माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| ४४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| तत्त्वाप्रतिबोधमात्रमेव हि बीजं प्राज्ञत्वे निमित्तम् । ततो द्वौ तौ बीजफलभावौ तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणे तुर्ये न सिध्यतो न विद्येते न सम्भवत इत्यर्थः ॥११॥ | तत्त्वका अप्रतिबोधरूप बीज ही उसके प्राज्ञत्वमें कारण है । इससे तात्पर्य यह है कि तुरीयमें वे बीज और फलभावरूप तत्त्वका अग्रहण एवं अन्यथा ग्रहण दोनों ही नहीं रहते; उनकी तो वहाँ रहनेकी सम्भावना ही नहीं है ॥ ११ ॥ |
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प्राज्ञसे तुरीयका भेद
| कथं पुनःकारणबद्धत्वं प्राज्ञस्य तुरीये वा तत्त्वाग्रहणान्यथाग्रहणलक्षणौ बन्धौ न सिध्यत इति । यस्मात्— | किन्तु प्राज्ञकी कारणबद्धता किस प्रकार है ? तथा तुरीयमें तत्त्वका अग्रहण और अन्यथाग्रहणरूप बन्धन कैसे सिद्ध नहीं होते ? इसपर कहते हैं, क्योंकि— |
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नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् ।
प्राज्ञः किञ्चन संवेत्ति तुर्यं तत्सर्वदृक्सदा ॥ १२ ॥
प्राज्ञ तो न अपनेको, न परायेको और न सत्यको अथवा अनृतको ही जानता है किन्तु वह तुरीय सर्वदा सर्वदृक् है ॥ १२ ॥
| आत्मविलक्षणमविद्याबीजप्रसूतं बाह्यं द्वैतं प्राज्ञो न किञ्चन संवेत्ति यथा विश्वतैजसौ। ततश्चासौ तत्त्वाग्रहणेन तमसान्यथाग्रहणबीजभूतेन बद्धो भवति । यस्मात्तुरीयं तत्सर्वदृक्सदा तुरीयादन्यस्या- | प्राज्ञ आत्मासे भिन्न अविद्यारूप बीजसे उत्पन्न हुए वहिःस्थित वेद्यपदार्थरूप द्वैतको कुछ भी नहीं जानता, जैसा कि विश्व और तैजस उसे जानते हैं। इसीलिये यह अन्यथाग्रहणके बीजभूत तत्त्वाग्रहणरूप अन्धकारसे बँधा रहता है। और क्योंकि तुरीयसे भिन्न पदार्थका सर्वथा अभाव होनेके |
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