भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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४२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


इति भूतपूर्वगत्या; ज्ञाते द्वैताभावः ॥ ७ ॥-ऐसा भूतपूर्वगतिसे* कहा जाता हैं, क्योंकि उसका ज्ञान होनेपर द्वैतका अभाव हो जाता है ॥ ७ ॥

तुरीयका प्रभाव

अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थमें ये श्लोक हैं—

निवृत्ते सर्वदुःखानामीशानः प्रभुरव्ययः ।
अद्वैतः सर्वभावानां देवस्तुर्यो विभुः स्मृतः ॥ १० ॥

तुरीय आत्मा सब प्रकारके दुःखोंकी निवृत्तिमें ईशान-प्रभु (समर्थ) है। वह अविकारी, सब पदार्थोंका अद्वैतरूप, देव, तुरीय और व्यापक माना गया है ॥ १० ॥

प्राज्ञतैजसविश्वलक्षणानां सर्वदुःखानां निवृत्तेरीशानस्तुरीय आत्मा । ईशान इत्यस्य पदस्य व्याख्यानं प्रभुरिति । दुःखनिर्वृत्तिं प्रति प्रभुर्भवतीत्यर्थः । तद्विज्ञाननिमित्तत्वादूदुःखनिर्वृत्तेः । <br><br> अव्ययो न व्येति स्वरूपान्न व्यभिचरतीति यावत् । एतत्कुतः यस्मादद्वैतः । सर्वभावानां रज्जु-तुरीय आत्मा प्राज्ञ, तैजस और विश्वरूप समस्त दुःखोंकी निवृत्तिमें ईशान है । 'ईशान' इस पदकी व्याख्या 'प्रभु' है । तात्पर्य यह है कि वह दुःखनिवृत्तिमें समर्थ है, क्योंकि उसका विज्ञान दुःखनिवृत्तिका कारण है । <br><br> अव्यय—जो व्यय (विकार) को प्राप्त नहीं होता; अर्थात् जो स्वरूपसे व्यभिचरित यानी च्युत नहीं होता । क्यों च्युत नहीं होता ? क्योंकि वह अद्वैत है । अन्य सब

* अर्थात् अविद्यावस्थामें आत्मामें जो ज्ञेयत्व मान रखा था उसीका आश्रय लेकर तुरीयको 'ज्ञातव्य' कहा जाता है । वास्तवमें तो जो अव्यवहार्य और अप्रमेय है उसे ज्ञातव्य भी नहीं कहा जा सकता ।