माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० शा० ] आगम-प्रकरण ६५
| प्रणवमात्मानं मायाव्यादिस्था- <br> नीयं ज्ञात्वा तत्क्षणादेव तदात्म- <br> भावं व्यश्नुत इत्यर्थः ॥ २७॥ | हैं उसी प्रकार मायावी आदिस्थानीय <br> उस प्रणवरूप आत्माको जानकर <br> विद्वान् तत्काल ही तद्रूपताको प्राप्त हो <br> जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है ॥२७॥ |
प्रणवं हीश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् ।
सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २८ ॥
प्रणवको ही सबके हृदयमें स्थित ईश्वर जाने। इस प्रकार सर्वव्यापी ओंकारको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ २८ ॥
| सर्वप्राणिजातस्य स्मृति- <br> प्रत्ययास्पदे हृदये स्थितमीश्वरं <br> प्रणवं विद्यात्सर्वव्यापिनं व्योम- <br> वदोङ्कारमात्मानमसंसारिणं धीरो <br> बुद्धिमान्मत्वा न शोचति <br> शोकनिमित्तानुपपत्तेः। “तरति <br> शोकमात्मवित्” (छा० उ० ७ । <br> १।३) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥२८॥ | प्रणवको ही समस्त प्राणि- <br> समुदायके स्मृतिप्रत्ययके आश्रयभूत <br> हृदयमें स्थित ईश्वर समझे। बुद्धिमान् <br> पुरुष आकाशके समान सर्वव्यापी <br> ओंकारको असंसारी आत्मा [—शुद्ध <br> आत्मतत्त्व] जानकर, शोकके कारण- <br> का अभाव हो जानेसे शोक नहीं <br> करता; जैसा कि “आत्मवेत्ता शोक- <br> को पार कर जाता है” इत्यादि <br> श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ॥२८॥ |
ओंकारार्थज्ञ ही मुनि है
अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।
ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नैतरो जनः ॥ २९ ॥
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