माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशां० भा० ] आगम-प्रकरण ६३
| प्रयोजनं चिन्तयेत्कृतार्थत्वादित्यर्थः ॥ २४ ॥ | अदृष्टार्थ (पारलौकिक) प्रयोजनका चिन्तन न करे—यह इसका अभिप्राय है ॥ २४ ॥ |
युञ्जीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् ।
प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २५ ॥
चित्तको ओंकारमें समाहित करे; ओंकार निर्भय ब्रह्मपद है। ओंकारमें नित्य समाहित रहनेवाले पुरुषको कहीं भी भय नहीं होता ।२५।
| युञ्जीत समादध्याद्यथाव्याख्याते परमार्थरूपे प्रणवे चेतो मनः । यस्मात्प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् । न हि तत्र सदा युक्तस्य भयं विद्यते क्वचित् "विद्वान्न बिभेति कुतश्चन" (तै० उ० २। ९) इति श्रुतेः॥२५॥ | जिसकी पहले व्याख्या की जा चुकी है उस परमार्थस्वरूप ओंकारमें चित्तको युक्त-समाहित करे, क्योंकि ओंकार ही निर्भय ब्रह्म है। उसमें नित्य समाहित रहनेवाले पुरुषको कहीं भी भय नहीं होता, जैसा कि "विद्वान् कहीं भी भयको प्राप्त नहीं होता" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है ॥ २५ ॥ |
प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवश्च परः स्मृतः ।
अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवोऽव्ययः ॥ २६ ॥
ओंकार ही परब्रह्म है और ओंकार ही अपरब्रह्म माना गया है । वह ओंकार अपूर्व (अकारण), अन्तर्बाह्यशून्य, अकार्य तथा अव्यय है ॥ २६ ॥