भारतकोश
संग्रह पर लौटें

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५७


तथा विश्वतैजसौ सुषुप्तकाले प्राज्ञे। अतो वा सामान्यादेकत्वं प्राज्ञमकारयोः।उसी प्रकार सुषुप्तिके समय विश्व और तैजस प्राज्ञमें लीन हो जाते हैं। सो, इस समानताके कारण भी प्राज्ञ और मकारकी एकता है।
विद्वत्फलमाह; मिनोति ह वा इदं सर्वं जगद्याथात्म्यं जानातीत्यर्थः। अपीतिश्च जगत्कारणात्मा भवतीत्यर्थः। अत्रावान्तरफलवचनं प्रधानसाधनस्तुत्यर्थम् ॥ ११ ॥अब इस प्रकार जाननेवालेको जो फल मिलता है वह बतलाते हैं— [ जो ऐसा जानता है ] वह इस सम्पूर्ण जगत्‌को माप लेता है, अर्थात् इसका यथार्थ स्वरूप जान लेता है; तथा अपीति यानी जगत्‌का कारणस्वरूप हो जाता है। यहाँ जो अवान्तर फल बतलाये गये हैं वे प्रधान साधनकी स्तुतिके लिये हैं ॥ ११ ॥

मात्राओंकी विश्वादिरूपता

अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थमें ये श्लोक भी हैं—

विश्वस्यात्वविवक्षायामादिसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासंप्रतिपत्तौ स्यादाप्तिसामान्यमेव च ॥ १९ ॥

जिस समय विश्वका अत्व—अकारमात्रत्व बतलाना इष्ट हो, अर्थात् वह अकारमात्रारूप है ऐसा जाना जाय तो उनके प्राथमिकत्वकी समानता स्पष्ट ही है तथा उनकी व्याप्तिरूप समानता भी स्फुट ही है ॥ १९ ॥

५८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
विश्वस्यात्वमकारमात्रत्वं यदा विवक्ष्यते तदादित्यसामान्यमुक्तन्यायेनोत्कटमुद्भूतं दृश्यत इत्यर्थः । अत्वविवक्षायामित्यस्य व्याख्यानं मात्रासंप्रतिपत्ताविति विश्वस्याकारमात्रत्वं यदा संप्रतिपद्यत इत्यर्थः । आप्तिसामान्यमेव चोत्कटमित्यनुवर्तते चशब्दात् ॥ १९॥जिस समय विश्वका अत्व यानी अकारमात्रत्व कहना इष्ट होता है उस समय पूर्वोक्त न्यायसे उनके प्राथमिकत्वकी समानता उत्कट अर्थात् उद्भूत (प्रकटरूपसे) दिखायी देती है । 'मात्रासम्प्रतिपत्तौ'—यह 'अत्वविवक्षायाम्' इस पदकी ही व्याख्या है । तात्पर्य यह है कि जिस समय विश्वके अकारमात्रत्वका ज्ञान होता है उस समय उनकी व्याप्तिकी समानता तो स्पष्ट ही है । यहाँ 'च' शब्दसे 'उत्कटम्' इस पदकी अनुवृत्ति की जाती है ॥१९॥

तैजसस्योत्वविज्ञाने उत्कर्षो दृश्यते स्फुटम् ।

मात्रासंप्रतिपत्तौ स्यादुभयत्वं तथाविधम् ॥ २० ॥

तैजसको उकाररूप जाननेपर अर्थात् तैजस उकारमात्रारूप है ऐसा जाननेपर उनका उत्कर्ष स्पष्ट दिखायी देता है । तथा उनका उभयत्व भी स्पष्ट ही है ॥ २० ॥

तैजसस्योत्वविज्ञान उकारत्वविवक्षायामुत्कर्षो दृश्यते स्फुटं स्पष्ट इत्यर्थः । उभयत्वं च स्फुटमेवेति । पूर्ववत्सर्वम् ॥ २० ॥तैजसके उत्व-विज्ञानमें अर्थात् उसका उकाररूपसे प्रतिपादन करनेमें उसका उत्कर्ष तो स्पष्ट ही दिखलायी देता है । इसी प्रकार उभयत्व भी स्पष्ट ही है । शेष सब पूर्ववत् है॥२०॥

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५९

मकारभावे प्राज्ञस्य मानसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासंप्रतिपत्तौ तु लयसामान्यमेव च ॥ २१ ॥

प्राज्ञको मकाररूपतामें अर्थात् प्राज्ञ मकारमात्रारूप है—ऐसा जाननेमें उनकी मान करनेकी समानता स्पष्ट है । इसी प्रकार उनमें लय-स्थान होनेकी समानता भी स्पष्ट ही है ॥ २१ ॥

मकारत्वे प्राज्ञस्य मितिलया-द्युत्कृष्टे सामान्ये इत्यर्थः ॥ २१ ॥प्राज्ञके मकाररूप होनेमें मान और लयरूप समानता स्पष्ट हैं—यह इसका तात्पर्य है ॥ २१ ॥

ॐकारोपासकका प्रभाव

त्रिषु धामसु यस्तुल्यं सामान्यं वेत्ति निश्चितः ।
स पूज्यः सर्वभूतानां वन्द्यश्चैव महामुनिः ॥ २२ ॥

जो पुरुष तीनों स्थानोंमें [बतलायी गयी] तुल्यता अथवा समानताको निश्चयपूर्वक जानता है वह महामुनि समस्त प्राणियोंका पूजनीय और वन्दनीय होता है ॥ २२ ॥

यथोक्तस्थानत्रये यस्तुल्यमुक्तं सामान्यं वेत्त्येवमेवैतदिति निश्चितो सन् स पूज्यो वन्द्यश्च ब्रह्मविल्लोके भवति ॥ २२ ॥उपर्युक्त तीनों स्थानोंमें तुल्य-रूपसे बतलायी गयी समानताको जो 'यह इसी प्रकार है' ऐसा निश्चय-पूर्वक जानता है वह ब्रह्मवेत्ता लोकमें पूजनीय एवं वन्दनीय होता है ॥२२॥

ॐकारकी व्यस्तोपासनाके फल

यथोक्तैः सामान्यैरात्मपादानां मात्राभिः सहैकत्वं कृत्वा यथोक्तमोङ्कारं प्रतिपद्य यो ध्यायति तम्—पूर्वोक्त समानताओंसे आत्माके पादोंका मात्राओंके साथ एकत्व करके उपर्युक्त ओंकारको जानते हुए जो उसका ध्यान करता है उसे—
६०माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम् ।

मकारश्च पुनः प्राज्ञं नामात्रे विद्यते गतिः ॥ २३ ॥

अकार विश्वको प्राप्त करा देता है तथा उकार तैजसको और मकार प्राज्ञको; किन्तु अमात्रमें किसीकी गति नहीं है ॥ २३ ॥

अकारो नयते विश्वं प्रापयति । अकारालम्बनमोङ्कारं विद्वान्वैश्वानरो भवतीत्यर्थः । तथोकारस्तैजसम् । मकारश्चापि पुनः प्राज्ञम्। चशब्दान्नयत इत्यनुवर्तते । क्षीणे तु मकारे बीजभावक्षयादमात्र ओङ्कारे गतिर्न विद्यते क्वचिदित्यर्थः ॥ २३ ॥अकार विश्वको प्राप्त करा देता है; अर्थात् अकारके आश्रित ओंकारको जाननेवाला पुरुष वैश्वानर होता है। इसी प्रकार उकार तैजसको और मकार पुनः प्राज्ञको प्राप्त करा देता है। 'च' शब्दसे 'नयते' (प्राप्त करा देता है) इस क्रियाकी अनुवृत्ति होती है। तथा मकारका क्षय होनेपर बीजभावका क्षय हो जानेसे मात्राहीन ओंकारमें कोई गति नहीं होती—यह इसका तात्पर्य है ॥२३॥

अमात्र और आत्माका तादात्म्य

अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥

मात्रारहित ओंकार तुरीय आत्मा ही है। वह अव्यवहार्य, प्रपञ्चोपशम, शिव और अद्वैत है। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है। जो उसे इस प्रकार जानता है वह स्वतः अपने आत्मामें ही प्रवेश कर जाता है ॥ १२ ॥

शां० भा० ]आगम-प्रकरण६१
अमात्रो मात्रा यस्य नास्ति सोऽमात्र ओङ्कारश्चतुर्थस्तुरीय आत्मैव केवलोऽभिधानाभिधेयरूपयोर्वाङ्मनसयोः क्षीणत्वादव्यवहार्यः । प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैतः संवृत्त एवं यथोक्तविज्ञानवता प्रयुक्त ओङ्कारस्त्रिमात्रस्त्रिपाद आत्मैव । संविशत्यात्मना स्वेनैव स्वं पारमार्थिकमात्मानं य एवं वेद । परमार्थदर्शी ब्रह्मवित् तृतीयं बीजभावं दग्ध्वात्मानं प्रविष्ट इति न पुनर्जायते तुरीयस्याबीजत्वात् ।अमात्र—जिसकी मात्रा नहीं है वह अमात्र ओंकार चौथा अर्थात् तुरीय केवल आत्मा ही है। अभिधानरूप वाणी और अभिधेयरूप मनका क्षय हो जानेके कारण वह अव्यवहार्य है । तथा वह प्रपञ्चकी निषेधावधि, मङ्गलमय, और अद्वैतस्वरूप है । इस प्रकार पूर्वोक्त विज्ञानवान् उपासकद्वारा प्रयोग किया हुआ तीन मात्रावाला ओंकार तीन पादवाला आत्मा ही है । जो इस प्रकार जानता है [ अर्थात् इस प्रकार उसकी उपासना करता है ] वह स्वतः ही अपने पारमार्थिक आत्मामें प्रवेश करता है । परमार्थदर्शी ब्रह्मवेत्ता तीसरे बीजभावको भी दग्ध करके आत्मामें प्रवेश करता है; इसलिये उसका पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि तुरीय आत्मा अबीजात्मक है ।
न हि रज्जुसर्पयोर्विवेके रज्ज्वां प्रविष्टः सर्पो बुद्धिसंस्कारात्पुनः पूर्ववत्तद्विवेकिनामुत्थास्यति । मन्दमध्यमधियां तु प्रतिपन्नसाधकभावानां सन्मार्गगामिनां संन्यासिनां मात्राणांरज्जु और सर्पका विवेक हो जानेपर रज्जुमें लीन हुआ सर्प जिन्हें उसका विवेक हो गया है उन पुरुषोंको बुद्धिके संस्कारवश पुनः प्रतीत नहीं हो सकता । किन्तु जो मन्द और मध्यम बुद्धिवाले, साधकभावको प्राप्त, सन्मार्गगामी संन्यासी

२. द्वितीय प्रकरण — वैतथ्यप्रकरण (३८ कारिकाएँ)

६२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


पादानां च क्लृप्तसामान्यविदां यथावदुपास्यमान ओङ्कारो ब्रह्मप्रतिपत्तय आलम्बनीभवति तथा च वक्ष्यति—“आश्रमास्त्रिविधा!” (माण्डू० का० ३।१६) इत्यादि ॥ १२ ॥पूर्वोक्त मात्रा और पादोंके निश्चित सामान्यभावको जाननेवाले हैं उनके लिये तो विधिवत् उपासना किया हुआ ओंकार ब्रह्मप्राप्तिके लिये आश्रयस्वरूप होता है। यही बात “तीन प्रकारके आश्रम हैं” इत्यादि वाक्योंसे कहेंगे ॥ १२ ॥

समस्त और व्यस्त ओंकारोपासना

पूर्ववत्-- | पहलेके समान--

अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थमें ये श्लोक भी हैं—

ओङ्कारं पादशो विद्यात्पादा मात्रा न संशयः ।
ओङ्कारं पादशो ज्ञात्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ २४ ॥

ओंकारको एक-एक पाद करके जाने; पाद ही मात्राएँ हैं—इसमें सन्देह नहीं। इस प्रकार ओंकारको पादक्रमसे जानकर कुछ भी चिन्तन न करे ॥ २४ ॥

यथोक्तैः सामान्यैः पादा एव मात्रा मात्राश्च पादास्तस्मादोङ्कारं पादशो विद्यादित्यर्थः। एवमोङ्कारे ज्ञाते दृष्टार्थमदृष्टार्थं वा न किंचित्पूर्वोक्त समानताओंके कारण पाद ही मात्राएँ हैं और मात्राएँ ही पाद हैं। अतः तात्पर्य यह है कि ओंकारको पादक्रमसे जाने। इस प्रकार ओंकारका ज्ञान हो जानेपर कृतार्थ हो जानेके कारण किसी भी दृष्टार्थ (ऐहिक) अथवा

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ६३


| प्रयोजनं चिन्तयेत्कृतार्थत्वादित्यर्थः ॥ २४ ॥ | अदृष्टार्थ (पारलौकिक) प्रयोजनका चिन्तन न करे—यह इसका अभिप्राय है ॥ २४ ॥ |


युञ्जीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् ।
प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २५ ॥

चित्तको ओंकारमें समाहित करे; ओंकार निर्भय ब्रह्मपद है। ओंकारमें नित्य समाहित रहनेवाले पुरुषको कहीं भी भय नहीं होता ।२५।

| युञ्जीत समादध्याद्यथाव्याख्याते परमार्थरूपे प्रणवे चेतो मनः । यस्मात्प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् । न हि तत्र सदा युक्तस्य भयं विद्यते क्वचित् "विद्वान्न बिभेति कुतश्चन" (तै० उ० २। ९) इति श्रुतेः॥२५॥ | जिसकी पहले व्याख्या की जा चुकी है उस परमार्थस्वरूप ओंकारमें चित्तको युक्त-समाहित करे, क्योंकि ओंकार ही निर्भय ब्रह्म है। उसमें नित्य समाहित रहनेवाले पुरुषको कहीं भी भय नहीं होता, जैसा कि "विद्वान् कहीं भी भयको प्राप्त नहीं होता" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ २५ ॥ |


प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः ।
अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ॥ २६ ॥

ओंकार ही परब्रह्म है और ओंकार ही अपरब्रह्म माना गया है । वह ओंकार अपूर्व (अकारण), अन्तर्बाह्यशून्य, अकार्य तथा अव्यय है ॥ २६ ॥

६४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
परापरे ब्रह्मणी प्रणवः। परमार्थतः क्षीणेषु मात्रापादेषु पर एवात्मा ब्रह्मेति न पूर्वं कारणमस्य विद्यत इत्यपूर्वः । नास्यान्तरं भिन्नजातीयं किञ्चिद्विद्यत इत्यनन्तरः। तथा बाह्यमन्यन्न विद्यत इत्यबाह्यः । अपरं कार्यमस्य न विद्यत इत्यनपरः । सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघन इत्यर्थः ॥ २६ ॥पर और अपर ब्रह्म प्रणव हैं । वस्तुतः मात्रारूप पादोंके क्षीण होनेपर पर आत्मा ही ब्रह्म है, इसलिये इसका कोई पूर्व यानी कारण न होनेसे यह अपूर्व है । इसका कोई अन्तर—भिन्नजातीय भी नहीं है, इसलिये यह अनन्तर है तथा इससे बाह्य भी कोई और नहीं है, इसलिये यह अबाह्य है और इसका कोई अपर—कार्य भी नहीं है इसलिये यह अनपर है । तात्पर्य यह है कि यह बाहर-भीतरसे अजन्मा तथा सैन्धवघनके समान प्रज्ञानघन ही है ॥ २६ ॥

सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च ।

एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम् ॥ २७ ॥

प्रणव ही सबका आदि, मध्य और अन्त है । प्रणवको इस प्रकार जाननेके अनन्तर तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥ २७ ॥

आदिमध्यान्ता उत्पत्तिस्थितिप्रलयाः सर्वस्यैव । मायाहस्तिरज्जुसर्पमृगतृष्णिकाखमादिवद् उत्पद्यमानस्य वियदादिप्रपञ्चस्य यथा मायाव्यादयः । एवं हिसबका आदि, मध्य और अन्त अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय प्रणव ही है। जिस प्रकार कि मायामय हाथी, रज्जुमें प्रतीत होनेवाले सर्प, मृगतृष्णा और खमादिके समान उत्पन्न होनेवाले आकाशादिरूप प्रपञ्चके कारण मायावी आदि

शां० शा० ] आगम-प्रकरण ६५


प्रणवमात्मानं मायाव्यादिस्था- <br> नीयं ज्ञात्वा तत्क्षणादेव तदात्म- <br> भावं व्यश्नुत इत्यर्थः ॥ २७॥हैं उसी प्रकार मायावी आदिस्थानीय <br> उस प्रणवरूप आत्माको जानकर <br> विद्वान् तत्काल ही तद्रूपताको प्राप्त हो <br> जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है ॥२७॥

प्रणवं हीश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् ।

सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २८ ॥

प्रणवको ही सबके हृदयमें स्थित ईश्वर जाने। इस प्रकार सर्वव्यापी ओंकारको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ २८ ॥

सर्वप्राणिजातस्य स्मृति- <br> प्रत्ययास्पदे हृदये स्थितमीश्वरं <br> प्रणवं विद्यात्सर्वव्यापिनं व्योम- <br> वदोङ्कारमात्मानमसंसारिणं धीरो <br> बुद्धिमान्मत्वा न शोचति <br> शोकनिमित्तानुपपत्तेः। “तरति <br> शोकमात्मवित्” (छा० उ० ७ । <br> १।३) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥२८॥प्रणवको ही समस्त प्राणि- <br> समुदायके स्मृतिप्रत्ययके आश्रयभूत <br> हृदयमें स्थित ईश्वर समझे। बुद्धिमान् <br> पुरुष आकाशके समान सर्वव्यापी <br> ओंकारको असंसारी आत्मा [—शुद्ध <br> आत्मतत्त्व] जानकर, शोकके कारण- <br> का अभाव हो जानेसे शोक नहीं <br> करता; जैसा कि “आत्मवेत्ता शोक- <br> को पार कर जाता है” इत्यादि <br> श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ॥२८॥

ओंकारार्थज्ञ ही मुनि है

अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।

ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नैतरो जनः ॥ २९ ॥

९-१०

६६ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


जिसने मात्राहीन, अनन्त मात्रावाले, द्वैतके उपशमस्थान और मङ्गलमय ओंकारको जाना है वही मुनि है; और कोई पुरुष नहीं ॥२९॥

अमात्रस्तुरीय ओङ्कारः। मीयतेऽनयेति मात्रा परिच्छित्तिः सा अनन्ता यस्य सोऽनन्तमात्रः। नैतावत्त्वमस्य परिच्छेत्तुं शक्यत इत्यर्थः । सर्वद्वैतोपशमत्वादेव शिवः। ओङ्कारो यथाव्याख्यातो विदितो येन स परमार्थतत्त्वस्य मननान्मुनिः । नेतरो जनः शास्त्रविदपीत्यर्थः ॥२९॥अमात्र तुरीय ओंकार है। जिससे मान किया जाय उसे 'मात्रा' अर्थात् 'परिच्छित्ति' कहते हैं; वह मात्रा जिसकी अनन्त हो उसे 'अनन्तमात्र' कहा जाता है। तात्पर्य यह है कि इसकी इयत्ताका परिच्छेद नहीं किया जा सकता । सम्पूर्ण द्वैतका उपशमस्थान होनेके कारण ही वह शिव ( मङ्गलमय ) है। इस प्रकार व्याख्या किया हुआ ओंकार जिसने जाना है वही परमार्थतत्त्वका मनन करनेवाला होनेसे 'मुनि' है; दूसरा पुरुष शास्त्रज्ञ होनेपर भी मुनि नहीं है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ २९ ॥

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य शङ्करभगवतः कृतावागमशास्त्रविवरणे गौडपादीयकारिका- सहितमाण्डूक्योपनिषद्भाष्ये प्रथममागमप्रकरणम् ॥१॥

ॐ तत्सत् ।

वैतथ्यप्रकरण


प्रकरणस्य प्रयोजनम्ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इत्युक्तम्, <br> "एकमेवाद्वितीयम्" <br> (छा० उ० ६।२।१) <br> इत्यादिश्रुतिभ्यः । <br> आगममात्रं तत् । तत्रोपपत्त्यापि द्वैतस्य वैतथ्यं शक्यतेऽवधारयितुमिति द्वितीयं प्रकरणमारभ्यते—"एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार (आगम-प्रकरणकी १८ वीं कारिकामें) यह कहा गया है कि ज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं रहता। वह केवल आगम (शास्त्र-वचन) मात्र था। किन्तु द्वैतका मिथ्यात्व युक्तिसे भी निश्चय किया जा सकता है, इसीलिये इस दूसरे प्रकरणका आरम्भ किया जाता है—

स्वप्नदृष्ट पदार्थोंका मिथ्यात्व

वैतथ्यं सर्वभावानां स्वप्न आहुर्मनीषिणः ।
अन्तःस्थानात्तु भावानां संवृतत्वेन हेतुना ॥ १ ॥

[ स्वप्नावस्थामें ] सब पदार्थ शरीरके भीतर स्थित होते हैं; अतः स्थानके सङ्कोचके कारण मनीषिगण स्वप्नमें सब पदार्थोंका मिथ्यात्व प्रतिपादन करते हैं ॥ १ ॥

वितथस्य भावो वैतथ्यम्, असत्यत्वमित्यर्थः। कस्य ? सर्वेषां बाह्याध्यात्मिकानां भावानां पदार्थानां स्वप्न उपलभ्यमानानाम्, आहुः कथयन्ति, मनीषिणः प्रमाणकुशलाः। वैतथ्ये हेतुमाह—वितथ (मिथ्या) के भावका नाम 'वैतथ्य' अर्थात् असत्यत्व है। किसका वैतथ्य ? स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले सम्पूर्ण बाह्य और आन्तरिक पदार्थोंका मनीषिगण अर्थात् प्रमाण-कुशल पुरुष वैतथ्य बतलाते हैं। उनके मिथ्यात्वमें हेतु बतलाते हैं—

६८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


| अन्तःस्थानात्, अन्तः शरीरस्य मध्ये स्थानं येषाम् । तत्र हि भावा उपलभ्यन्ते पर्वतहस्त्यादयो न बहिः शरीरात् । तस्मात्ते वितथा भवितुमर्हन्ति। नन्वपवरकाद्यन्तरुपलभ्यमानैर्घटादिभिरनैकान्तिको हेतुः इत्याशङ्क्याह—संवृतत्वेन हेतुनेति, अन्तःसंवृतस्थानादित्यर्थः।<br><br>अन्तःसंवृत-स्थानात्<br><br>न ह्यन्तः संवृते देहान्तर्नाडीषु पर्वतहस्त्यादीनां सम्भवोऽस्ति; न हि देहे पर्वतोऽस्ति ॥ १ ॥ | अन्तःस्थ होनेके कारण; अन्तर अर्थात् शरीरके मध्यमें स्थान है जिनका [ ऐसे होनेके कारण ]; क्योंकि वहीं पर्वत एवं हस्ती आदि समस्त पदार्थ उपलब्ध होते हैं, शरीरसे बाहर उनकी उपलब्धि नहीं होती; इसलिये वे मिथ्या होने चाहिये। किन्तु [यदि शरीरके भीतर उपलब्ध होनेके कारण ही स्वप्नदृष्ट पदार्थ मिथ्या हैं तो ] गृह आदिके भीतर दिखायी देनेवाले घट आदिमें तो यह हेतु व्यभिचरित हो जायगा [क्योंकि वहाँ जो उनकी प्रतीति है वह तो सत्य ही है ]—ऐसी शङ्का होनेपर कहते हैं—'स्थानके सङ्कोचके कारणसे।' तात्पर्य यह कि शरीरके भीतर संकुचित स्थान होनेसे [ उनका मिथ्यात्व कहा जाता है ] । देहके अन्तर्वर्ती संकुचित नाडीजालमें पर्वत या हाथी आदिका होना सम्भव नहीं है । देहके भीतर पर्वत नहीं हो सकता ॥ १ ॥ |


| स्वप्नदृश्यानां भावानामान्तः संवृतस्थानमित्येतदसिद्धम् , यस्मात् प्राच्येषु सुप्त उदक्षु | स्वप्नमें दिखलायी देनेवाले पदार्थोंका शरीरके भीतर संकुचित स्थान है—यह बात सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि पूर्व दिशामें सोया हुआ पुरुष उत्तर दिशामें स्वप्न देखता-सा |

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ६९


स्वप्नान्पश्यन्निव दृश्यत इत्ये-देखा जाता है [अतः वह शरीरसे
तदाशङ्क्याह—बाहर वहाँ जाकर उन्हें देखता होगा]
—ऐसी आशङ्का करके कहते हैं—

अदीर्घत्वाच्च कालस्य गत्वा देशान्न पश्यति ।

प्रतिबुद्धश्च वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥ २ ॥

समयकी अदीर्घता होनेके कारण वह देहसे बाहर जाकर उन्हें नहीं देखता तथा जागनेपर भी कोई पुरुष उस देशमें विद्यमान नहीं रहता । [ इससे भी उसका स्वप्नदृष्ट देशमें न जाना ही सिद्ध होता है ] ॥ २ ॥

[शांकरभाष्यम्][हिन्दी अनुवाद]
न देहाद्बहिर्देशान्तरं गत्वा स्वप्नान्पश्यति । यस्मात्सुप्तमात्र एव देहदेशाद्योजनशतान्तरिते मासमात्रप्राप्ये देशे स्वप्नान्पश्यन्निव दृश्यते । न च तद्देशप्राप्तेरागमनस्य च दीर्घः कालोऽस्ति । अतोऽदीर्घत्वाच्च कालस्य न स्वप्नदृग्देशान्तरं गच्छति ।<br><br>(पार्श्वटिप्पणी: दीर्घकालाभावात् मिथ्यात्वम्)<br><br>किं च प्रतिबुद्धश्च वै सर्वः स्वप्नदृक्स्वप्नदर्शनदेशे न विद्यते । यदि च स्वप्ने देशान्तरं गच्छेद्यस्मिन्देशे स्वप्नान्पश्येत्तत्रैव प्रतिबुध्येत । न चैतदस्ति । रात्रौ सुप्तोऽहनीव भावान्पश्यति; बहुभिःवह देहसे बाहर देशान्तरमें जाकर स्वप्न नहीं देखता, क्योंकि वह सोया हुआ ही देहके स्थानसे एक मासमें पहुँचने योग्य सौ योजनकी दूरीपर स्वप्न देखता-सा देखा जाता है । [उस समय] उस देशमें पहुँचने और वहाँसे लौटने योग्य दीर्घकाल है ही नहीं । अतः कालकी अदीर्घताके कारण वह स्वप्न-द्रष्टा किसी देशान्तरमें नहीं जाता ।<br><br>यही नहीं, जागनेपर भी कोई स्वप्नद्रष्टा स्वप्न देखनेके स्थानमें नहीं रहता । यदि वह स्वप्नके समय किसी देशान्तरमें जाता तो जिस देशमें स्वप्न देखता उसीमें जागता । किन्तु ऐसी बात नहीं होती । वह रात्रिमें सोया हुआ मानों दिनमें पदार्थोंको देखता है और बहुतोंसे
७०माण्डूक्योपनिषद्[गौ० का०

सङ्गतो भवति, यैश्च सङ्गतस्तैर्गृह्येत । न च गृह्यते; गृहीतश्चेत्त्वामद्य तत्रोपलब्धवन्तो वयमिति ब्रूयुः । न चैतदस्ति, तस्मान्न देशान्तरं गच्छति स्वप्ने ॥ २ ॥ | मिलता है; अतः जिनसे उसका मेल होता है उनके द्वारा वह गृहीत होना चाहिये था । परन्तु गृहीत होता नहीं; यदि गृहीत होता तो 'हमने तुझे वहाँ पाया था' ऐसा कहते । परन्तु ऐसी बात है नहीं; अतः स्वप्नमें वह किसी देशान्तरको नहीं जाता ॥ २ ॥


इतश्च स्वप्नदृश्या भावा वितथा यतः— | स्वप्नमें दिखायी देनेवाले पदार्थ इसलिये भी मिथ्या हैं, क्योंकि—

अभावश्च रथादीनां श्रूयते न्यायपूर्वकम् ।
वैतथ्यं तेन वै प्राप्तं स्वप्न आहुः प्रकाशितम् ॥ ३ ॥

श्रुतिमें भी [स्वप्नदृष्ट] रथादिका अभाव युक्तिपूर्वक सुना गया है । अतः [उपर्युक्त युक्तिसे] सिद्ध हुए मिथ्यात्वको ही स्वप्नमें स्पष्ट बतलाते हैं ॥ ३ ॥

अभावश्चैव रथादीनां स्वप्नदृश्यानां श्रूयते न्यायपूर्वकं युक्तितः श्रुतौ "न तत्र रथाः" (बृ० उ० ४।३।१०) इत्यत्र । देहान्तःस्थानसंवृतत्वादिहेतुना प्राप्तं वैतथ्यं तदनुवादिन्या श्रुत्या स्वप्ने स्वयंज्योतिष्ट्वप्रतिपादनपरया प्रकाशितमाहुर्ब्रह्मविदः ॥ ३ ॥ (रथाद्यभावश्रुतेर्मिथ्यात्वम्) | "उस अवस्था में रथ नहीं हैं" इत्यादि श्रुतिमें भी स्वप्नदृष्ट रथादिका अभाव युक्तिपूर्वक सुना गया है । अतः अन्तःस्थान तथा स्थानके सङ्कोच आदि हेतुओंसे सिद्ध हुआ मिथ्यात्व, उसका अनुवाद करनेवाली तथा स्वप्नमें आत्माका स्वयंप्रकाशत्व प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिद्वारा ब्रह्मवेत्ता स्पष्ट बतलाते हैं ॥ ३ ॥

शां० भा० ] : वैतथ्यप्रकरण ७१


जाग्रद्दृश्य पदार्थोंके मिथ्यात्वमें हेतु

अन्तःस्थानात्तु भेदानां तस्माज्जागरिते स्मृतम् ।
यथा तत्र तथा स्वप्ने संवृतत्वेन भिद्यते ॥ ४ ॥

इसीसे जाग्रत् अवस्थामें भी पदार्थोंका मिथ्यात्व है, क्योंकि जिस प्रकार वे वहाँ स्वप्नावस्थामें [ मिथ्या ] होते हैं उसी प्रकार जाग्रत्में भी होते हैं। केवल शरीरके भीतर स्थित होने और स्थानके संकुचित होनेमें ही स्वप्नदृष्ट पदार्थोंका भेद है ॥ ४ ॥


[स्वप्रपदार्थवद्-दृश्यत्वेन मिथ्यात्वम्] जाग्रद्दृश्यानां भावानां वैतथ्यमिति प्रतिज्ञा । दृश्यत्वादिति हेतुः । स्वप्नदृश्यभाववदिति दृष्टान्तः । यथा तत्र स्वप्ने दृश्यानां भावानां वैतथ्यं तथा जागरितेऽपि दृश्यत्वमविशिष्टमिति हेतूपनयः । तस्माज्जागरितेऽपि वैतथ्यं स्मृतमिति निगमनम् । अन्तःस्थानात्संवृतत्वेन च स्वप्नदृश्यानां भावानां जाग्रद्दृश्येभ्यो भेदः । दृश्यत्वमसत्यत्वं चाविशिष्टमुभयत्र ॥४॥जाग्रत्-अवस्थामें देखे हुए पदार्थ मिथ्या हैं—यह प्रतिज्ञा है। दृश्य होनेके कारण—यह उसका हेतु है। स्वप्नमें देखे हुए पदार्थोंके समान—यह दृष्टान्त है। जिस प्रकार वहाँ स्वप्नमें देखे हुए पदार्थोंका मिथ्यात्व है उसी प्रकार जाग्रत्में भी उनका दृश्यत्व समानरूपसे है—यह हेतूपनय^१ है। अतः जागृतिमें भी उनका मिथ्यात्व माना गया है—यह निगमन है। अन्तःस्थ होने और स्थानका संकोच होनेमें स्वप्नदृष्ट भावोंका जाग्रद्दृष्ट भावोंसे भेद है। दृश्यत्व और असत्यत्व तो दोनों ही अवस्थाओंमें समान हैं ॥ ४ ॥

स्वप्नजागरितस्थाने ह्येकमाहुर्मनीषिणः ।
भेदानां हि समत्वेन प्रसिद्धेनैव हेतुना ॥ ५ ॥


१. व्याप्तिविशिष्ट हेतु पक्षमें है—ऐसा प्रतिपादन करना 'हेतूपनय' कहलाता है।

७२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


इस प्रकार प्रसिद्ध हेतुसे ही पदार्थोंमें समानता होनेके कारण विवेकी पुरुषोंने स्वप्न और जागरित अवस्थाओंको एक ही बतलाया है ॥५॥

प्रसिद्धेनैव भेदानां ग्राह्य-पदार्थोंके ग्राह्यग्राहकत्वरूप प्रसिद्ध
ग्राह्यग्राहक- ग्राहकत्वेन हेतुनाहेतुसे समानता होनेके कारण ही
स्वाच्च समत्वेन स्वप्न-विवेकी पुरुषोंने स्वप्न और जागरित
जागरितस्थानयोरेकत्वमाहुर्विवे-अवस्थाओंका एकत्व प्रतिपादन किया
किन इति पूर्वप्रमाणसिद्धस्यैवहै—इस प्रकार यह पूर्व प्रमाणसे
फलम् ॥ ५ ॥सिद्ध हुए हेतुका ही फल है ॥५॥

इतश्च वैतथ्यं जाग्रद्दृश्यानां भेदानामाद्यन्तयोरभावात् ।जाग्रत्-अवस्थामें दिखलायी देने-वाले पदार्थोंका मिथ्यात्व इसलिये भी है, क्योंकि आदि और अन्तमें उनका अभाव है।

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ ६ ॥

जो आदि और अन्तमें नहीं है [अर्थात् आदि और अन्तमें अस-द्रूप है] वह वर्तमानमें भी वैसा ही है। ये पदार्थसमूह असत्के समान होकर भी सत्-जैसे दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥

यदादावन्ते च नास्ति वस्तुजो मृगतृष्णादि वस्तु आदि और
मृगतृष्णिकादि तन्म-अन्तमें नहीं है वह मध्यमें भी नहीं
आदावन्ते ध्येऽपि नास्तीतिहोती—यह बात लोकमें निश्चित
चाभावात् निश्चितं लोके तथेमेही है। इसी प्रकार ये जाग्रत्
जाग्रद्दृश्या भेदाः। आद्यन्तयोर-अवस्थामें दिखलायी देनेवाले भिन्न-
भावाद्वितथैरेव मृगतृष्णिकादिभिःभिन्न पदार्थ भी आदि और अन्तमें न होनेसे मृगतृष्णा आदि असद्-

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७३

सदृशत्वाद्वितथा एव तथाप्यवि-स्तुओंके समान होनेके कारण असत्
तथा इव लक्षिता मूढैरात्म-ही हैं; तथापि मूढ अनात्मज्ञ पुरुषों-
विद्भिः ॥ ६ ॥द्वारा वे सद्रूप समझे जाते हैं ॥६॥

स्वप्नदृश्यवज्जागरितदृश्याना-**शङ्का—**स्वप्नदृश्योंके समान जाग-
मप्यसत्त्वमिति यदुक्तं तदयुक्तम् ।रित अवस्थाके दृश्योंका भी जो
यस्माज्जाग्रद्दृश्या अन्नपानवाह-असत्यत्व बतलाया गया है वह ठीक
नादयः क्षुत्पिपासादिनिवृत्तिंनहीं क्योंकि जाग्रद्दृश्य अन्न, पान
कुर्वन्तो गमनागमनादिकार्यं चऔर वाहन आदि पदार्थ भूख-प्यास-
सप्रयोजना दृष्टाः । न तुकी निवृत्ति तथा गमनागमन आदि
स्वप्नदृश्यानां तदस्ति । तस्मात्स्वप्न-कार्योंके करनेके कारण प्रयोजनवाले
दृश्यवज्जाग्रद्दृश्यानामसत्त्वंदेखे गये हैं । किन्तु स्वप्नदृश्योंके
मनोरथमात्रमिति ।विषयमें ऐसी बात नहीं है । अतः
स्वप्नदृश्योंके समान जाग्रद्दृश्योंकी
असत्यता केवल मनोरथमात्र है ।
तन्न । कस्मात् ? यस्मात्—**समाधान—**ऐसी बात नहीं है ।
क्यों नहीं है ? क्योंकि—

सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।

तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ७ ॥

स्वप्नमें उन (जाग्रत्पदार्थों) की सप्रयोजनतामें विपरीतता आ जाती है । अतः आदि-अन्तयुक्त होनेके कारण वे निश्चय मिथ्या ही माने गये हैं ॥ ७ ॥

सप्रयोजनता दृष्टा यान्नपाना-[जागरित अवस्थामें] जो अन्न-
दीनां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।पानादिकी सप्रयोजनता देखी गयी
७४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
जागरिते हि भुक्त्वा पीत्वा च तृप्तो विनिवर्तिततृट्सुप्तमात्र एव क्षुत्पिपासाद्यार्तमहोरात्रोषितमभुक्तवन्तमात्मानं मन्यते । यथा स्वप्ने भुक्त्वा पीत्वा चातृप्तोत्थितस्तथा । तस्माज्जाग्रद्दृश्यानां स्वप्ने विप्रतिपत्तिर्दृष्टा । अतो मन्यामहे तेषामप्यसत्त्वं स्वप्नदृश्यवदनाशङ्कनीयमिति । तस्मादाद्यन्तवत्त्वमुभयत्र समानमिति मिथ्यैव खलु ते स्मृताः॥७॥है वह स्वप्नमें नहीं रहती । जागरित अवस्थामें खा-पीकर तृप्त हुआ पुरुष तृषारहित होकर सोनेपर भी [स्वप्नमें] अपनेको क्षुधा-पिपासा आदिसे आर्त, दिन-रात उपवास किया हुआ और बिना भोजन किया हुआ मानता है; जिस प्रकार कि स्वप्नमें, खा-पीकर जागा हुआ पुरुष अपनेको अतृप्त अनुभव करता है । अतः स्वप्नावस्था-में जाग्रद्दृश्योंकी विपरीतता देखी जाती है । इसलिये स्वप्नदृश्योंके समान उनकी असत्यताको भी हम शङ्का न करनेयोग्य मानते हैं । इस प्रकार दोनों ही अवस्थाओंमें आदि-अन्तवत्त्व समान है; अतः वे निश्चय मिथ्या ही माने गये हैं ॥ ७ ॥

स्वप्नजाग्रद्भेद्योः समत्वाज्जाग्रद्भेदानामसत्त्वमिति यदुक्तं तदसत्, कस्मात् ? दृष्टान्तस्यासिद्धत्वात् ? कथम् । न हि जाग्रद्दृष्टा एवैते भेदाः स्वप्ने दृश्यन्ते । किं तर्हि ?स्वप्न और जाग्रत्पदार्थोंके समान होनेसे जाग्रत्पदार्थोंकी जो असत्यता बतलायी गयी है वह ठीक नहीं है। क्यों ? क्योंकि यह दृष्टान्त सिद्ध नहीं हो सकता । कैसे सिद्ध नहीं हो सकता ? क्योंकि जो पदार्थ जाग्रत् अवस्थामें देखे जाते हैं वे ही स्वप्नमें नहीं देखे जाते । तो उस समय और क्या देखा जाता है ?

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७५


अपूर्व्वं स्वप्ने पश्यतिः चतुर्दन्त-स्वप्नमें तो यह अपूर्व वस्तुएँ
गजमारूढमष्टभुजमात्मानं मन्यते।देखता है । अपनेको चार दाँतोंवाले
हाथीपर चढ़ा हुआ तथा आठ
अन्यदप्येवंप्रकारमपूर्व्वं पश्यतिभुजाओंवाला मानता है । इसी प्रकार
स्वप्नमें और भी अपूर्व वस्तुएँ देखा
स्वप्ने । तन्नान्येनासता सममितिकरता है । वे किसी अन्य असत्
सदेव । अतो दृष्टान्तोऽसिद्धः।वस्तुके समान नहीं होतीं; इसलिये वे
सत् ही हैं। अतः यह दृष्टान्त सिद्ध
तस्मात्स्वप्नवज्जागरितस्यासत्त्वसि-नहीं हो सकता । अतः स्वप्नके समान
द्ध्ययुक्तम् ।जागरितकी भी असत्यता है—यह
कथन ठीक नहीं ।
तन्न; स्वप्ने दृष्टमपूर्व्वंऐसी बात नहीं है । स्वप्नमें देखी
यन्मन्यसे न तत्स्वतः सिद्धम् ।हुई जिन वस्तुओंको अपूर्व समझता है
किं तर्हि ?वे स्वतःसिद्ध नहीं हैं । तो कैसी हैं ?

अपूर्व्वं स्थानिधर्मो हि यथा स्वर्गनिवासिनाम् ।
तानयं प्रेक्षते गत्वा यथैवेह सुशिक्षितः ॥ ८ ॥

जिस प्रकार [ इन्द्रादि ] स्वर्गनिवासियोंकी [ सहस्रनेत्रत्वादि ] अलौकिक अवस्थाएँ सुनी जाती हैं उसी प्रकार यह (स्वप्न) भी स्थानी (स्वप्नद्रष्टा आत्मा) का अपूर्व धर्म है । उन स्वाप्न पदार्थोंको यह इसी प्रकार जाकर देखता है जैसे कि इस लोकमें [ किसी मार्गविशेषके सम्बन्धमें ] सुशिक्षित पुरुष [ उस मार्गसे जाकर अपने अभीष्ट लक्ष्यपर पहुँचकर उसे देखता है ] ॥ ८ ॥

अपूर्व्वं स्थानिधर्मो हि स्थानिनोवे स्थानीका अपूर्व धर्म ही हैं; स्थानी
द्रष्टुरेव हि स्वप्नस्थानवतोअर्थात् स्वप्नस्थानवाले द्रष्टाका ही धर्म
धर्मः । यथा स्वर्गनिवासि-हैं। जैसे कि स्वर्गनिवासी इन्द्रादिके
नामिन्द्रादीनां सहस्राक्षत्वादिसहस्राक्षत्वादि धर्म हैं उसी प्रकार

.७६ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


.तथा स्वप्नदृशोऽपूर्वोऽयं धर्मः। न स्वतः सिद्धो द्रष्टुः स्वरूपवत्। तानेवंप्रकारानपूर्वान्स्वचित्तविकल्पानयं स्थानी स्वप्नदृक्स्वप्नस्थानं गत्वा प्रेक्षते। यथैवेह लोके सुशिक्षितो देशान्तरमार्गस्तेन मार्गेण देशान्तरं गत्वा तान्पदार्थान्पश्यति तद्वत्। तस्माद्यथा स्थानिधर्माणां रज्जुसर्पमृगतृष्णिकादीनामसत्त्वं तथा स्वप्नदृश्यानामपूर्वाणां स्थानिधर्मत्वमेवेत्यसत्त्वमतो न स्वप्नदृष्टान्तस्यासिद्धत्वम् ॥ ८ ॥स्वप्नद्रष्टाका यह अपूर्व धर्म है। द्रष्टाके स्वरूपके समान यह स्वतः-सिद्ध नहीं है। इस प्रकारके अपने चित्तद्वारा कल्पना किये हुए उन धर्मोंको यह जो स्वप्न देखनेवाला स्थानी है स्वप्नस्थानमें जाकर देखा करता है; जिस प्रकार इस लोकमें देशान्तरके मार्गके विषयमें सुशिक्षित पुरुष उस मार्गसे देशान्तरमें जाकर वहाँके पदार्थोंको देखता है उसी प्रकार [यह भी देखता है]। अतः जिस प्रकार स्थानीयके धर्म रज्जु-सर्प और मृगतृष्णा आदिकी असत्यता है उसी प्रकार स्वप्नमें देखे जानेवाले अपूर्व पदार्थोंका भी स्थानिधर्मत्व ही है, अतः वे भी असत् हैं। इसलिये स्वप्नदृष्टान्तकी असिद्धता नहीं है ॥८॥

स्वप्नमें मनःकल्पित और इन्द्रियग्राह्य दोनों ही प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं

अपूर्वत्वाशङ्का निराकृता स्वप्नदृष्टान्तस्य पुनः स्वप्नतुल्यतां जाग्रद्भेदानां प्रपञ्चयन्नाह—स्वप्नदृष्टान्तके अपूर्वत्वकी आशंकाका निराकरण कर दिया। अब पुनः जाग्रत्पदार्थोंकी स्वप्नतुल्यताका विस्तृतरूपसे प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—

स्वप्नवृत्तावपि त्वन्तश्चेतसा कल्पितं त्वसत्।
बहिश्चेतोगृहीतं सद् दृष्टं वैतथ्यमेतयोः ॥ ९ ॥