माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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| ६४ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| परापरे ब्रह्मणी प्रणवः। परमार्थतः क्षीणेषु मात्रापादेषु पर एवात्मा ब्रह्मेति न पूर्वं कारणमस्य विद्यत इत्यपूर्वः । नास्यान्तरं भिन्नजातीयं किञ्चिद्विद्यत इत्यनन्तरः। तथा बाह्यमन्यन्न विद्यत इत्यबाह्यः । अपरं कार्यमस्य न विद्यत इत्यनपरः । सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघन इत्यर्थः ॥ २६ ॥ | पर और अपर ब्रह्म प्रणव हैं । वस्तुतः मात्रारूप पादोंके क्षीण होनेपर पर आत्मा ही ब्रह्म है, इसलिये इसका कोई पूर्व यानी कारण न होनेसे यह अपूर्व है । इसका कोई अन्तर—भिन्नजातीय भी नहीं है, इसलिये यह अनन्तर है तथा इससे बाह्य भी कोई और नहीं है, इसलिये यह अबाह्य है और इसका कोई अपर—कार्य भी नहीं है इसलिये यह अनपर है । तात्पर्य यह है कि यह बाहर-भीतरसे अजन्मा तथा सैन्धवघनके समान प्रज्ञानघन ही है ॥ २६ ॥ |
सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च ।
एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम् ॥ २७ ॥
प्रणव ही सबका आदि, मध्य और अन्त है । प्रणवको इस प्रकार जाननेके अनन्तर तद्रूपताको प्राप्त हो जाता है ॥ २७ ॥
| आदिमध्यान्ता उत्पत्तिस्थितिप्रलयाः सर्वस्यैव । मायाहस्तिरज्जुसर्पमृगतृष्णिकाखमादिवद् उत्पद्यमानस्य वियदादिप्रपञ्चस्य यथा मायाव्यादयः । एवं हि | सबका आदि, मध्य और अन्त अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय प्रणव ही है। जिस प्रकार कि मायामय हाथी, रज्जुमें प्रतीत होनेवाले सर्प, मृगतृष्णा और खमादिके समान उत्पन्न होनेवाले आकाशादिरूप प्रपञ्चके कारण मायावी आदि |