भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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४६ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


निमित्तान्तरप्राप्ताशङ्कानिवृत्त्यर्थोऽयं श्लोकः । कथं द्वैताग्रहणस्य तुल्यत्वात्कारणबद्धत्वं प्राज्ञस्यैव न तुरीयस्येति प्राप्ताशङ्का निवर्त्यते ।<br><br>यस्माद्बीजनिद्रायुतस्तत्त्वाप्रतिबोधो निद्रा, सैव च विशेषप्रतिबोधप्रसवस्य बीजम्; सा बीजनिद्रा, तया युतः प्राज्ञः । सदा दृक्स्वभावत्वात्तत्त्वाप्रतिबोधलक्षणा निद्रा तुरीये न विद्यते । अतो न कारणबन्धस्तस्मिन्नित्यभिप्रायः ॥ १३ ॥यह श्लोक निमित्तान्तरसे प्राप्त आशंकाकी निवृत्तिके लिये है । भला द्वैताग्रहणकी समानता होनेपर भी प्राज्ञकी ही कारणबद्धता क्यों है ? तुरीयकी क्यों नहीं है ?—इस प्रकार प्राप्त हुई आशंकाको ही निवृत्त किया जाता है ।<br><br>[ इसका यह कारण है ] क्योंकि वह (प्राज्ञ) बीजनिद्रासे युक्त है—तत्त्वके अज्ञानका नाम निद्रा है, वही विशेष विज्ञानकी उत्पत्तिका बीज है; अतः उसे ‘बीजनिद्रा’ कहते हैं—प्राज्ञ उससे युक्त है । किन्तु सर्वदा सर्वदृक्स्वरूप होनेके कारण तुरीयमें वह बीजनिद्रा नहीं है; अतः उसमें कारणबद्धता नहीं है—यह इसका तात्पर्य है ॥१३॥

तुरीयका स्वप्न-निद्राशून्यत्व

स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौ प्राज्ञस्त्वस्वप्ननिद्रया । न निद्रां नैव च स्वप्नं तुर्ये पश्यन्ति निश्चिताः ॥ १४ ॥

विश्व और तैजस—ये स्वप्न और निद्रासे युक्त हैं तथा प्राज्ञ स्वप्नरहित निद्रासे युक्त है; किन्तु निश्चित पुरुष तुरीयमें न निद्रा ही देखते हैं और न स्वप्न ही ॥ १४ ॥

स्वप्नोऽन्यथाग्रहणं सर्प इव रज्ज्याम् । निद्रोक्ता तत्त्वाप्रति-रज्जुमें सर्प-ग्रहणके समान अन्यथाग्रहणका नाम स्वप्न है; तथा