भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 76
५६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

मकार और प्राज्ञका तादात्म्य

सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११ ॥

सुषुप्ति जिसका स्थान है वह प्राज्ञ मान और लयके कारण ओंकारकी तीसरी मात्रा मकार है । जो उपासक ऐसा जानता है वह इस सम्पूर्ण जगत्का मान—प्रमाण कर लेता है और उसका लयस्थान हो जाता है ॥ ११ ॥


संस्कृत (भाष्य)हिन्दी अनुवाद
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो यः स ओङ्कारस्य मकारस्तृतीया मात्रा ।<br><br>केन सामान्येनेत्याह सामान्यमिदमत्र; मितेर्मितिर्मानं मीयते इव हि विश्वतैजसौ प्राज्ञेन प्रलयोत्पत्त्योः प्रवेशनिर्गमाभ्यां प्रस्थेनेव यवाः । यथोङ्कारसमाप्तौ पुनः प्रयोगे च प्रविश्य निर्गच्छत इवाकारोकारौ मकारे ।<br><br>अपीतेर्वा । अपीतिरप्यय एकीभावः । ओङ्कारोच्चारणे ह्यन्त्येऽक्षर एकीभूताविवाकारोकारौ ।सुषुप्तिस्थानवाला जो प्राज्ञ है वह ओंकारकी तीसरी मात्रा मकार है । किस समानताके कारण ? सो बतलाते हैं—यहाँ इनमें यह समानता है—ये मितिके कारण [समान हैं] । मिति मानको कहते हैं; जिस प्रकार प्रस्थ (एक प्रकारके बाट) से जौ तौले जाते हैं उसी प्रकार प्रलय और उत्पत्तिके समय मानों प्रवेश और निर्गमनके द्वारा प्राज्ञसे विश्व और तैजस मापे जाते हैं; क्योंकि ओंकारकी समाप्तिपर उसका पुनः प्रयोग किये जानेपर मानों अकार और उकार मकारमें प्रवेश करके उससे पुनः निकलते हैं ?<br><br>अथवा अपीतिके कारण भी उनमें एकता है । अपीति अप्यय अर्थात् एकीभावको कहते हैं। क्योंकि [जिस प्रकार] ओंकारका उच्चारण करनेपर अकार और उकार अन्तिम अक्षरमें एकीभूत-से हो जाते हैं