माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५७
| तथा विश्वतैजसौ सुषुप्तकाले प्राज्ञे। अतो वा सामान्यादेकत्वं प्राज्ञमकारयोः। | उसी प्रकार सुषुप्तिके समय विश्व और तैजस प्राज्ञमें लीन हो जाते हैं। सो, इस समानताके कारण भी प्राज्ञ और मकारकी एकता है। |
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| विद्वत्फलमाह; मिनोति ह वा इदं सर्वं जगद्याथात्म्यं जानातीत्यर्थः। अपीतिश्च जगत्कारणात्मा भवतीत्यर्थः। अत्रावान्तरफलवचनं प्रधानसाधनस्तुत्यर्थम् ॥ ११ ॥ | अब इस प्रकार जाननेवालेको जो फल मिलता है वह बतलाते हैं— [ जो ऐसा जानता है ] वह इस सम्पूर्ण जगत्को माप लेता है, अर्थात् इसका यथार्थ स्वरूप जान लेता है; तथा अपीति यानी जगत्का कारणस्वरूप हो जाता है। यहाँ जो अवान्तर फल बतलाये गये हैं वे प्रधान साधनकी स्तुतिके लिये हैं ॥ ११ ॥ |
मात्राओंकी विश्वादिरूपता
अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थमें ये श्लोक भी हैं—
विश्वस्यात्वविवक्षायामादिसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासंप्रतिपत्तौ स्यादाप्तिसामान्यमेव च ॥ १९ ॥
जिस समय विश्वका अत्व—अकारमात्रत्व बतलाना इष्ट हो, अर्थात् वह अकारमात्रारूप है ऐसा जाना जाय तो उनके प्राथमिकत्वकी समानता स्पष्ट ही है तथा उनकी व्याप्तिरूप समानता भी स्फुट ही है ॥ १९ ॥