माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५१
| सन्निवेकतो निवृत्तः । नैव माया मायाविना प्रयुक्ता तद्दर्शिनां चक्षुर्बन्धापगमे विद्यमाना सती निवृत्ता । तथेदं प्रपञ्चाख्यं मायामात्रं द्वैतं रज्जुवन्मायाविवच्चाद्वैतं परमार्थतस्तस्मान्न कश्चित्प्रपञ्चः प्रवृत्तो निवृत्तो वास्तीत्यभिप्रायः ॥ १७ ॥ | रहते हुए विवेकसे निवृत्त नहीं होता । मायावीद्वारा फैलायी हुई माया, देखनेवालोंके दृष्टिवन्धनके हटाये जानेपर, पहले विद्यमान रहती हुई निवृत्त नहीं होती । इसी प्रकार यह प्रपञ्चसंज्ञक द्वैत भी मायामात्र ही है; परमार्थतः तो रज्जु अथवा मायावीके समान अद्वैत ही है । अतः तात्पर्य यह है कि कोई भी प्रपञ्च प्रवृत्त अथवा निवृत्त होनेवाला नहीं है ॥ १७ ॥ |
गुरु-शिष्यादि विकल्प व्यावहारिक है
| ननु शास्ता शास्त्रं शिष्य इति विकल्पः कथं निवर्तेत इत्युच्यते— | यदि कहो कि शासक, शास्त्र और शिष्य—इस प्रकारका विकल्प किस प्रकार निवृत्त हो सकता है ? तो इसपर कहा जाता है— |
विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।
उपदेशादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥ १८ ॥
इस [ गुरु-शिष्यादि ] विकल्पकी यदि किसीने कल्पना की होती तो यह निवृत्त भी हो जाता । यह [ गुरु-शिष्यादि ] वाद तो उपदेशके ही लिये है । आत्मज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं रहता ॥ १८ ॥
| विकल्पो विनिवर्तेत यदि केनचित्कल्पितः स्यात् । यथायं प्रपञ्चो मायारज्जुसर्पवत्तथायं | यदि किसीने इसकी कल्पना की होती तो यह विकल्प निवृत्त हो जाता । जिस प्रकार यह प्रपञ्च माया और रज्जुसर्पके सदृश है उसी |