माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५५
स्वप्न जिसका स्थान है वह तैजस उत्कर्ष तथा मध्यवर्तित्वके कारण ओंकारकी द्वितीय मात्रा उकार है। जो उपासक ऐसा जानता है वह अपनी ज्ञानसन्तानका उत्कर्ष करता है, सबके प्रति समान होता है और उसके वंशमें कोई ब्रह्मज्ञानहीन पुरुष नहीं होता ॥ १० ॥
| स्वप्नस्थानस्तैजसो यः स ओङ्कारस्योकारो द्वितीया मात्रा । केन सामान्येनेत्याह-उत्कर्षात् । अकारादुत्कृष्ट इव ह्युकारस्तथा तैजसो विश्वादुभयत्वाद्वाकारमकारयोर्मध्यस्थ उकारस्तथा विश्वप्राज्ञयोर्मध्ये तैजसोऽत उभयभाक्त्वसामान्यात् । | जो स्वप्नस्थानवाला तैजस है वह ओंकारकी दूसरी मात्रा उकार है। किस समानताके कारण दूसरी मात्रा है—इसपर कहते हैं—उत्कर्ष-के कारण। जिस प्रकार अकारसे उकार उत्कृष्ट-सा है उसी प्रकार विश्वसे तैजस उत्कृष्ट है । अथवा मध्यवर्तित्वके कारण [ उन दोनोंमें समानता है ] । जिस प्रकार उकार अकार और मकारके मध्यमें स्थित है उसी प्रकार विश्व और प्राज्ञके मध्यमें तैजस है । अतः उभयपरत्वरूप समानताके कारण भी [ उनमें अभिन्नता है ] । |
| विद्वत्फलमुच्यते—उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिम् । विज्ञानसन्ततिं वर्धयतीत्यर्थः । समानस्तुल्यश्च मित्रपक्षस्येव शत्रु पक्षाणामप्यप्रद्वेष्यो भवति । अब्रह्मविदस्य कुले न भवति य एवं वेद ॥१०॥ | अब इस प्रकार जाननेवालेको जो फल मिलता है वह बतलाया जाता है—जो इस प्रकार जानता है वह ज्ञानसन्तति अर्थात् विज्ञान-सन्तानका उत्कर्ष यानी वृद्धि करता है, सबके प्रति समान-तुल्य होता है अर्थात् मित्रपक्षके समान शत्रु-पक्षका भी अद्वेष्य होता है तथा उसके कुलमें कोई ब्रह्मज्ञानहीन पुरुष नहीं होता ॥ १० ॥ |