भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

शां० भा० ] • आगम-प्रकरण ४७


बोधलक्षणं तम इति । ताभ्यां स्वप्ननिद्राभ्यां युक्तौ विश्वतैजसौ। अतस्तौ कार्यकारणबद्धावित्युक्तौ। प्राज्ञस्तु स्वप्नवर्जितकेवलयैव निद्रया युत इति कारणबद्ध इत्युक्तम् । नोभयं पश्यन्ति तुरीये निश्चिता ब्रह्मविदो विरुद्धत्वात् सवितरीव तमः । अतो न कार्य-कारणबद्ध इत्युक्तस्तुरीयः ॥१४॥तत्त्वके अप्रतिबोधरूप तमको निद्रा कहते हैं । उन स्वप्न और निद्रासे विश्व और तैजस युक्त हैं; अतः वे कार्यकारणबद्ध कहे गये हैं । किन्तु प्राज्ञ तो स्वप्नरहित केवल निद्रासे ही युक्त है; इसलिये उसे कारणबद्ध कहा है। निश्चित यानी ब्रह्मवेत्ता-लोग तुरीयमें ये दोनों ही बातें नहीं देखते, क्योंकि सूर्यमें अन्धकारके समान वे उससे विरुद्ध हैं। अतः तुरीय कार्य अथवा कारणसे बँधा हुआ नहीं है—ऐसा कहा गया है ॥ १४ ॥

कदा तुरीये निश्चितो भवतीत्युच्यते—अब यह बतलाया जाता है कि मनुष्य तुरीयमें कब निश्चित होता है—

अन्यथा गृण्हतः स्वप्नो निद्रा तत्त्वमजानतः ।
विपर्यासे तयोः क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते ॥ १५ ॥

अन्यथा ग्रहण करनेसे स्वप्न होता है तथा तत्त्वको न जाननेसे निद्रा होती है । और इन दोनों विपरीत ज्ञानोंका क्षय हो जानेपर तुरीय पदकी प्राप्ति होती है ॥ १५ ॥

• स्वप्नजागरितयोरन्यथा रज्जवां सर्प इव गृह्णतस्तत्त्वं स्वप्नो भवति । निद्रा तत्त्वमजानतस्तिसृष्व-रज्जुमें सर्पग्रहणके समान स्वप्न और जागरित अवस्थाओंमें तत्त्वके अन्यथाग्रहणसे स्वप्न होता है तथा तत्त्वके न जाननेसे निद्रा होती है,