भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 82

६२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


पादानां च क्लृप्तसामान्यविदां यथावदुपास्यमान ओङ्कारो ब्रह्मप्रतिपत्तय आलम्बनीभवति तथा च वक्ष्यति—“आश्रमास्त्रिविधा!” (माण्डू० का० ३।१६) इत्यादि ॥ १२ ॥पूर्वोक्त मात्रा और पादोंके निश्चित सामान्यभावको जाननेवाले हैं उनके लिये तो विधिवत् उपासना किया हुआ ओंकार ब्रह्मप्राप्तिके लिये आश्रयस्वरूप होता है। यही बात “तीन प्रकारके आश्रम हैं” इत्यादि वाक्योंसे कहेंगे ॥ १२ ॥

समस्त और व्यस्त ओंकारोपासना

पूर्ववत्-- | पहलेके समान--

अत्रैते श्लोका भवन्ति—
इसी अर्थमें ये श्लोक भी हैं—

ओङ्कारं पादशो विद्यात्पादा मात्रा न संशयः ।
ओङ्कारं पादशो ज्ञात्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ॥ २४ ॥

ओंकारको एक-एक पाद करके जाने; पाद ही मात्राएँ हैं—इसमें सन्देह नहीं। इस प्रकार ओंकारको पादक्रमसे जानकर कुछ भी चिन्तन न करे ॥ २४ ॥

यथोक्तैः सामान्यैः पादा एव मात्रा मात्राश्च पादास्तस्मादोङ्कारं पादशो विद्यादित्यर्थः। एवमोङ्कारे ज्ञाते दृष्टार्थमदृष्टार्थं वा न किंचित्पूर्वोक्त समानताओंके कारण पाद ही मात्राएँ हैं और मात्राएँ ही पाद हैं। अतः तात्पर्य यह है कि ओंकारको पादक्रमसे जाने। इस प्रकार ओंकारका ज्ञान हो जानेपर कृतार्थ हो जानेके कारण किसी भी दृष्टार्थ (ऐहिक) अथवा