भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 70
५०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
हि ततुरीयमत एवास्वप्नम्ः तन्निमित्तत्वादिन्यथाग्रहणस्य । यस्माच्चानिद्रमस्वप्नं तस्मादजमद्वैतं तुरीयमात्मानं बुद्ध्यते तदा ॥१६॥अनिद्र है, इसलिये अस्वप्न भी है; क्योंकि अन्यथाग्रहण तो [ तत्त्वाप्रतिबोधरूप ] निद्राहीके कारण हुआ करता है । इस प्रकार क्योंकि वह अनिद्र और अस्वप्न है इसलिये ही उस समय अजन्मा और अद्वैत तुरीय आत्माका बोध होता है ॥१६॥

प्रपञ्चनिवृत्त्या चेत्प्रतिबुद्ध्यतेऽनिवृत्ते प्रपञ्चे कथमद्वैतमित्युच्यते—यदि बोध प्रपञ्चनिवृत्तिसे ही होता है तो जबतक प्रपञ्चकी निवृत्ति न हो तबतक अद्वैत कैसा? इसपर कहा जाता है—

प्रपञ्चका अत्यन्ताभाव

प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।
मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥ १७ ॥

प्रपञ्च यदि होता तो निवृत्त हो जाता—इसमें सन्देह नहीं । किन्तु [ वास्तवमें ] यह द्वैत तो मायामात्र है, परमार्थतः तो अद्वैत ही है ॥ १७ ॥

सत्यमेवं स्यात्प्रपञ्चो यदि विद्येत, रज्ज्वां सर्प इव कल्पितत्वान्न तु स विद्यते । विद्यमानश्चेन्निवर्तेत न संशयः । न हि रज्ज्वां भ्रान्तिबुद्ध्या कल्पितः सर्पो विद्यमानःयदि प्रपञ्च विद्यमान होता तो सचमुच ऐसा ही होता; किन्तु वह तो रज्जुमें सर्पके समान कल्पित होनेके कारण [ वस्तुतः ] है ही नहीं । यदि वह होता तो, इसमें सन्देह नहीं, निवृत्त भी हो जाता । रज्जुमें भ्रमबुद्धिसे कल्पना किया हुआ सर्प [ वस्तुतः ] विद्यमान