भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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५४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


तथा वैश्वानरेण जगत्; "तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाः" ( छा० उ० ५ । १८ । २) इत्यादिश्रुतेः ।<br><br> अभिधानाभिधेययोरेकत्वं चावोचाम । आदिरस्य विद्यत इत्यातिमद्यथैवादिमदकाराख्यमक्षरं तथैव वैश्वानरस्तस्माद्वा सामान्यादकारत्वं वैश्वानरस्य ।<br><br> तदेकत्वविदः फलमाह—आप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिः प्रथमश्च भवति महतां य एवं वेद, यथोक्तमेकत्वं वेदेत्यर्थः ॥ ९ ॥तथा "उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही द्युलोक है" इस श्रुतिके अनुसार वैश्वानरसे सारा जगत् व्याप्त है ।<br><br> अभिधान (वाचक) और अभिधेय (वाच्य) की एकता तो हम कह ही चुके हैं । जिसमें आदि (प्रथमता) हो उसे आदिमत् कहते हैं । जिस प्रकार अकार नामक अक्षर आदिमान् है उसी प्रकार वैश्वानर भी है । उसी समानताके कारण वैश्वानरकी अकाररूपता है । उनकी एकता जाननेवालेके लिये फल बतलाया जाता है—'जो पुरुष ऐसा जानता है अर्थात् उपर्युक्त एकत्वको जाननेवाला है वह समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा महापुरुषोंमें आदि—प्रथम होता है' ॥ ९ ॥

उकार और तैजसका तादात्म्य

स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षा-

दुभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति

नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १० ॥