भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 69

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ४९


योऽयं संसारी जीवः स उभयलक्षणेन तत्त्वाप्रतिबोधरूपेण बीजात्मनान्यथाग्रहणलक्षणेन च अनादिकालप्रवृत्तेन मायालक्षणेन स्वप्नेन ममायं पिता पुत्रोऽयं नप्ता क्षेत्रं पशवोऽहमेषां स्वामी सुखी दुःखी क्षयितोऽहमनेन वर्धितश्चानेनेत्येवंप्रकारान्स्वप्नान् स्थानद्वयेऽपि पश्यन्सुप्तः ।यह जो संसारी जीव है वह तत्त्वाप्रतिबोधरूप बीजात्मिका एवं अन्यथाग्रहणरूप अनादिकालसे प्रवृत्त मायारूप निद्राके कारण [ स्वप्न और जागरित ] दोनों ही अवस्थाओंमें 'यह मेरा पिता है, यह पुत्र है, यह नाती है, ये मेरे क्षेत्र, गृह और पशु हैं, मैं इनका स्वामी हूँ तथा इनके कारण सुखी-दुःखी, क्षीण और वृद्धिको प्राप्त होता हूँ' इत्यादि प्रकारके स्वप्न देखता हुआ सो रहा है ।
यदा वेदान्तार्थतत्त्वाभिज्ञेन परमकारुणिकेन गुरुणा नास्येवं त्वं हेतुफलात्मकः किं तु तत्त्वमसीति प्रतिबोध्यमानः, तदैवं प्रतिबुध्यते—जिस समय वेदान्तार्थके तत्त्वको जाननेवाले किसी परम कारुणिक गुरुके द्वारा 'तू इस प्रकार हेतु एवं फलरूप नहीं है, किन्तु तू वही है' इस प्रकार जगाया जाता है उस समय उसे ऐसा बोध प्राप्त होता है—
कथम् ? नास्मिन्बाह्यमाभ्यन्तरं वा जन्मादिभावविकारोऽस्त्यतोऽजं सबाह्याभ्यन्तरसर्वभावविकारवर्जितमित्यर्थः । यस्माज्जन्मादिकारणभूतं नास्मिन्नविद्यातमोबीजं निद्रा विद्यत इत्यनिद्रम् । अनिद्रंकिस प्रकारका बोध होता है ? [ सो बतलाते हैं— ] इसमें बाह्य अथवा आभ्यन्तर जन्मादि विकार नहीं है, इसलिये यह अजन्मा यानी सम्पूर्ण भाव-विकारोंसे रहित है । और क्योंकि इसमें जन्मादिकी कारणभूत तथा अविद्यारूप अन्धकारकी बीजभूत अविद्या नहीं है इसलिये यह अनिद्र है । वह तुरीय

७-८