस्याप्यत एवाभावो न हि सवितरि सदा प्रकाशात्मके तद्विरुद्धमप्रकाशनमन्यथाप्रकाशनं वा सम्भवति । "न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते" (बृ० उ० ४ । ३ । २३) इति श्रुतेः । | कारण वह सदा-सर्वदा सर्वदृक्स्वरूप ही है—जो सर्वरूप और उसका साक्षी भी हो उसे ‘सर्वदृक्’ कहते हैं—इसलिये उसमें तत्त्वका अग्रहणरूप बीजावस्था नहीं है और इसीलिये उसमें उससे उत्पन्न होनेवाले अन्यथाग्रहणका भी अभाव है, क्योंकि सदा प्रकाशस्वरूप सूर्यमें उसके विपरीत अप्रकाशन अथवा अन्यथा-प्रकाशन सम्भव नहीं है, जैसा कि "द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप नहीं होता" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । |
| अथ वा जाग्रत्स्वप्नयोः सर्वभूतावस्थः सर्ववस्तुदृग्भासस्तुरीय एवेति सर्वदृक्सदा । "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ" (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्यादिश्रुतेः ॥ १२ ॥ | अथवा जाग्रत् एवं स्वप्नावस्थाके सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और समस्त पदार्थोंके साक्षीरूपसे तुरीय ही भासमान है इसलिये वह सर्वदा सर्वसाक्षी है, जैसा कि "इससे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ १२ ॥ |
द्वैतस्याग्रहणं तुल्यमुभयोः प्राज्ञतुर्ययोः ।
बीजनिद्रायुतः प्राज्ञः सा च तुर्ये न विद्यते ॥ १३ ॥
द्वैतका अग्रहण तो प्राज्ञ और तुरीय दोनोंहीको समान है, किन्तु प्राज्ञ बीजरूपा निद्रासे युक्त है और तुरीयमें वह निद्रा है नहीं ॥ १३ ॥
४६ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| निमित्तान्तरप्राप्ताशङ्कानिवृत्त्यर्थोऽयं श्लोकः । कथं द्वैताग्रहणस्य तुल्यत्वात्कारणबद्धत्वं प्राज्ञस्यैव न तुरीयस्येति प्राप्ताशङ्का निवर्त्यते ।<br><br>यस्माद्बीजनिद्रायुतस्तत्त्वाप्रतिबोधो निद्रा, सैव च विशेषप्रतिबोधप्रसवस्य बीजम्; सा बीजनिद्रा, तया युतः प्राज्ञः । सदा दृक्स्वभावत्वात्तत्त्वाप्रतिबोधलक्षणा निद्रा तुरीये न विद्यते । अतो न कारणबन्धस्तस्मिन्नित्यभिप्रायः ॥ १३ ॥ | यह श्लोक निमित्तान्तरसे प्राप्त आशंकाकी निवृत्तिके लिये है । भला द्वैताग्रहणकी समानता होनेपर भी प्राज्ञकी ही कारणबद्धता क्यों है ? तुरीयकी क्यों नहीं है ?—इस प्रकार प्राप्त हुई आशंकाको ही निवृत्त किया जाता है ।<br><br>[ इसका यह कारण है ] क्योंकि वह (प्राज्ञ) बीजनिद्रासे युक्त है—तत्त्वके अज्ञानका नाम निद्रा है, वही विशेष विज्ञानकी उत्पत्तिका बीज है; अतः उसे ‘बीजनिद्रा’ कहते हैं—प्राज्ञ उससे युक्त है । किन्तु सर्वदा सर्वदृक्स्वरूप होनेके कारण तुरीयमें वह बीजनिद्रा नहीं है; अतः उसमें कारणबद्धता नहीं है—यह इसका तात्पर्य है ॥१३॥ |
तुरीयका स्वप्न-निद्राशून्यत्व
स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौ प्राज्ञस्त्वस्वप्ननिद्रया । न निद्रां नैव च स्वप्नं तुर्ये पश्यन्ति निश्चिताः ॥ १४ ॥
विश्व और तैजस—ये स्वप्न और निद्रासे युक्त हैं तथा प्राज्ञ स्वप्नरहित निद्रासे युक्त है; किन्तु निश्चित पुरुष तुरीयमें न निद्रा ही देखते हैं और न स्वप्न ही ॥ १४ ॥
| स्वप्नोऽन्यथाग्रहणं सर्प इव रज्ज्याम् । निद्रोक्ता तत्त्वाप्रति- | रज्जुमें सर्प-ग्रहणके समान अन्यथाग्रहणका नाम स्वप्न है; तथा |
शां० भा० ] • आगम-प्रकरण ४७
| बोधलक्षणं तम इति । ताभ्यां स्वप्ननिद्राभ्यां युक्तौ विश्वतैजसौ। अतस्तौ कार्यकारणबद्धावित्युक्तौ। प्राज्ञस्तु स्वप्नवर्जितकेवलयैव निद्रया युत इति कारणबद्ध इत्युक्तम् । नोभयं पश्यन्ति तुरीये निश्चिता ब्रह्मविदो विरुद्धत्वात् सवितरीव तमः । अतो न कार्य-कारणबद्ध इत्युक्तस्तुरीयः ॥१४॥ | तत्त्वके अप्रतिबोधरूप तमको निद्रा कहते हैं । उन स्वप्न और निद्रासे विश्व और तैजस युक्त हैं; अतः वे कार्यकारणबद्ध कहे गये हैं । किन्तु प्राज्ञ तो स्वप्नरहित केवल निद्रासे ही युक्त है; इसलिये उसे कारणबद्ध कहा है। निश्चित यानी ब्रह्मवेत्ता-लोग तुरीयमें ये दोनों ही बातें नहीं देखते, क्योंकि सूर्यमें अन्धकारके समान वे उससे विरुद्ध हैं। अतः तुरीय कार्य अथवा कारणसे बँधा हुआ नहीं है—ऐसा कहा गया है ॥ १४ ॥ |
| कदा तुरीये निश्चितो भवतीत्युच्यते— | अब यह बतलाया जाता है कि मनुष्य तुरीयमें कब निश्चित होता है— |
अन्यथा गृण्हतः स्वप्नो निद्रा तत्त्वमजानतः ।
विपर्यासे तयोः क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते ॥ १५ ॥
अन्यथा ग्रहण करनेसे स्वप्न होता है तथा तत्त्वको न जाननेसे निद्रा होती है । और इन दोनों विपरीत ज्ञानोंका क्षय हो जानेपर तुरीय पदकी प्राप्ति होती है ॥ १५ ॥
| • स्वप्नजागरितयोरन्यथा रज्जवां सर्प इव गृह्णतस्तत्त्वं स्वप्नो भवति । निद्रा तत्त्वमजानतस्तिसृष्व- | रज्जुमें सर्पग्रहणके समान स्वप्न और जागरित अवस्थाओंमें तत्त्वके अन्यथाग्रहणसे स्वप्न होता है तथा तत्त्वके न जाननेसे निद्रा होती है, |
४८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| वस्थासु तुल्या । स्वप्ननिद्रयोस्तुल्यत्वाद्विश्वतैजसयोरेकराशित्वम् । अन्यथाग्रहणप्राधान्याच्च गुणभूता निद्रेति तस्मिन्विपर्यासः स्वप्नः । तृतीये तु स्थाने तत्त्वाज्ञानलक्षणा निद्रैव केवला विपर्यासः । <br><br> अतस्तयोः कार्यकारणस्थानयोरन्यथाग्रहणाग्रहणलक्षणविपर्यासे कार्यकारणबन्धरूपे परमार्थतत्त्वप्रतिबोधात् क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते । तदोभयलक्षणं बन्धरूपं तत्रापश्यंस्तुरीये निश्चितो भवतीत्यर्थः ॥ १५ ॥ | जो तीनों अवस्थाओंमें तुल्य है । इस प्रकार स्वप्न और निद्रामें तुल्य होनेके कारण विश्व और तैजसकी एक राशि है । उनमें अन्यथाग्रहणकी प्रधानता होनेके कारण निद्रा गौण है; अतः उन अवस्थाओंमें स्वप्नरूप विपरीत ज्ञान रहता है । किन्तु तृतीय स्थान ( सुषुप्ति ) में केवल तत्त्वाग्रहणरूप निद्रा ही विपर्यास है । <br><br> अतः उन कार्यकारणरूप स्थानोंके अन्यथाग्रहण और तत्त्वाग्रहणरूप विपर्यासोंका परमार्थतत्त्वके बोधसे क्षय हो जानेपर तुरीय पदकी प्राप्ति होती है । तब उस अवस्थामें दोनों प्रकारका बन्धन न देखनेसे पुरुष तुरीयमें निश्चित हो जाता है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १५ ॥ |
बोध कब होता है ?
अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते ।
अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुध्यते तदा ॥ १६ ॥
जिस समय अनादि मायासे सोया हुआ जीव जागता है [ अर्थात् तत्त्वज्ञान लाभ करता है ] उसी समय उसे अज, अनिद्र और स्वप्नरहित अद्वैत आत्मतत्त्वका बोध प्राप्त होता है ॥ १६ ॥
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४९
| योऽयं संसारी जीवः स उभयलक्षणेन तत्त्वाप्रतिबोधरूपेण बीजात्मनान्यथाग्रहणलक्षणेन च अनादिकालप्रवृत्तेन मायालक्षणेन स्वप्नेन ममायं पिता पुत्रोऽयं नप्ता क्षेत्रं पशवोऽहमेषां स्वामी सुखी दुःखी क्षयितोऽहमनेन वर्धितश्चानेनेत्येवंप्रकारान्स्वप्नान् स्थानद्वयेऽपि पश्यन्सुप्तः । | यह जो संसारी जीव है वह तत्त्वाप्रतिबोधरूप बीजात्मिका एवं अन्यथाग्रहणरूप अनादिकालसे प्रवृत्त मायारूप निद्राके कारण [ स्वप्न और जागरित ] दोनों ही अवस्थाओंमें 'यह मेरा पिता है, यह पुत्र है, यह नाती है, ये मेरे क्षेत्र, गृह और पशु हैं, मैं इनका स्वामी हूँ तथा इनके कारण सुखी-दुःखी, क्षीण और वृद्धिको प्राप्त होता हूँ' इत्यादि प्रकारके स्वप्न देखता हुआ सो रहा है । |
| यदा वेदान्तार्थतत्त्वाभिज्ञेन परमकारुणिकेन गुरुणा नास्येवं त्वं हेतुफलात्मकः किं तु तत्त्वमसीति प्रतिबोध्यमानः, तदैवं प्रतिबुध्यते— | जिस समय वेदान्तार्थके तत्त्वको जाननेवाले किसी परम कारुणिक गुरुके द्वारा 'तू इस प्रकार हेतु एवं फलरूप नहीं है, किन्तु तू वही है' इस प्रकार जगाया जाता है उस समय उसे ऐसा बोध प्राप्त होता है— |
| कथम् ? नास्मिन्बाह्यमाभ्यन्तरं वा जन्मादिभावविकारोऽस्त्यतोऽजं सबाह्याभ्यन्तरसर्वभावविकारवर्जितमित्यर्थः । यस्माज्जन्मादिकारणभूतं नास्मिन्नविद्यातमोबीजं निद्रा विद्यत इत्यनिद्रम् । अनिद्रं | किस प्रकारका बोध होता है ? [ सो बतलाते हैं— ] इसमें बाह्य अथवा आभ्यन्तर जन्मादि विकार नहीं है, इसलिये यह अजन्मा यानी सम्पूर्ण भाव-विकारोंसे रहित है । और क्योंकि इसमें जन्मादिकी कारणभूत तथा अविद्यारूप अन्धकारकी बीजभूत अविद्या नहीं है इसलिये यह अनिद्र है । वह तुरीय |
७-८
| ५० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| हि ततुरीयमत एवास्वप्नम्ः तन्निमित्तत्वादिन्यथाग्रहणस्य । यस्माच्चानिद्रमस्वप्नं तस्मादजमद्वैतं तुरीयमात्मानं बुद्ध्यते तदा ॥१६॥ | अनिद्र है, इसलिये अस्वप्न भी है; क्योंकि अन्यथाग्रहण तो [ तत्त्वाप्रतिबोधरूप ] निद्राहीके कारण हुआ करता है । इस प्रकार क्योंकि वह अनिद्र और अस्वप्न है इसलिये ही उस समय अजन्मा और अद्वैत तुरीय आत्माका बोध होता है ॥१६॥ |
| प्रपञ्चनिवृत्त्या चेत्प्रतिबुद्ध्यतेऽनिवृत्ते प्रपञ्चे कथमद्वैतमित्युच्यते— | यदि बोध प्रपञ्चनिवृत्तिसे ही होता है तो जबतक प्रपञ्चकी निवृत्ति न हो तबतक अद्वैत कैसा? इसपर कहा जाता है— |
प्रपञ्चका अत्यन्ताभाव
प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।
मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥ १७ ॥
प्रपञ्च यदि होता तो निवृत्त हो जाता—इसमें सन्देह नहीं । किन्तु [ वास्तवमें ] यह द्वैत तो मायामात्र है, परमार्थतः तो अद्वैत ही है ॥ १७ ॥
| सत्यमेवं स्यात्प्रपञ्चो यदि विद्येत, रज्ज्वां सर्प इव कल्पितत्वान्न तु स विद्यते । विद्यमानश्चेन्निवर्तेत न संशयः । न हि रज्ज्वां भ्रान्तिबुद्ध्या कल्पितः सर्पो विद्यमानः | यदि प्रपञ्च विद्यमान होता तो सचमुच ऐसा ही होता; किन्तु वह तो रज्जुमें सर्पके समान कल्पित होनेके कारण [ वस्तुतः ] है ही नहीं । यदि वह होता तो, इसमें सन्देह नहीं, निवृत्त भी हो जाता । रज्जुमें भ्रमबुद्धिसे कल्पना किया हुआ सर्प [ वस्तुतः ] विद्यमान |
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५१
| सन्निवेकतो निवृत्तः । नैव माया मायाविना प्रयुक्ता तद्दर्शिनां चक्षुर्बन्धापगमे विद्यमाना सती निवृत्ता । तथेदं प्रपञ्चाख्यं मायामात्रं द्वैतं रज्जुवन्मायाविवच्चाद्वैतं परमार्थतस्तस्मान्न कश्चित्प्रपञ्चः प्रवृत्तो निवृत्तो वास्तीत्यभिप्रायः ॥ १७ ॥ | रहते हुए विवेकसे निवृत्त नहीं होता । मायावीद्वारा फैलायी हुई माया, देखनेवालोंके दृष्टिवन्धनके हटाये जानेपर, पहले विद्यमान रहती हुई निवृत्त नहीं होती । इसी प्रकार यह प्रपञ्चसंज्ञक द्वैत भी मायामात्र ही है; परमार्थतः तो रज्जु अथवा मायावीके समान अद्वैत ही है । अतः तात्पर्य यह है कि कोई भी प्रपञ्च प्रवृत्त अथवा निवृत्त होनेवाला नहीं है ॥ १७ ॥ |
गुरु-शिष्यादि विकल्प व्यावहारिक है
| ननु शास्ता शास्त्रं शिष्य इति विकल्पः कथं निवर्तेत इत्युच्यते— | यदि कहो कि शासक, शास्त्र और शिष्य—इस प्रकारका विकल्प किस प्रकार निवृत्त हो सकता है ? तो इसपर कहा जाता है— |
विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।
उपदेशादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥ १८ ॥
इस [ गुरु-शिष्यादि ] विकल्पकी यदि किसीने कल्पना की होती तो यह निवृत्त भी हो जाता । यह [ गुरु-शिष्यादि ] वाद तो उपदेशके ही लिये है । आत्मज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं रहता ॥ १८ ॥
| विकल्पो विनिवर्तेत यदि केनचित्कल्पितः स्यात् । यथायं प्रपञ्चो मायारज्जुसर्पवत्तथायं | यदि किसीने इसकी कल्पना की होती तो यह विकल्प निवृत्त हो जाता । जिस प्रकार यह प्रपञ्च माया और रज्जुसर्पके सदृश है उसी |
| ५२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| शिष्यादिभेदविकल्पोऽपि प्राक् प्रतिबोधादेवोपदेशनिमित्तोऽत उपदेशादयं वादः शिष्यः शास्ता शास्त्रमिति । उपदेशकार्ये तु ज्ञाने निर्वृत्ते ज्ञाते परमार्थतत्त्वे द्वैतं न विद्यते ॥ १८ ॥ | प्रकार यह शिष्यादि भेदविकल्प भी आत्मज्ञानसे पूर्व ही उपदेशके निमित्तसे है। अतः शिष्य, शासक और शास्त्र—यह वाद उपदेशके ही लिये है। उपदेशके कार्यस्वरूप ज्ञानके निष्पन्न होनेपर, अर्थात् परमार्थतत्त्वका ज्ञान हो जानेपर द्वैतकी सत्ता नहीं रहती ॥ १८ ॥ |
आत्मा और उसके पादोंके साथ ओंकार और उसकी मात्राओंका तादात्म्य
| अभिधेयप्रधान ओङ्कारश्चतुष्पादात्मेति व्याख्यातो यः— | अबतक जिस ओंकाररूप चतुष्पाद् आत्माका अभिधेय (वाच्यार्थ) की प्रधानतासे वर्णन किया है— |
सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥
वह यह आत्मा अक्षरदृष्टिसे ओंकार है; वह मात्राओंको विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही पाद हैं; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं ॥ ८ ॥
| सोऽयमात्माध्यक्षरमक्षरमधिकृत्याभिधानप्राधान्येन वर्ण्यमानोऽध्यक्षरम् । किं पुनस्तदक्षरमित्याह, ओङ्कारः । सोऽयमोङ्कारः पादशः प्रविभज्यमानः, | वह यह आत्मा अध्यक्षर है; अक्षरका आश्रय लेकर जिसका अभिधानकी प्रधानतासे वर्णन किया जाय उसे अध्यक्षर कहते हैं। किन्तु वह अक्षर है क्या ? इसपर कहते हैं—वह ओंकार है। वह यह ओंकार पादरूपसे विभक्त किये जानेपर अधिमात्र यानी |
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५३
| अधिमात्रं मात्रामधिकृत्य वर्तत इत्यधिमात्रम् । कथम् ? आत्मनो ये पादास्त ओङ्कारस्य मात्राः । कास्ताः ? अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥ | मात्राको आश्रय करके वर्तमान रहता है, इसलिये इसे 'अधिमात्र' कहते हैं । सो किस प्रकार ? क्यों-कि आत्माके जो पाद हैं वे ही ओंकारकी मात्राएँ हैं । वे मात्राएँ कौन-सी हैं ? अकार, उकार और मकार—ये ही [वे मात्राएँ हैं] ॥८॥ |
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अकार और विश्वका तादात्म्य
| तत्र विशेषनियमः क्रियते— | अब उनमें विशेष नियम किया जाता है— |
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जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा-
प्तेरादिमत्त्वाद्वाप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति
य एवं वेद ॥ ९ ॥
जिसका जागरित स्थान है वह वैश्वानर व्याप्ति और आदिमत्त्वके कारण [ ओंकारकी ] पहली मात्रा अकार है । जो उपासक इस प्रकार जानता है वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और [महापुरुषोंमें] आदि ( प्रधान ) होता है ॥ ९ ॥
| जागरितस्थानो वैश्वानरो यः स ओङ्कारस्याकारः प्रथमा मात्रा । केन सामान्येनेत्याह—आप्तेराप्ति-र्व्याप्तिकारेण सर्वा वाग्व्याप्ता “अकारो वै सर्वा वाक्” ( ऐ० आ० २ । ३ । ६ ) इति श्रुतेः । | जो जागरित स्थानवाला वैश्वानर है वही ओंकारकी पहली मात्रा अकार है । किस समानताके कारण पहली मात्रा है—इसपर कहते हैं—आप्तिके कारण, आप्तिका अर्थ व्याप्ति है । “अकार निश्चय ही सम्पूर्ण वाणी है” इस श्रुतिके अनुसार अकारसे समस्त वाणी व्याप्त है । |
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५४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| तथा वैश्वानरेण जगत्; "तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाः" ( छा० उ० ५ । १८ । २) इत्यादिश्रुतेः ।<br><br> अभिधानाभिधेययोरेकत्वं चावोचाम । आदिरस्य विद्यत इत्यातिमद्यथैवादिमदकाराख्यमक्षरं तथैव वैश्वानरस्तस्माद्वा सामान्यादकारत्वं वैश्वानरस्य ।<br><br> तदेकत्वविदः फलमाह—आप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिः प्रथमश्च भवति महतां य एवं वेद, यथोक्तमेकत्वं वेदेत्यर्थः ॥ ९ ॥ | तथा "उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही द्युलोक है" इस श्रुतिके अनुसार वैश्वानरसे सारा जगत् व्याप्त है ।<br><br> अभिधान (वाचक) और अभिधेय (वाच्य) की एकता तो हम कह ही चुके हैं । जिसमें आदि (प्रथमता) हो उसे आदिमत् कहते हैं । जिस प्रकार अकार नामक अक्षर आदिमान् है उसी प्रकार वैश्वानर भी है । उसी समानताके कारण वैश्वानरकी अकाररूपता है । उनकी एकता जाननेवालेके लिये फल बतलाया जाता है—'जो पुरुष ऐसा जानता है अर्थात् उपर्युक्त एकत्वको जाननेवाला है वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा महापुरुषोंमें आदि—प्रथम होता है' ॥ ९ ॥ |
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उकार और तैजसका तादात्म्य
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षा-
दुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति
नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५५
स्वप्न जिसका स्थान है वह तैजस उत्कर्ष तथा मध्यवर्तित्वके कारण ओंकारकी द्वितीय मात्रा उकार है। जो उपासक ऐसा जानता है वह अपनी ज्ञानसन्तानका उत्कर्ष करता है, सबके प्रति समान होता है और उसके वंशमें कोई ब्रह्मज्ञानहीन पुरुष नहीं होता ॥ १० ॥
| स्वप्नस्थानस्तैजसो यः स ओङ्कारस्योकारो द्वितीया मात्रा । केन सामान्येनेत्याह-उत्कर्षात् । अकारादुत्कृष्ट इव ह्युकारस्तथा तैजसो विश्वादुभयत्वाद्वाकारमकारयोर्मध्यस्थ उकारस्तथा विश्वप्राज्ञयोर्मध्ये तैजसोऽत उभयभाक्त्वसामान्यात् । | जो स्वप्नस्थानवाला तैजस है वह ओंकारकी दूसरी मात्रा उकार है। किस समानताके कारण दूसरी मात्रा है—इसपर कहते हैं—उत्कर्ष-के कारण। जिस प्रकार अकारसे उकार उत्कृष्ट-सा है उसी प्रकार विश्वसे तैजस उत्कृष्ट है । अथवा मध्यवर्तित्वके कारण [ उन दोनोंमें समानता है ] । जिस प्रकार उकार अकार और मकारके मध्यमें स्थित है उसी प्रकार विश्व और प्राज्ञके मध्यमें तैजस है । अतः उभयपरत्वरूप समानताके कारण भी [ उनमें अभिन्नता है ] । |
| विद्वत्फलमुच्यते—उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिम् । विज्ञानसन्ततिं वर्धयतीत्यर्थः । समानस्तुल्यश्च मित्रपक्षस्येव शत्रु पक्षाणामप्यप्रद्वेष्यो भवति । अब्रह्मविदस्य कुले न भवति य एवं वेद ॥१०॥ | अब इस प्रकार जाननेवालेको जो फल मिलता है वह बतलाया जाता है—जो इस प्रकार जानता है वह ज्ञानसन्तति अर्थात् विज्ञान-सन्तानका उत्कर्ष यानी वृद्धि करता है, सबके प्रति समान-तुल्य होता है अर्थात् मित्रपक्षके समान शत्रु-पक्षका भी अद्वेष्य होता है तथा उसके कुलमें कोई ब्रह्मज्ञानहीन पुरुष नहीं होता ॥ १० ॥ |