भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 65

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४५


भावात्सर्वदा सर्वैवेति सर्वं च तद्दृक्चेति सर्वदृक्तस्मान्न तत्त्वाग्रहणलक्षणं बीजं तत्र । तत्प्रसूतस्यान्यथाग्रहणस्याप्यत एवाभावो न हि सवितरि सदा प्रकाशात्मके तद्विरुद्धमप्रकाशनमन्यथाप्रकाशनं वा सम्भवति । "न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते" (बृ० उ० ४ । ३ । २३) इति श्रुतेः ।कारण वह सदा-सर्वदा सर्वदृक्स्वरूप ही है—जो सर्वरूप और उसका साक्षी भी हो उसे ‘सर्वदृक्’ कहते हैं—इसलिये उसमें तत्त्वका अग्रहणरूप बीजावस्था नहीं है और इसीलिये उसमें उससे उत्पन्न होनेवाले अन्यथाग्रहणका भी अभाव है, क्योंकि सदा प्रकाशस्वरूप सूर्यमें उसके विपरीत अप्रकाशन अथवा अन्यथा-प्रकाशन सम्भव नहीं है, जैसा कि "द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप नहीं होता" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ।
अथ वा जाग्रत्स्वप्नयोः सर्वभूतावस्थः सर्ववस्तुदृग्भासस्तुरीय एवेति सर्वदृक्सदा । "नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ" (बृ० उ० ३ । ८ । ११) इत्यादिश्रुतेः ॥ १२ ॥अथवा जाग्रत् एवं स्वप्नावस्थाके सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और समस्त पदार्थोंके साक्षीरूपसे तुरीय ही भासमान है इसलिये वह सर्वदा सर्वसाक्षी है, जैसा कि "इससे भिन्न और कोई द्रष्टा नहीं है" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ १२ ॥

द्वैतस्याग्रहणं तुल्यमुभयोः प्राज्ञतुर्ययोः ।

बीजनिद्रायुतः प्राज्ञः सा च तुर्ये न विद्यते ॥ १३ ॥

द्वैतका अग्रहण तो प्राज्ञ और तुरीय दोनोंहीको समान है, किन्तु प्राज्ञ बीजरूपा निद्रासे युक्त है और तुरीयमें वह निद्रा है नहीं ॥ १३ ॥

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित) · पृष्ठ 65, कुल 301 में से · BharatKosha