भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४३


सर्पवन्मृषात्वात्स एष देवो द्योतनात्तुरीयश्चतुर्थो विभुर्व्यापी स्मृतः ॥१०॥पदार्थ रज्जुमें अध्यस्त सर्पके समान मिथ्या हैं; इसलिये प्रकाशनशील होनेके कारण वह यह देव तुर्य यानी चतुर्थ और विभु यानी व्यापक माना गया है ॥ १० ॥

विश्व और तेजससे तुरीयका भेद

विश्वादीनां सामान्यविशेषभावो निरूप्यते तुर्ययाथात्म्यावधारणार्थम्—तुरीयका यथार्थ स्वरूप समझनेके लिये विश्व आदिके सामान्य और विशेष भावका निरूपण किया जाता है—

कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतैजसौ ।
प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तौ तुर्ये न सिध्यतः ॥ ११ ॥

विश्व और तैजस—ये दोनों कार्य (फलावस्था) और कारण (बीजावस्था) से बँधे हुए माने जाते हैं; किन्तु प्राज्ञ केवल कारणावस्थासे ही बद्ध है। तथा तुरीयमें तो ये दोनों ही नहीं हैं ॥ ११ ॥

कार्यं क्रियत इति फलभावः ।जो किया जाय उसे कार्य कहते हैं; वह फलभाव है। और जो करता
कारणं करोतीति बीजभावः ।है उसे कारण कहते हैं; वह बीजभाव है। ये उपर्युक्त विश्व और
तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणाभ्यांतैजस तत्त्वके अग्रहण एवं अन्यथा-
बीजफलभावाभ्यां तौ यथोक्तौग्रहणरूप बीजभाव और फलभावसे
विश्वतैजसौ बद्धौ संगृहीताविष्येते ।बँधे अर्थात् सम्यक् प्रकारसे पकड़े हुए माने जाते हैं। किन्तु प्राज्ञ
प्राज्ञस्तु बीजभावेनैव बद्धः ।केवल बीजभावसे ही बँधा हुआ है।