माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
पृष्ठ 70, कुल 301 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 70
| ५० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
|---|
| हि ततुरीयमत एवास्वप्नम्ः तन्निमित्तत्वादिन्यथाग्रहणस्य । यस्माच्चानिद्रमस्वप्नं तस्मादजमद्वैतं तुरीयमात्मानं बुद्ध्यते तदा ॥१६॥ | अनिद्र है, इसलिये अस्वप्न भी है; क्योंकि अन्यथाग्रहण तो [ तत्त्वाप्रतिबोधरूप ] निद्राहीके कारण हुआ करता है । इस प्रकार क्योंकि वह अनिद्र और अस्वप्न है इसलिये ही उस समय अजन्मा और अद्वैत तुरीय आत्माका बोध होता है ॥१६॥ |
| प्रपञ्चनिवृत्त्या चेत्प्रतिबुद्ध्यतेऽनिवृत्ते प्रपञ्चे कथमद्वैतमित्युच्यते— | यदि बोध प्रपञ्चनिवृत्तिसे ही होता है तो जबतक प्रपञ्चकी निवृत्ति न हो तबतक अद्वैत कैसा? इसपर कहा जाता है— |
प्रपञ्चका अत्यन्ताभाव
प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।
मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥ १७ ॥
प्रपञ्च यदि होता तो निवृत्त हो जाता—इसमें सन्देह नहीं । किन्तु [ वास्तवमें ] यह द्वैत तो मायामात्र है, परमार्थतः तो अद्वैत ही है ॥ १७ ॥
| सत्यमेवं स्यात्प्रपञ्चो यदि विद्येत, रज्ज्वां सर्प इव कल्पितत्वान्न तु स विद्यते । विद्यमानश्चेन्निवर्तेत न संशयः । न हि रज्ज्वां भ्रान्तिबुद्ध्या कल्पितः सर्पो विद्यमानः | यदि प्रपञ्च विद्यमान होता तो सचमुच ऐसा ही होता; किन्तु वह तो रज्जुमें सर्पके समान कल्पित होनेके कारण [ वस्तुतः ] है ही नहीं । यदि वह होता तो, इसमें सन्देह नहीं, निवृत्त भी हो जाता । रज्जुमें भ्रमबुद्धिसे कल्पना किया हुआ सर्प [ वस्तुतः ] विद्यमान |