माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ४० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| इतरेतरव्यभिचाराद्रज्जुवादाविव सर्पधारादिविकल्पितभेदवत् सर्वत्राव्यभिचाराद्रज्जुस्वरूपस्य सत्यत्वम् । <br><br> सुषुप्ते व्यभिचरतीति चेन्न । सुषुप्तस्यानुभूयमानत्वात् । “न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ० ४।३।३०) इति श्रुतेः । <br><br> अत एवादृष्टम् । यस्माददृष्टं तस्मादव्यवहार्यम् । अग्राह्यं कर्मेन्द्रियैः। अलक्षणमलिङ्गमित्येतद्-ननुमेयमित्यर्थः । अत एवाचिन्त्यम् । अत एवाव्यपदेश्यं शब्दैः । एकात्मप्रत्ययसारं जाग्रदादिस्थानेष्वेकोऽयमात्मेत्यव्यभिचारी यः प्रत्ययस्तेनानुसरणीयम् । अथ वैक आत्मप्रत्ययः | धारा आदि विकल्पभेदोंके समान उनके चित्स्वरूपमें कोई भेद न होनेपर भी परस्पर एक-दूसरेका व्यभिचार होनेके कारण वे असद्रूप हैं । किन्तु चित्स्वरूपका कहीं भी व्यभिचार नहीं है; इसलिये वह सत्य है । <br><br> यदि कहो कि सुषुप्तिमें उसका व्यभिचार होता है तो ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिका भी अनुभव हुआ करता है; जैसा कि “विज्ञाताकी विज्ञातिका लोप नहीं होता” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है । <br><br> इसीलिये वह अदृश्य है । और क्योंकि अदृश्य है इसलिये अव्यवहार्य है तथा कर्मेन्द्रियोंसे अग्राह्य और अलक्षण यानी लिङ्गरहित है । तात्पर्य यह है कि उसका अनुमान नहीं किया जा सकता । इसीसे वह अचिन्त्य है अतएव शब्दोंद्वारा अकथनीय है । वह एकात्मप्रत्ययसार है । अर्थात् जाग्रत् आदि स्थानोंमें एक ही आत्मा है—ऐसा जो अव्यभिचारी प्रत्यय है उससे अनुसरण किये जाने योग्य है । |
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