माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| वस्थासु तुल्या । स्वप्ननिद्रयोस्तुल्यत्वाद्विश्वतैजसयोरेकराशित्वम् । अन्यथाग्रहणप्राधान्याच्च गुणभूता निद्रेति तस्मिन्विपर्यासः स्वप्नः । तृतीये तु स्थाने तत्त्वाज्ञानलक्षणा निद्रैव केवला विपर्यासः । <br><br> अतस्तयोः कार्यकारणस्थानयोरन्यथाग्रहणाग्रहणलक्षणविपर्यासे कार्यकारणबन्धरूपे परमार्थतत्त्वप्रतिबोधात् क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते । तदोभयलक्षणं बन्धरूपं तत्रापश्यंस्तुरीये निश्चितो भवतीत्यर्थः ॥ १५ ॥ | जो तीनों अवस्थाओंमें तुल्य है । इस प्रकार स्वप्न और निद्रामें तुल्य होनेके कारण विश्व और तैजसकी एक राशि है । उनमें अन्यथाग्रहणकी प्रधानता होनेके कारण निद्रा गौण है; अतः उन अवस्थाओंमें स्वप्नरूप विपरीत ज्ञान रहता है । किन्तु तृतीय स्थान ( सुषुप्ति ) में केवल तत्त्वाग्रहणरूप निद्रा ही विपर्यास है । <br><br> अतः उन कार्यकारणरूप स्थानोंके अन्यथाग्रहण और तत्त्वाग्रहणरूप विपर्यासोंका परमार्थतत्त्वके बोधसे क्षय हो जानेपर तुरीय पदकी प्राप्ति होती है । तब उस अवस्थामें दोनों प्रकारका बन्धन न देखनेसे पुरुष तुरीयमें निश्चित हो जाता है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ १५ ॥ |
बोध कब होता है ?
अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते ।
अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुध्यते तदा ॥ १६ ॥
जिस समय अनादि मायासे सोया हुआ जीव जागता है [ अर्थात् तत्त्वज्ञान लाभ करता है ] उसी समय उसे अज, अनिद्र और स्वप्नरहित अद्वैत आत्मतत्त्वका बोध प्राप्त होता है ॥ १६ ॥