माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५१
| सन्निवेकतो निवृत्तः । नैव माया मायाविना प्रयुक्ता तद्दर्शिनां चक्षुर्बन्धापगमे विद्यमाना सती निवृत्ता । तथेदं प्रपञ्चाख्यं मायामात्रं द्वैतं रज्जुवन्मायाविवच्चाद्वैतं परमार्थतस्तस्मान्न कश्चित्प्रपञ्चः प्रवृत्तो निवृत्तो वास्तीत्यभिप्रायः ॥ १७ ॥ | रहते हुए विवेकसे निवृत्त नहीं होता । मायावीद्वारा फैलायी हुई माया, देखनेवालोंके दृष्टिवन्धनके हटाये जानेपर, पहले विद्यमान रहती हुई निवृत्त नहीं होती । इसी प्रकार यह प्रपञ्चसंज्ञक द्वैत भी मायामात्र ही है; परमार्थतः तो रज्जु अथवा मायावीके समान अद्वैत ही है । अतः तात्पर्य यह है कि कोई भी प्रपञ्च प्रवृत्त अथवा निवृत्त होनेवाला नहीं है ॥ १७ ॥ |
गुरु-शिष्यादि विकल्प व्यावहारिक है
| ननु शास्ता शास्त्रं शिष्य इति विकल्पः कथं निवर्तेत इत्युच्यते— | यदि कहो कि शासक, शास्त्र और शिष्य—इस प्रकारका विकल्प किस प्रकार निवृत्त हो सकता है ? तो इसपर कहा जाता है— |
विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।
उपदेशादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥ १८ ॥
इस [ गुरु-शिष्यादि ] विकल्पकी यदि किसीने कल्पना की होती तो यह निवृत्त भी हो जाता । यह [ गुरु-शिष्यादि ] वाद तो उपदेशके ही लिये है । आत्मज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं रहता ॥ १८ ॥
| विकल्पो विनिवर्तेत यदि केनचित्कल्पितः स्यात् । यथायं प्रपञ्चो मायारज्जुसर्पवत्तथायं | यदि किसीने इसकी कल्पना की होती तो यह विकल्प निवृत्त हो जाता । जिस प्रकार यह प्रपञ्च माया और रज्जुसर्पके सदृश है उसी |
| ५२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| शिष्यादिभेदविकल्पोऽपि प्राक् प्रतिबोधादेवोपदेशनिमित्तोऽत उपदेशादयं वादः शिष्यः शास्ता शास्त्रमिति । उपदेशकार्ये तु ज्ञाने निर्वृत्ते ज्ञाते परमार्थतत्त्वे द्वैतं न विद्यते ॥ १८ ॥ | प्रकार यह शिष्यादि भेदविकल्प भी आत्मज्ञानसे पूर्व ही उपदेशके निमित्तसे है। अतः शिष्य, शासक और शास्त्र—यह वाद उपदेशके ही लिये है। उपदेशके कार्यस्वरूप ज्ञानके निष्पन्न होनेपर, अर्थात् परमार्थतत्त्वका ज्ञान हो जानेपर द्वैतकी सत्ता नहीं रहती ॥ १८ ॥ |
आत्मा और उसके पादोंके साथ ओंकार और उसकी मात्राओंका तादात्म्य
| अभिधेयप्रधान ओङ्कारश्चतुष्पादात्मेति व्याख्यातो यः— | अबतक जिस ओंकाररूप चतुष्पाद् आत्माका अभिधेय (वाच्यार्थ) की प्रधानतासे वर्णन किया है— |
सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥
वह यह आत्मा अक्षरदृष्टिसे ओंकार है; वह मात्राओंको विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही पाद हैं; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं ॥ ८ ॥
| सोऽयमात्माध्यक्षरमक्षरमधिकृत्याभिधानप्राधान्येन वर्ण्यमानोऽध्यक्षरम् । किं पुनस्तदक्षरमित्याह, ओङ्कारः । सोऽयमोङ्कारः पादशः प्रविभज्यमानः, | वह यह आत्मा अध्यक्षर है; अक्षरका आश्रय लेकर जिसका अभिधानकी प्रधानतासे वर्णन किया जाय उसे अध्यक्षर कहते हैं। किन्तु वह अक्षर है क्या ? इसपर कहते हैं—वह ओंकार है। वह यह ओंकार पादरूपसे विभक्त किये जानेपर अधिमात्र यानी |
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५३
| अधिमात्रं मात्रामधिकृत्य वर्तत इत्यधिमात्रम् । कथम् ? आत्मनो ये पादास्त ओङ्कारस्य मात्राः । कास्ताः ? अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥ | मात्राको आश्रय करके वर्तमान रहता है, इसलिये इसे 'अधिमात्र' कहते हैं । सो किस प्रकार ? क्यों-कि आत्माके जो पाद हैं वे ही ओंकारकी मात्राएँ हैं । वे मात्राएँ कौन-सी हैं ? अकार, उकार और मकार—ये ही [वे मात्राएँ हैं] ॥८॥ |
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अकार और विश्वका तादात्म्य
| तत्र विशेषनियमः क्रियते— | अब उनमें विशेष नियम किया जाता है— |
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जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा-
प्तेरादिमत्त्वाद्वाप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति
य एवं वेद ॥ ९ ॥
जिसका जागरित स्थान है वह वैश्वानर व्याप्ति और आदिमत्त्वके कारण [ ओंकारकी ] पहली मात्रा अकार है । जो उपासक इस प्रकार जानता है वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और [महापुरुषोंमें] आदि ( प्रधान ) होता है ॥ ९ ॥
| जागरितस्थानो वैश्वानरो यः स ओङ्कारस्याकारः प्रथमा मात्रा । केन सामान्येनेत्याह—आप्तेराप्ति-र्व्याप्तिकारेण सर्वा वाग्व्याप्ता “अकारो वै सर्वा वाक्” ( ऐ० आ० २ । ३ । ६ ) इति श्रुतेः । | जो जागरित स्थानवाला वैश्वानर है वही ओंकारकी पहली मात्रा अकार है । किस समानताके कारण पहली मात्रा है—इसपर कहते हैं—आप्तिके कारण, आप्तिका अर्थ व्याप्ति है । “अकार निश्चय ही सम्पूर्ण वाणी है” इस श्रुतिके अनुसार अकारसे समस्त वाणी व्याप्त है । |
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५४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| तथा वैश्वानरेण जगत्; "तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाः" ( छा० उ० ५ । १८ । २) इत्यादिश्रुतेः ।<br><br> अभिधानाभिधेययोरेकत्वं चावोचाम । आदिरस्य विद्यत इत्यातिमद्यथैवादिमदकाराख्यमक्षरं तथैव वैश्वानरस्तस्माद्वा सामान्यादकारत्वं वैश्वानरस्य ।<br><br> तदेकत्वविदः फलमाह—आप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिः प्रथमश्च भवति महतां य एवं वेद, यथोक्तमेकत्वं वेदेत्यर्थः ॥ ९ ॥ | तथा "उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही द्युलोक है" इस श्रुतिके अनुसार वैश्वानरसे सारा जगत् व्याप्त है ।<br><br> अभिधान (वाचक) और अभिधेय (वाच्य) की एकता तो हम कह ही चुके हैं । जिसमें आदि (प्रथमता) हो उसे आदिमत् कहते हैं । जिस प्रकार अकार नामक अक्षर आदिमान् है उसी प्रकार वैश्वानर भी है । उसी समानताके कारण वैश्वानरकी अकाररूपता है । उनकी एकता जाननेवालेके लिये फल बतलाया जाता है—'जो पुरुष ऐसा जानता है अर्थात् उपर्युक्त एकत्वको जाननेवाला है वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा महापुरुषोंमें आदि—प्रथम होता है' ॥ ९ ॥ |
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उकार और तैजसका तादात्म्य
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षा-
दुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति
नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५५
स्वप्न जिसका स्थान है वह तैजस उत्कर्ष तथा मध्यवर्तित्वके कारण ओंकारकी द्वितीय मात्रा उकार है। जो उपासक ऐसा जानता है वह अपनी ज्ञानसन्तानका उत्कर्ष करता है, सबके प्रति समान होता है और उसके वंशमें कोई ब्रह्मज्ञानहीन पुरुष नहीं होता ॥ १० ॥
| स्वप्नस्थानस्तैजसो यः स ओङ्कारस्योकारो द्वितीया मात्रा । केन सामान्येनेत्याह-उत्कर्षात् । अकारादुत्कृष्ट इव ह्युकारस्तथा तैजसो विश्वादुभयत्वाद्वाकारमकारयोर्मध्यस्थ उकारस्तथा विश्वप्राज्ञयोर्मध्ये तैजसोऽत उभयभाक्त्वसामान्यात् । | जो स्वप्नस्थानवाला तैजस है वह ओंकारकी दूसरी मात्रा उकार है। किस समानताके कारण दूसरी मात्रा है—इसपर कहते हैं—उत्कर्ष-के कारण। जिस प्रकार अकारसे उकार उत्कृष्ट-सा है उसी प्रकार विश्वसे तैजस उत्कृष्ट है । अथवा मध्यवर्तित्वके कारण [ उन दोनोंमें समानता है ] । जिस प्रकार उकार अकार और मकारके मध्यमें स्थित है उसी प्रकार विश्व और प्राज्ञके मध्यमें तैजस है । अतः उभयपरत्वरूप समानताके कारण भी [ उनमें अभिन्नता है ] । |
| विद्वत्फलमुच्यते—उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिम् । विज्ञानसन्ततिं वर्धयतीत्यर्थः । समानस्तुल्यश्च मित्रपक्षस्येव शत्रु पक्षाणामप्यप्रद्वेष्यो भवति । अब्रह्मविदस्य कुले न भवति य एवं वेद ॥१०॥ | अब इस प्रकार जाननेवालेको जो फल मिलता है वह बतलाया जाता है—जो इस प्रकार जानता है वह ज्ञानसन्तति अर्थात् विज्ञान-सन्तानका उत्कर्ष यानी वृद्धि करता है, सबके प्रति समान-तुल्य होता है अर्थात् मित्रपक्षके समान शत्रु-पक्षका भी अद्वेष्य होता है तथा उसके कुलमें कोई ब्रह्मज्ञानहीन पुरुष नहीं होता ॥ १० ॥ |
| ५६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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मकार और प्राज्ञका तादात्म्य
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११ ॥
सुषुप्ति जिसका स्थान है वह प्राज्ञ मान और लयके कारण ओंकारकी तीसरी मात्रा मकार है । जो उपासक ऐसा जानता है वह इस सम्पूर्ण जगत्का मान—प्रमाण कर लेता है और उसका लयस्थान हो जाता है ॥ ११ ॥
| संस्कृत (भाष्य) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो यः स ओङ्कारस्य मकारस्तृतीया मात्रा ।<br><br>केन सामान्येनेत्याह सामान्यमिदमत्र; मितेर्मितिर्मानं मीयते इव हि विश्वतैजसौ प्राज्ञेन प्रलयोत्पत्त्योः प्रवेशनिर्गमाभ्यां प्रस्थेनेव यवाः । यथोङ्कारसमाप्तौ पुनः प्रयोगे च प्रविश्य निर्गच्छत इवाकारोकारौ मकारे ।<br><br>अपीतेर्वा । अपीतिरप्यय एकीभावः । ओङ्कारोच्चारणे ह्यन्त्येऽक्षर एकीभूताविवाकारोकारौ । | सुषुप्तिस्थानवाला जो प्राज्ञ है वह ओंकारकी तीसरी मात्रा मकार है । किस समानताके कारण ? सो बतलाते हैं—यहाँ इनमें यह समानता है—ये मितिके कारण [समान हैं] । मिति मानको कहते हैं; जिस प्रकार प्रस्थ (एक प्रकारके बाट) से जौ तौले जाते हैं उसी प्रकार प्रलय और उत्पत्तिके समय मानों प्रवेश और निर्गमनके द्वारा प्राज्ञसे विश्व और तैजस मापे जाते हैं; क्योंकि ओंकारकी समाप्तिपर उसका पुनः प्रयोग किये जानेपर मानों अकार और उकार मकारमें प्रवेश करके उससे पुनः निकलते हैं ?<br><br>अथवा अपीतिके कारण भी उनमें एकता है । अपीति अप्यय अर्थात् एकीभावको कहते हैं। क्योंकि [जिस प्रकार] ओंकारका उच्चारण करनेपर अकार और उकार अन्तिम अक्षरमें एकीभूत-से हो जाते हैं |
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५७
| तथा विश्वतैजसौ सुषुप्तकाले प्राज्ञे। अतो वा सामान्यादेकत्वं प्राज्ञमकारयोः। | उसी प्रकार सुषुप्तिके समय विश्व और तैजस प्राज्ञमें लीन हो जाते हैं। सो, इस समानताके कारण भी प्राज्ञ और मकारकी एकता है। |
|---|---|
| विद्वत्फलमाह; मिनोति ह वा इदं सर्वं जगद्याथात्म्यं जानातीत्यर्थः। अपीतिश्च जगत्कारणात्मा भवतीत्यर्थः। अत्रावान्तरफलवचनं प्रधानसाधनस्तुत्यर्थम् ॥ ११ ॥ | अब इस प्रकार जाननेवालेको जो फल मिलता है वह बतलाते हैं— [ जो ऐसा जानता है ] वह इस सम्पूर्ण जगत्को माप लेता है, अर्थात् इसका यथार्थ स्वरूप जान लेता है; तथा अपीति यानी जगत्का कारणस्वरूप हो जाता है। यहाँ जो अवान्तर फल बतलाये गये हैं वे प्रधान साधनकी स्तुतिके लिये हैं ॥ ११ ॥ |
मात्राओंकी विश्वादिरूपता
अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थमें ये श्लोक भी हैं—
विश्वस्यात्वविवक्षायामादिसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासंप्रतिपत्तौ स्यादाप्तिसामान्यमेव च ॥ १९ ॥
जिस समय विश्वका अत्व—अकारमात्रत्व बतलाना इष्ट हो, अर्थात् वह अकारमात्रारूप है ऐसा जाना जाय तो उनके प्राथमिकत्वकी समानता स्पष्ट ही है तथा उनकी व्याप्तिरूप समानता भी स्फुट ही है ॥ १९ ॥
| ५८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| विश्वस्यात्वमकारमात्रत्वं यदा विवक्ष्यते तदादित्यसामान्यमुक्तन्यायेनोत्कटमुद्भूतं दृश्यत इत्यर्थः । अत्वविवक्षायामित्यस्य व्याख्यानं मात्रासंप्रतिपत्ताविति विश्वस्याकारमात्रत्वं यदा संप्रतिपद्यत इत्यर्थः । आप्तिसामान्यमेव चोत्कटमित्यनुवर्तते चशब्दात् ॥ १९॥ | जिस समय विश्वका अत्व यानी अकारमात्रत्व कहना इष्ट होता है उस समय पूर्वोक्त न्यायसे उनके प्राथमिकत्वकी समानता उत्कट अर्थात् उद्भूत (प्रकटरूपसे) दिखायी देती है । 'मात्रासम्प्रतिपत्तौ'—यह 'अत्वविवक्षायाम्' इस पदकी ही व्याख्या है । तात्पर्य यह है कि जिस समय विश्वके अकारमात्रत्वका ज्ञान होता है उस समय उनकी व्याप्तिकी समानता तो स्पष्ट ही है । यहाँ 'च' शब्दसे 'उत्कटम्' इस पदकी अनुवृत्ति की जाती है ॥१९॥ |
तैजसस्योत्वविज्ञाने उत्कर्षो दृश्यते स्फुटम् ।
मात्रासंप्रतिपत्तौ स्यादुभयत्वं तथाविधम् ॥ २० ॥
तैजसको उकाररूप जाननेपर अर्थात् तैजस उकारमात्रारूप है ऐसा जाननेपर उनका उत्कर्ष स्पष्ट दिखायी देता है । तथा उनका उभयत्व भी स्पष्ट ही है ॥ २० ॥
| तैजसस्योत्वविज्ञान उकारत्वविवक्षायामुत्कर्षो दृश्यते स्फुटं स्पष्ट इत्यर्थः । उभयत्वं च स्फुटमेवेति । पूर्ववत्सर्वम् ॥ २० ॥ | तैजसके उत्व-विज्ञानमें अर्थात् उसका उकाररूपसे प्रतिपादन करनेमें उसका उत्कर्ष तो स्पष्ट ही दिखलायी देता है । इसी प्रकार उभयत्व भी स्पष्ट ही है । शेष सब पूर्ववत् है॥२०॥ |
शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५९
मकारभावे प्राज्ञस्य मानसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासंप्रतिपत्तौ तु लयसामान्यमेव च ॥ २१ ॥
प्राज्ञको मकाररूपतामें अर्थात् प्राज्ञ मकारमात्रारूप है—ऐसा जाननेमें उनकी मान करनेकी समानता स्पष्ट है । इसी प्रकार उनमें लय-स्थान होनेकी समानता भी स्पष्ट ही है ॥ २१ ॥
| मकारत्वे प्राज्ञस्य मितिलया-द्युत्कृष्टे सामान्ये इत्यर्थः ॥ २१ ॥ | प्राज्ञके मकाररूप होनेमें मान और लयरूप समानता स्पष्ट हैं—यह इसका तात्पर्य है ॥ २१ ॥ |
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ॐकारोपासकका प्रभाव
त्रिषु धामसु यस्तुल्यं सामान्यं वेत्ति निश्चितः ।
स पूज्यः सर्वभूतानां वन्द्यश्चैव महामुनिः ॥ २२ ॥
जो पुरुष तीनों स्थानोंमें [बतलायी गयी] तुल्यता अथवा समानताको निश्चयपूर्वक जानता है वह महामुनि समस्त प्राणियोंका पूजनीय और वन्दनीय होता है ॥ २२ ॥
| यथोक्तस्थानत्रये यस्तुल्यमुक्तं सामान्यं वेत्त्येवमेवैतदिति निश्चितो सन् स पूज्यो वन्द्यश्च ब्रह्मविल्लोके भवति ॥ २२ ॥ | उपर्युक्त तीनों स्थानोंमें तुल्य-रूपसे बतलायी गयी समानताको जो 'यह इसी प्रकार है' ऐसा निश्चय-पूर्वक जानता है वह ब्रह्मवेत्ता लोकमें पूजनीय एवं वन्दनीय होता है ॥२२॥ |
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ॐकारकी व्यस्तोपासनाके फल
| यथोक्तैः सामान्यैरात्मपादानां मात्राभिः सहैकत्वं कृत्वा यथोक्तमोङ्कारं प्रतिपद्य यो ध्यायति तम्— | पूर्वोक्त समानताओंसे आत्माके पादोंका मात्राओंके साथ एकत्व करके उपर्युक्त ओंकारको जानते हुए जो उसका ध्यान करता है उसे— |
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| ६० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम् ।
मकारश्च पुनः प्राज्ञं नामात्रे विद्यते गतिः ॥ २३ ॥
अकार विश्वको प्राप्त करा देता है तथा उकार तैजसको और मकार प्राज्ञको; किन्तु अमात्रमें किसीकी गति नहीं है ॥ २३ ॥
| अकारो नयते विश्वं प्रापयति । अकारालम्बनमोङ्कारं विद्वान्वैश्वानरो भवतीत्यर्थः । तथोकारस्तैजसम् । मकारश्चापि पुनः प्राज्ञम्। चशब्दान्नयत इत्यनुवर्तते । क्षीणे तु मकारे बीजभावक्षयादमात्र ओङ्कारे गतिर्न विद्यते क्वचिदित्यर्थः ॥ २३ ॥ | अकार विश्वको प्राप्त करा देता है; अर्थात् अकारके आश्रित ओंकारको जाननेवाला पुरुष वैश्वानर होता है। इसी प्रकार उकार तैजसको और मकार पुनः प्राज्ञको प्राप्त करा देता है। 'च' शब्दसे 'नयते' (प्राप्त करा देता है) इस क्रियाकी अनुवृत्ति होती है। तथा मकारका क्षय होनेपर बीजभावका क्षय हो जानेसे मात्राहीन ओंकारमें कोई गति नहीं होती—यह इसका तात्पर्य है ॥२३॥ |
अमात्र और आत्माका तादात्म्य
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रारहित ओंकार तुरीय आत्मा ही है। वह अव्यवहार्य, प्रपञ्चोपशम, शिव और अद्वैत है। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है। जो उसे इस प्रकार जानता है वह स्वतः अपने आत्मामें ही प्रवेश कर जाता है ॥ १२ ॥
| शां० भा० ] | आगम-प्रकरण | ६१ |
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| अमात्रो मात्रा यस्य नास्ति सोऽमात्र ओङ्कारश्चतुर्थस्तुरीय आत्मैव केवलोऽभिधानाभिधेयरूपयोर्वाङ्मनसयोः क्षीणत्वादव्यवहार्यः । प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैतः संवृत्त एवं यथोक्तविज्ञानवता प्रयुक्त ओङ्कारस्त्रिमात्रस्त्रिपाद आत्मैव । संविशत्यात्मना स्वेनैव स्वं पारमार्थिकमात्मानं य एवं वेद । परमार्थदर्शी ब्रह्मवित् तृतीयं बीजभावं दग्ध्वात्मानं प्रविष्ट इति न पुनर्जायते तुरीयस्याबीजत्वात् । | अमात्र—जिसकी मात्रा नहीं है वह अमात्र ओंकार चौथा अर्थात् तुरीय केवल आत्मा ही है। अभिधानरूप वाणी और अभिधेयरूप मनका क्षय हो जानेके कारण वह अव्यवहार्य है । तथा वह प्रपञ्चकी निषेधावधि, मङ्गलमय, और अद्वैतस्वरूप है । इस प्रकार पूर्वोक्त विज्ञानवान् उपासकद्वारा प्रयोग किया हुआ तीन मात्रावाला ओंकार तीन पादवाला आत्मा ही है । जो इस प्रकार जानता है [ अर्थात् इस प्रकार उसकी उपासना करता है ] वह स्वतः ही अपने पारमार्थिक आत्मामें प्रवेश करता है । परमार्थदर्शी ब्रह्मवेत्ता तीसरे बीजभावको भी दग्ध करके आत्मामें प्रवेश करता है; इसलिये उसका पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि तुरीय आत्मा अबीजात्मक है । |
| न हि रज्जुसर्पयोर्विवेके रज्ज्वां प्रविष्टः सर्पो बुद्धिसंस्कारात्पुनः पूर्ववत्तद्विवेकिनामुत्थास्यति । मन्दमध्यमधियां तु प्रतिपन्नसाधकभावानां सन्मार्गगामिनां संन्यासिनां मात्राणां | रज्जु और सर्पका विवेक हो जानेपर रज्जुमें लीन हुआ सर्प जिन्हें उसका विवेक हो गया है उन पुरुषोंको बुद्धिके संस्कारवश पुनः प्रतीत नहीं हो सकता । किन्तु जो मन्द और मध्यम बुद्धिवाले, साधकभावको प्राप्त, सन्मार्गगामी संन्यासी |
२. द्वितीय प्रकरण — वैतथ्यप्रकरण (३८ कारिकाएँ)
६२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| पादानां च क्लृप्तसामान्यविदां यथावदुपास्यमान ओङ्कारो ब्रह्मप्रतिपत्तय आलम्बनीभवति तथा च वक्ष्यति—“आश्रमास्त्रिविधा!” (माण्डू० का० ३।१६) इत्यादि ॥ १२ ॥ | पूर्वोक्त मात्रा और पादोंके निश्चित सामान्यभावको जाननेवाले हैं उनके लिये तो विधिवत् उपासना किया हुआ ओंकार ब्रह्मप्राप्तिके लिये आश्रयस्वरूप होता है। यही बात “तीन प्रकारके आश्रम हैं” इत्यादि वाक्योंसे कहेंगे ॥ १२ ॥ |
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समस्त और व्यस्त ओंकारोपासना
पूर्ववत्-- | पहलेके समान--
अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थमें ये श्लोक भी हैं—
ओङ्कारं पादशो विद्यात्पादा मात्रा न संशयः ।
ओङ्कारं पादशो ज्ञात्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ २४ ॥
ओंकारको एक-एक पाद करके जाने; पाद ही मात्राएँ हैं—इसमें सन्देह नहीं। इस प्रकार ओंकारको पादक्रमसे जानकर कुछ भी चिन्तन न करे ॥ २४ ॥
| यथोक्तैः सामान्यैः पादा एव मात्रा मात्राश्च पादास्तस्मादोङ्कारं पादशो विद्यादित्यर्थः। एवमोङ्कारे ज्ञाते दृष्टार्थमदृष्टार्थं वा न किंचित् | पूर्वोक्त समानताओंके कारण पाद ही मात्राएँ हैं और मात्राएँ ही पाद हैं। अतः तात्पर्य यह है कि ओंकारको पादक्रमसे जाने। इस प्रकार ओंकारका ज्ञान हो जानेपर कृतार्थ हो जानेके कारण किसी भी दृष्टार्थ (ऐहिक) अथवा |
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ६३
| प्रयोजनं चिन्तयेत्कृतार्थत्वादित्यर्थः ॥ २४ ॥ | अदृष्टार्थ (पारलौकिक) प्रयोजनका चिन्तन न करे—यह इसका अभिप्राय है ॥ २४ ॥ |
युञ्जीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् ।
प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २५ ॥
चित्तको ओंकारमें समाहित करे; ओंकार निर्भय ब्रह्मपद है। ओंकारमें नित्य समाहित रहनेवाले पुरुषको कहीं भी भय नहीं होता ।२५।
| युञ्जीत समादध्याद्यथाव्याख्याते परमार्थरूपे प्रणवे चेतो मनः । यस्मात्प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् । न हि तत्र सदा युक्तस्य भयं विद्यते क्वचित् "विद्वान्न बिभेति कुतश्चन" (तै० उ० २। ९) इति श्रुतेः॥२५॥ | जिसकी पहले व्याख्या की जा चुकी है उस परमार्थस्वरूप ओंकारमें चित्तको युक्त-समाहित करे, क्योंकि ओंकार ही निर्भय ब्रह्म है। उसमें नित्य समाहित रहनेवाले पुरुषको कहीं भी भय नहीं होता, जैसा कि "विद्वान् कहीं भी भयको प्राप्त नहीं होता" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ २५ ॥ |
प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः ।
अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ॥ २६ ॥
ओंकार ही परब्रह्म है और ओंकार ही अपरब्रह्म माना गया है । वह ओंकार अपूर्व (अकारण), अन्तर्बाह्यशून्य, अकार्य तथा अव्यय है ॥ २६ ॥
| ६४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| परापरे ब्रह्मणी प्रणवः। परमार्थतः क्षीणेषु मात्रापादेषु पर एवात्मा ब्रह्मेति न पूर्वं कारणमस्य विद्यत इत्यपूर्वः । नास्यान्तरं भिन्नजातीयं किञ्चिद्विद्यत इत्यनन्तरः। तथा बाह्यमन्यन्न विद्यत इत्यबाह्यः । अपरं कार्यमस्य न विद्यत इत्यनपरः । सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघन इत्यर्थः ॥ २६ ॥ | पर और अपर ब्रह्म प्रणव हैं । वस्तुतः मात्रारूप पादोंके क्षीण होनेपर पर आत्मा ही ब्रह्म है, इसलिये इसका कोई पूर्व यानी कारण न होनेसे यह अपूर्व है । इसका कोई अन्तर—भिन्नजातीय भी नहीं है, इसलिये यह अनन्तर है तथा इससे बाह्य भी कोई और नहीं है, इसलिये यह अबाह्य है और इसका कोई अपर—कार्य भी नहीं है इसलिये यह अनपर है । तात्पर्य यह है कि यह बाहर-भीतरसे अजन्मा तथा सैन्धवघनके समान प्रज्ञानघन ही है ॥ २६ ॥ |
सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च ।
एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम् ॥ २७ ॥
प्रणव ही सबका आदि, मध्य और अन्त है । प्रणवको इस प्रकार जाननेके अनन्तर तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥ २७ ॥
| आदिमध्यान्ता उत्पत्तिस्थितिप्रलयाः सर्वस्यैव । मायाहस्तिरज्जुसर्पमृगतृष्णिकाखमादिवद् उत्पद्यमानस्य वियदादिप्रपञ्चस्य यथा मायाव्यादयः । एवं हि | सबका आदि, मध्य और अन्त अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय प्रणव ही है। जिस प्रकार कि मायामय हाथी, रज्जुमें प्रतीत होनेवाले सर्प, मृगतृष्णा और खमादिके समान उत्पन्न होनेवाले आकाशादिरूप प्रपञ्चके कारण मायावी आदि |
शां० शा० ] आगम-प्रकरण ६५
| प्रणवमात्मानं मायाव्यादिस्था- <br> नीयं ज्ञात्वा तत्क्षणादेव तदात्म- <br> भावं व्यश्नुत इत्यर्थः ॥ २७॥ | हैं उसी प्रकार मायावी आदिस्थानीय <br> उस प्रणवरूप आत्माको जानकर <br> विद्वान् तत्काल ही तद्रूपताको प्राप्त हो <br> जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है ॥२७॥ |
प्रणवं हीश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् ।
सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २८ ॥
प्रणवको ही सबके हृदयमें स्थित ईश्वर जाने। इस प्रकार सर्वव्यापी ओंकारको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ २८ ॥
| सर्वप्राणिजातस्य स्मृति- <br> प्रत्ययास्पदे हृदये स्थितमीश्वरं <br> प्रणवं विद्यात्सर्वव्यापिनं व्योम- <br> वदोङ्कारमात्मानमसंसारिणं धीरो <br> बुद्धिमान्मत्वा न शोचति <br> शोकनिमित्तानुपपत्तेः। “तरति <br> शोकमात्मवित्” (छा० उ० ७ । <br> १।३) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥२८॥ | प्रणवको ही समस्त प्राणि- <br> समुदायके स्मृतिप्रत्ययके आश्रयभूत <br> हृदयमें स्थित ईश्वर समझे। बुद्धिमान् <br> पुरुष आकाशके समान सर्वव्यापी <br> ओंकारको असंसारी आत्मा [—शुद्ध <br> आत्मतत्त्व] जानकर, शोकके कारण- <br> का अभाव हो जानेसे शोक नहीं <br> करता; जैसा कि “आत्मवेत्ता शोक- <br> को पार कर जाता है” इत्यादि <br> श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ॥२८॥ |
ओंकारार्थज्ञ ही मुनि है
अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।
ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नैतरो जनः ॥ २९ ॥
९-१०
६६ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
जिसने मात्राहीन, अनन्त मात्रावाले, द्वैतके उपशमस्थान और मङ्गलमय ओंकारको जाना है वही मुनि है; और कोई पुरुष नहीं ॥२९॥
| अमात्रस्तुरीय ओङ्कारः। मीयतेऽनयेति मात्रा परिच्छित्तिः सा अनन्ता यस्य सोऽनन्तमात्रः। नैतावत्त्वमस्य परिच्छेत्तुं शक्यत इत्यर्थः । सर्वद्वैतोपशमत्वादेव शिवः। ओङ्कारो यथाव्याख्यातो विदितो येन स परमार्थतत्त्वस्य मननान्मुनिः । नेतरो जनः शास्त्रविदपीत्यर्थः ॥२९॥ | अमात्र तुरीय ओंकार है। जिससे मान किया जाय उसे 'मात्रा' अर्थात् 'परिच्छित्ति' कहते हैं; वह मात्रा जिसकी अनन्त हो उसे 'अनन्तमात्र' कहा जाता है। तात्पर्य यह है कि इसकी इयत्ताका परिच्छेद नहीं किया जा सकता । सम्पूर्ण द्वैतका उपशमस्थान होनेके कारण ही वह शिव ( मङ्गलमय ) है। इस प्रकार व्याख्या किया हुआ ओंकार जिसने जाना है वही परमार्थतत्त्वका मनन करनेवाला होनेसे 'मुनि' है; दूसरा पुरुष शास्त्रज्ञ होनेपर भी मुनि नहीं है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ २९ ॥ |
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इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य शङ्करभगवतः कृतावागमशास्त्रविवरणे गौडपादीयकारिका- सहितमाण्डूक्योपनिषद्भाष्ये प्रथममागमप्रकरणम् ॥१॥
ॐ तत्सत् ।
वैतथ्यप्रकरण
| प्रकरणस्य प्रयोजनम् | ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इत्युक्तम्, <br> "एकमेवाद्वितीयम्" <br> (छा० उ० ६।२।१) <br> इत्यादिश्रुतिभ्यः । <br> आगममात्रं तत् । तत्रोपपत्त्यापि द्वैतस्य वैतथ्यं शक्यतेऽवधारयितुमिति द्वितीयं प्रकरणमारभ्यते— | "एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार (आगम-प्रकरणकी १८ वीं कारिकामें) यह कहा गया है कि ज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं रहता। वह केवल आगम (शास्त्र-वचन) मात्र था। किन्तु द्वैतका मिथ्यात्व युक्तिसे भी निश्चय किया जा सकता है, इसीलिये इस दूसरे प्रकरणका आरम्भ किया जाता है— |
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स्वप्नदृष्ट पदार्थोंका मिथ्यात्व
वैतथ्यं सर्वभावानां स्वप्न आहुर्मनीषिणः ।
अन्तःस्थानात्तु भावानां संवृतत्वेन हेतुना ॥ १ ॥
[ स्वप्नावस्थामें ] सब पदार्थ शरीरके भीतर स्थित होते हैं; अतः स्थानके सङ्कोचके कारण मनीषिगण स्वप्नमें सब पदार्थोंका मिथ्यात्व प्रतिपादन करते हैं ॥ १ ॥
| वितथस्य भावो वैतथ्यम्, असत्यत्वमित्यर्थः। कस्य ? सर्वेषां बाह्याध्यात्मिकानां भावानां पदार्थानां स्वप्न उपलभ्यमानानाम्, आहुः कथयन्ति, मनीषिणः प्रमाणकुशलाः। वैतथ्ये हेतुमाह— | वितथ (मिथ्या) के भावका नाम 'वैतथ्य' अर्थात् असत्यत्व है। किसका वैतथ्य ? स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले सम्पूर्ण बाह्य और आन्तरिक पदार्थोंका मनीषिगण अर्थात् प्रमाण-कुशल पुरुष वैतथ्य बतलाते हैं। उनके मिथ्यात्वमें हेतु बतलाते हैं— |
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६८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| अन्तःस्थानात्, अन्तः शरीरस्य मध्ये स्थानं येषाम् । तत्र हि भावा उपलभ्यन्ते पर्वतहस्त्यादयो न बहिः शरीरात् । तस्मात्ते वितथा भवितुमर्हन्ति। नन्वपवरकाद्यन्तरुपलभ्यमानैर्घटादिभिरनैकान्तिको हेतुः इत्याशङ्क्याह—संवृतत्वेन हेतुनेति, अन्तःसंवृतस्थानादित्यर्थः।<br><br>अन्तःसंवृत-स्थानात्<br><br>न ह्यन्तः संवृते देहान्तर्नाडीषु पर्वतहस्त्यादीनां सम्भवोऽस्ति; न हि देहे पर्वतोऽस्ति ॥ १ ॥ | अन्तःस्थ होनेके कारण; अन्तर अर्थात् शरीरके मध्यमें स्थान है जिनका [ ऐसे होनेके कारण ]; क्योंकि वहीं पर्वत एवं हस्ती आदि समस्त पदार्थ उपलब्ध होते हैं, शरीरसे बाहर उनकी उपलब्धि नहीं होती; इसलिये वे मिथ्या होने चाहिये। किन्तु [यदि शरीरके भीतर उपलब्ध होनेके कारण ही स्वप्नदृष्ट पदार्थ मिथ्या हैं तो ] गृह आदिके भीतर दिखायी देनेवाले घट आदिमें तो यह हेतु व्यभिचरित हो जायगा [क्योंकि वहाँ जो उनकी प्रतीति है वह तो सत्य ही है ]—ऐसी शङ्का होनेपर कहते हैं—'स्थानके सङ्कोचके कारणसे।' तात्पर्य यह कि शरीरके भीतर संकुचित स्थान होनेसे [ उनका मिथ्यात्व कहा जाता है ] । देहके अन्तर्वर्ती संकुचित नाडीजालमें पर्वत या हाथी आदिका होना सम्भव नहीं है । देहके भीतर पर्वत नहीं हो सकता ॥ १ ॥ |
| स्वप्नदृश्यानां भावानामान्तः संवृतस्थानमित्येतदसिद्धम् , यस्मात् प्राच्येषु सुप्त उदक्षु | स्वप्नमें दिखलायी देनेवाले पदार्थोंका शरीरके भीतर संकुचित स्थान है—यह बात सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि पूर्व दिशामें सोया हुआ पुरुष उत्तर दिशामें स्वप्न देखता-सा |
शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ६९
| स्वप्नान्पश्यन्निव दृश्यत इत्ये- | देखा जाता है [अतः वह शरीरसे |
| तदाशङ्क्याह— | बाहर वहाँ जाकर उन्हें देखता होगा] |
| —ऐसी आशङ्का करके कहते हैं— |
अदीर्घत्वाच्च कालस्य गत्वा देशान्न पश्यति ।
प्रतिबुद्धश्च वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥ २ ॥
समयकी अदीर्घता होनेके कारण वह देहसे बाहर जाकर उन्हें नहीं देखता तथा जागनेपर भी कोई पुरुष उस देशमें विद्यमान नहीं रहता । [ इससे भी उसका स्वप्नदृष्ट देशमें न जाना ही सिद्ध होता है ] ॥ २ ॥
| [शांकरभाष्यम्] | [हिन्दी अनुवाद] |
|---|---|
| न देहाद्बहिर्देशान्तरं गत्वा स्वप्नान्पश्यति । यस्मात्सुप्तमात्र एव देहदेशाद्योजनशतान्तरिते मासमात्रप्राप्ये देशे स्वप्नान्पश्यन्निव दृश्यते । न च तद्देशप्राप्तेरागमनस्य च दीर्घः कालोऽस्ति । अतोऽदीर्घत्वाच्च कालस्य न स्वप्नदृग्देशान्तरं गच्छति ।<br><br>(पार्श्वटिप्पणी: दीर्घकालाभावात् मिथ्यात्वम्)<br><br>किं च प्रतिबुद्धश्च वै सर्वः स्वप्नदृक्स्वप्नदर्शनदेशे न विद्यते । यदि च स्वप्ने देशान्तरं गच्छेद्यस्मिन्देशे स्वप्नान्पश्येत्तत्रैव प्रतिबुध्येत । न चैतदस्ति । रात्रौ सुप्तोऽहनीव भावान्पश्यति; बहुभिः | वह देहसे बाहर देशान्तरमें जाकर स्वप्न नहीं देखता, क्योंकि वह सोया हुआ ही देहके स्थानसे एक मासमें पहुँचने योग्य सौ योजनकी दूरीपर स्वप्न देखता-सा देखा जाता है । [उस समय] उस देशमें पहुँचने और वहाँसे लौटने योग्य दीर्घकाल है ही नहीं । अतः कालकी अदीर्घताके कारण वह स्वप्न-द्रष्टा किसी देशान्तरमें नहीं जाता ।<br><br>यही नहीं, जागनेपर भी कोई स्वप्नद्रष्टा स्वप्न देखनेके स्थानमें नहीं रहता । यदि वह स्वप्नके समय किसी देशान्तरमें जाता तो जिस देशमें स्वप्न देखता उसीमें जागता । किन्तु ऐसी बात नहीं होती । वह रात्रिमें सोया हुआ मानों दिनमें पदार्थोंको देखता है और बहुतोंसे |
| ७० | माण्डूक्योपनिषद् | [गौ० का० |
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सङ्गतो भवति, यैश्च सङ्गतस्तैर्गृह्येत । न च गृह्यते; गृहीतश्चेत्त्वामद्य तत्रोपलब्धवन्तो वयमिति ब्रूयुः । न चैतदस्ति, तस्मान्न देशान्तरं गच्छति स्वप्ने ॥ २ ॥ | मिलता है; अतः जिनसे उसका मेल होता है उनके द्वारा वह गृहीत होना चाहिये था । परन्तु गृहीत होता नहीं; यदि गृहीत होता तो 'हमने तुझे वहाँ पाया था' ऐसा कहते । परन्तु ऐसी बात है नहीं; अतः स्वप्नमें वह किसी देशान्तरको नहीं जाता ॥ २ ॥
इतश्च स्वप्नदृश्या भावा वितथा यतः— | स्वप्नमें दिखायी देनेवाले पदार्थ इसलिये भी मिथ्या हैं, क्योंकि—
अभावश्च रथादीनां श्रूयते न्यायपूर्वकम् ।
वैतथ्यं तेन वै प्राप्तं स्वप्न आहुः प्रकाशितम् ॥ ३ ॥
श्रुतिमें भी [स्वप्नदृष्ट] रथादिका अभाव युक्तिपूर्वक सुना गया है । अतः [उपर्युक्त युक्तिसे] सिद्ध हुए मिथ्यात्वको ही स्वप्नमें स्पष्ट बतलाते हैं ॥ ३ ॥
अभावश्चैव रथादीनां स्वप्नदृश्यानां श्रूयते न्यायपूर्वकं युक्तितः श्रुतौ "न तत्र रथाः" (बृ० उ० ४।३।१०) इत्यत्र । देहान्तःस्थानसंवृतत्वादिहेतुना प्राप्तं वैतथ्यं तदनुवादिन्या श्रुत्या स्वप्ने स्वयंज्योतिष्ट्वप्रतिपादनपरया प्रकाशितमाहुर्ब्रह्मविदः ॥ ३ ॥ (रथाद्यभावश्रुतेर्मिथ्यात्वम्) | "उस अवस्था में रथ नहीं हैं" इत्यादि श्रुतिमें भी स्वप्नदृष्ट रथादिका अभाव युक्तिपूर्वक सुना गया है । अतः अन्तःस्थान तथा स्थानके सङ्कोच आदि हेतुओंसे सिद्ध हुआ मिथ्यात्व, उसका अनुवाद करनेवाली तथा स्वप्नमें आत्माका स्वयंप्रकाशत्व प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिद्वारा ब्रह्मवेत्ता स्पष्ट बतलाते हैं ॥ ३ ॥