भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 72
५२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
शिष्यादिभेदविकल्पोऽपि प्राक् प्रतिबोधादेवोपदेशनिमित्तोऽत उपदेशादयं वादः शिष्यः शास्ता शास्त्रमिति । उपदेशकार्ये तु ज्ञाने निर्वृत्ते ज्ञाते परमार्थतत्त्वे द्वैतं न विद्यते ॥ १८ ॥प्रकार यह शिष्यादि भेदविकल्प भी आत्मज्ञानसे पूर्व ही उपदेशके निमित्तसे है। अतः शिष्य, शासक और शास्त्र—यह वाद उपदेशके ही लिये है। उपदेशके कार्यस्वरूप ज्ञानके निष्पन्न होनेपर, अर्थात् परमार्थतत्त्वका ज्ञान हो जानेपर द्वैतकी सत्ता नहीं रहती ॥ १८ ॥

आत्मा और उसके पादोंके साथ ओंकार और उसकी मात्राओंका तादात्म्य

अभिधेयप्रधान ओङ्कारश्चतुष्पादात्मेति व्याख्यातो यः—अबतक जिस ओंकाररूप चतुष्पाद् आत्माका अभिधेय (वाच्यार्थ) की प्रधानतासे वर्णन किया है—

सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥ ८ ॥

वह यह आत्मा अक्षरदृष्टिसे ओंकार है; वह मात्राओंको विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा हैं और मात्रा ही पाद हैं; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं ॥ ८ ॥

सोऽयमात्माध्यक्षरमक्षरमधिकृत्याभिधानप्राधान्येन वर्ण्यमानोऽध्यक्षरम् । किं पुनस्तदक्षरमित्याह, ओङ्कारः । सोऽयमोङ्कारः पादशः प्रविभज्यमानः,वह यह आत्मा अध्यक्षर है; अक्षरका आश्रय लेकर जिसका अभिधानकी प्रधानतासे वर्णन किया जाय उसे अध्यक्षर कहते हैं। किन्तु वह अक्षर है क्या ? इसपर कहते हैं—वह ओंकार है। वह यह ओंकार पादरूपसे विभक्त किये जानेपर अधिमात्र यानी