भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५३


अधिमात्रं मात्रामधिकृत्य वर्तत इत्यधिमात्रम् । कथम् ? आत्मनो ये पादास्त ओङ्कारस्य मात्राः । कास्ताः ? अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥मात्राको आश्रय करके वर्तमान रहता है, इसलिये इसे 'अधिमात्र' कहते हैं । सो किस प्रकार ? क्यों-कि आत्माके जो पाद हैं वे ही ओंकारकी मात्राएँ हैं । वे मात्राएँ कौन-सी हैं ? अकार, उकार और मकार—ये ही [वे मात्राएँ हैं] ॥८॥

अकार और विश्वका तादात्म्य

तत्र विशेषनियमः क्रियते—अब उनमें विशेष नियम किया जाता है—

जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा-

प्तेरादिमत्त्वाद्वाप्नोति ह वै सर्वान्कामानादिश्च भवति

य एवं वेद ॥ ९ ॥

जिसका जागरित स्थान है वह वैश्वानर व्याप्ति और आदिमत्त्वके कारण [ ओंकारकी ] पहली मात्रा अकार है । जो उपासक इस प्रकार जानता है वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और [महापुरुषोंमें] आदि ( प्रधान ) होता है ॥ ९ ॥

जागरितस्थानो वैश्वानरो यः स ओङ्कारस्याकारः प्रथमा मात्रा । केन सामान्येनेत्याह—आप्तेराप्ति-र्व्याप्तिकारेण सर्वा वाग्व्याप्ता “अकारो वै सर्वा वाक्” ( ऐ० आ० २ । ३ । ६ ) इति श्रुतेः ।जो जागरित स्थानवाला वैश्वानर है वही ओंकारकी पहली मात्रा अकार है । किस समानताके कारण पहली मात्रा है—इसपर कहते हैं—आप्तिके कारण, आप्तिका अर्थ व्याप्ति है । “अकार निश्चय ही सम्पूर्ण वाणी है” इस श्रुतिके अनुसार अकारसे समस्त वाणी व्याप्त है ।