माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४१
| सारं प्रमाणं यस्य तुरीयस्याधिगमे तत्तुरीयमेकात्मप्रत्ययसारम् । "आत्मेत्येवोपासीत" (बृ० उ० १।४।७) इति श्रुतेः । <br><br> अन्तःप्रज्ञत्वादिस्यानिधर्मप्रतिषेधः कृतः। प्रपञ्चोपशममिति जाग्रदादिस्थानधर्माभाव उच्यते। <br><br> अत एव शान्तमविक्रियम्, शिवं यतोऽद्वैतं भेदविकल्परहितम् । चतुर्थं तुरीयं मन्यन्ते; प्रतीयमानपादत्रयरूपवैलक्षण्यात्। <br><br> स आत्मा स विज्ञेय इति प्रतीयमानसर्पभूच्छिद्रदण्डादिव्यतिरिक्ता यथा रज्जुस्तथा तत्त्वमसीत्यादिवाक्यार्थ आत्मा "अदृष्टो द्रष्टा" (बृ० उ० ३।७।२३) "न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते" (बृ० उ० ४।३।२३) इत्यादिभिरुक्तो यः। स विज्ञेय | अथवा "आत्मा है—इस प्रकार ही उपासना करे" इस श्रुतिके अनुसार जिस तुरीयका ज्ञान प्राप्त करनेमें एक आत्मप्रत्यय ही सार यानी प्रमाण है वह तुरीय एकात्मप्रत्ययसार है। <br><br> अन्तःप्रज्ञत्वादि स्थानियों (जाग्रत् आदि अवस्थाओंके अभिमानियों) के धर्मोंका प्रतिषेध किया गया, अब 'प्रपञ्चोपशमम्' इत्यादिसे जाग्रत् आदि स्थानों (अवस्थाओं) के धर्मोंका अभाव बतलाया जाता है। इसीलिये वह शान्त यानी अविकारी है; और क्योंकि वह अद्वैत अर्थात् भेदरूप विकल्पसे रहित है, इसलिये शिव है। उसे चतुर्थ यानी तुरीय मानते हैं; क्योंकि यह प्रतीत होनेवाले पूर्वोक्त तीन पादोंसे विलक्षण है। वही आत्मा है और वही ज्ञातव्य है। अतः जिस प्रकार रज्जु अपनेमें प्रतीत होनेवाले सर्प, दण्ड और भूच्छिद्र आदिसे सर्वथा भिन्न है उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंका अर्थस्वरूप आत्मा, जिसका कि "अदृश्य होकर भी देखनेवाला है" "द्रष्टाकी दृष्टिका लोप नहीं होता" इत्यादि श्रुतियोंने प्रतिपादन किया है, [अपनेमें अध्यस्त जाग्रदादि अवस्थाओंसे सर्वथा भिन्न है]। वही ज्ञातव्य है |
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