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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

शां० शा० ] आगम-प्रकरण ६५


प्रणवमात्मानं मायाव्यादिस्था- <br> नीयं ज्ञात्वा तत्क्षणादेव तदात्म- <br> भावं व्यश्नुत इत्यर्थः ॥ २७॥हैं उसी प्रकार मायावी आदिस्थानीय <br> उस प्रणवरूप आत्माको जानकर <br> विद्वान् तत्काल ही तद्रूपताको प्राप्त हो <br> जाता है-ऐसा इसका तात्पर्य है ॥२७॥

प्रणवं हीश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् ।

सर्वव्यापिनमोङ्कारं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २८ ॥

प्रणवको ही सबके हृदयमें स्थित ईश्वर जाने। इस प्रकार सर्वव्यापी ओंकारको जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ २८ ॥

सर्वप्राणिजातस्य स्मृति- <br> प्रत्ययास्पदे हृदये स्थितमीश्वरं <br> प्रणवं विद्यात्सर्वव्यापिनं व्योम- <br> वदोङ्कारमात्मानमसंसारिणं धीरो <br> बुद्धिमान्मत्वा न शोचति <br> शोकनिमित्तानुपपत्तेः। “तरति <br> शोकमात्मवित्” (छा० उ० ७ । <br> १।३) इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥२८॥प्रणवको ही समस्त प्राणि- <br> समुदायके स्मृतिप्रत्ययके आश्रयभूत <br> हृदयमें स्थित ईश्वर समझे। बुद्धिमान् <br> पुरुष आकाशके समान सर्वव्यापी <br> ओंकारको असंसारी आत्मा [—शुद्ध <br> आत्मतत्त्व] जानकर, शोकके कारण- <br> का अभाव हो जानेसे शोक नहीं <br> करता; जैसा कि “आत्मवेत्ता शोक- <br> को पार कर जाता है” इत्यादि <br> श्रुतियोंसे प्रमाणित होता है ॥२८॥

ओंकारार्थज्ञ ही मुनि है

अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।

ओङ्कारो विदितो येन स मुनिर्नैतरो जनः ॥ २९ ॥

९-१०

६६ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


जिसने मात्राहीन, अनन्त मात्रावाले, द्वैतके उपशमस्थान और मङ्गलमय ओंकारको जाना है वही मुनि है; और कोई पुरुष नहीं ॥२९॥

अमात्रस्तुरीय ओङ्कारः। मीयतेऽनयेति मात्रा परिच्छित्तिः सा अनन्ता यस्य सोऽनन्तमात्रः। नैतावत्त्वमस्य परिच्छेत्तुं शक्यत इत्यर्थः । सर्वद्वैतोपशमत्वादेव शिवः। ओङ्कारो यथाव्याख्यातो विदितो येन स परमार्थतत्त्वस्य मननान्मुनिः । नेतरो जनः शास्त्रविदपीत्यर्थः ॥२९॥अमात्र तुरीय ओंकार है। जिससे मान किया जाय उसे 'मात्रा' अर्थात् 'परिच्छित्ति' कहते हैं; वह मात्रा जिसकी अनन्त हो उसे 'अनन्तमात्र' कहा जाता है। तात्पर्य यह है कि इसकी इयत्ताका परिच्छेद नहीं किया जा सकता । सम्पूर्ण द्वैतका उपशमस्थान होनेके कारण ही वह शिव ( मङ्गलमय ) है। इस प्रकार व्याख्या किया हुआ ओंकार जिसने जाना है वही परमार्थतत्त्वका मनन करनेवाला होनेसे 'मुनि' है; दूसरा पुरुष शास्त्रज्ञ होनेपर भी मुनि नहीं है—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ २९ ॥

इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य शङ्करभगवतः कृतावागमशास्त्रविवरणे गौडपादीयकारिका- सहितमाण्डूक्योपनिषद्भाष्ये प्रथममागमप्रकरणम् ॥१॥

ॐ तत्सत् ।

वैतथ्यप्रकरण


प्रकरणस्य प्रयोजनम्ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इत्युक्तम्, <br> "एकमेवाद्वितीयम्" <br> (छा० उ० ६।२।१) <br> इत्यादिश्रुतिभ्यः । <br> आगममात्रं तत् । तत्रोपपत्त्यापि द्वैतस्य वैतथ्यं शक्यतेऽवधारयितुमिति द्वितीयं प्रकरणमारभ्यते—"एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार (आगम-प्रकरणकी १८ वीं कारिकामें) यह कहा गया है कि ज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं रहता। वह केवल आगम (शास्त्र-वचन) मात्र था। किन्तु द्वैतका मिथ्यात्व युक्तिसे भी निश्चय किया जा सकता है, इसीलिये इस दूसरे प्रकरणका आरम्भ किया जाता है—

स्वप्नदृष्ट पदार्थोंका मिथ्यात्व

वैतथ्यं सर्वभावानां स्वप्न आहुर्मनीषिणः ।
अन्तःस्थानात्तु भावानां संवृतत्वेन हेतुना ॥ १ ॥

[ स्वप्नावस्थामें ] सब पदार्थ शरीरके भीतर स्थित होते हैं; अतः स्थानके सङ्कोचके कारण मनीषिगण स्वप्नमें सब पदार्थोंका मिथ्यात्व प्रतिपादन करते हैं ॥ १ ॥

वितथस्य भावो वैतथ्यम्, असत्यत्वमित्यर्थः। कस्य ? सर्वेषां बाह्याध्यात्मिकानां भावानां पदार्थानां स्वप्न उपलभ्यमानानाम्, आहुः कथयन्ति, मनीषिणः प्रमाणकुशलाः। वैतथ्ये हेतुमाह—वितथ (मिथ्या) के भावका नाम 'वैतथ्य' अर्थात् असत्यत्व है। किसका वैतथ्य ? स्वप्नमें प्रतीत होनेवाले सम्पूर्ण बाह्य और आन्तरिक पदार्थोंका मनीषिगण अर्थात् प्रमाण-कुशल पुरुष वैतथ्य बतलाते हैं। उनके मिथ्यात्वमें हेतु बतलाते हैं—

६८ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


| अन्तःस्थानात्, अन्तः शरीरस्य मध्ये स्थानं येषाम् । तत्र हि भावा उपलभ्यन्ते पर्वतहस्त्यादयो न बहिः शरीरात् । तस्मात्ते वितथा भवितुमर्हन्ति। नन्वपवरकाद्यन्तरुपलभ्यमानैर्घटादिभिरनैकान्तिको हेतुः इत्याशङ्क्याह—संवृतत्वेन हेतुनेति, अन्तःसंवृतस्थानादित्यर्थः।<br><br>अन्तःसंवृत-स्थानात्<br><br>न ह्यन्तः संवृते देहान्तर्नाडीषु पर्वतहस्त्यादीनां सम्भवोऽस्ति; न हि देहे पर्वतोऽस्ति ॥ १ ॥ | अन्तःस्थ होनेके कारण; अन्तर अर्थात् शरीरके मध्यमें स्थान है जिनका [ ऐसे होनेके कारण ]; क्योंकि वहीं पर्वत एवं हस्ती आदि समस्त पदार्थ उपलब्ध होते हैं, शरीरसे बाहर उनकी उपलब्धि नहीं होती; इसलिये वे मिथ्या होने चाहिये। किन्तु [यदि शरीरके भीतर उपलब्ध होनेके कारण ही स्वप्नदृष्ट पदार्थ मिथ्या हैं तो ] गृह आदिके भीतर दिखायी देनेवाले घट आदिमें तो यह हेतु व्यभिचरित हो जायगा [क्योंकि वहाँ जो उनकी प्रतीति है वह तो सत्य ही है ]—ऐसी शङ्का होनेपर कहते हैं—'स्थानके सङ्कोचके कारणसे।' तात्पर्य यह कि शरीरके भीतर संकुचित स्थान होनेसे [ उनका मिथ्यात्व कहा जाता है ] । देहके अन्तर्वर्ती संकुचित नाडीजालमें पर्वत या हाथी आदिका होना सम्भव नहीं है । देहके भीतर पर्वत नहीं हो सकता ॥ १ ॥ |


| स्वप्नदृश्यानां भावानामान्तः संवृतस्थानमित्येतदसिद्धम् , यस्मात् प्राच्येषु सुप्त उदक्षु | स्वप्नमें दिखलायी देनेवाले पदार्थोंका शरीरके भीतर संकुचित स्थान है—यह बात सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि पूर्व दिशामें सोया हुआ पुरुष उत्तर दिशामें स्वप्न देखता-सा |

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ६९


स्वप्नान्पश्यन्निव दृश्यत इत्ये-देखा जाता है [अतः वह शरीरसे
तदाशङ्क्याह—बाहर वहाँ जाकर उन्हें देखता होगा]
—ऐसी आशङ्का करके कहते हैं—

अदीर्घत्वाच्च कालस्य गत्वा देशान्न पश्यति ।

प्रतिबुद्धश्च वै सर्वस्तस्मिन्देशे न विद्यते ॥ २ ॥

समयकी अदीर्घता होनेके कारण वह देहसे बाहर जाकर उन्हें नहीं देखता तथा जागनेपर भी कोई पुरुष उस देशमें विद्यमान नहीं रहता । [ इससे भी उसका स्वप्नदृष्ट देशमें न जाना ही सिद्ध होता है ] ॥ २ ॥

[शांकरभाष्यम्][हिन्दी अनुवाद]
न देहाद्बहिर्देशान्तरं गत्वा स्वप्नान्पश्यति । यस्मात्सुप्तमात्र एव देहदेशाद्योजनशतान्तरिते मासमात्रप्राप्ये देशे स्वप्नान्पश्यन्निव दृश्यते । न च तद्देशप्राप्तेरागमनस्य च दीर्घः कालोऽस्ति । अतोऽदीर्घत्वाच्च कालस्य न स्वप्नदृग्देशान्तरं गच्छति ।<br><br>(पार्श्वटिप्पणी: दीर्घकालाभावात् मिथ्यात्वम्)<br><br>किं च प्रतिबुद्धश्च वै सर्वः स्वप्नदृक्स्वप्नदर्शनदेशे न विद्यते । यदि च स्वप्ने देशान्तरं गच्छेद्यस्मिन्देशे स्वप्नान्पश्येत्तत्रैव प्रतिबुध्येत । न चैतदस्ति । रात्रौ सुप्तोऽहनीव भावान्पश्यति; बहुभिःवह देहसे बाहर देशान्तरमें जाकर स्वप्न नहीं देखता, क्योंकि वह सोया हुआ ही देहके स्थानसे एक मासमें पहुँचने योग्य सौ योजनकी दूरीपर स्वप्न देखता-सा देखा जाता है । [उस समय] उस देशमें पहुँचने और वहाँसे लौटने योग्य दीर्घकाल है ही नहीं । अतः कालकी अदीर्घताके कारण वह स्वप्न-द्रष्टा किसी देशान्तरमें नहीं जाता ।<br><br>यही नहीं, जागनेपर भी कोई स्वप्नद्रष्टा स्वप्न देखनेके स्थानमें नहीं रहता । यदि वह स्वप्नके समय किसी देशान्तरमें जाता तो जिस देशमें स्वप्न देखता उसीमें जागता । किन्तु ऐसी बात नहीं होती । वह रात्रिमें सोया हुआ मानों दिनमें पदार्थोंको देखता है और बहुतोंसे
७०माण्डूक्योपनिषद्[गौ० का०

सङ्गतो भवति, यैश्च सङ्गतस्तैर्गृह्येत । न च गृह्यते; गृहीतश्चेत्त्वामद्य तत्रोपलब्धवन्तो वयमिति ब्रूयुः । न चैतदस्ति, तस्मान्न देशान्तरं गच्छति स्वप्ने ॥ २ ॥ | मिलता है; अतः जिनसे उसका मेल होता है उनके द्वारा वह गृहीत होना चाहिये था । परन्तु गृहीत होता नहीं; यदि गृहीत होता तो 'हमने तुझे वहाँ पाया था' ऐसा कहते । परन्तु ऐसी बात है नहीं; अतः स्वप्नमें वह किसी देशान्तरको नहीं जाता ॥ २ ॥


इतश्च स्वप्नदृश्या भावा वितथा यतः— | स्वप्नमें दिखायी देनेवाले पदार्थ इसलिये भी मिथ्या हैं, क्योंकि—

अभावश्च रथादीनां श्रूयते न्यायपूर्वकम् ।
वैतथ्यं तेन वै प्राप्तं स्वप्न आहुः प्रकाशितम् ॥ ३ ॥

श्रुतिमें भी [स्वप्नदृष्ट] रथादिका अभाव युक्तिपूर्वक सुना गया है । अतः [उपर्युक्त युक्तिसे] सिद्ध हुए मिथ्यात्वको ही स्वप्नमें स्पष्ट बतलाते हैं ॥ ३ ॥

अभावश्चैव रथादीनां स्वप्नदृश्यानां श्रूयते न्यायपूर्वकं युक्तितः श्रुतौ "न तत्र रथाः" (बृ० उ० ४।३।१०) इत्यत्र । देहान्तःस्थानसंवृतत्वादिहेतुना प्राप्तं वैतथ्यं तदनुवादिन्या श्रुत्या स्वप्ने स्वयंज्योतिष्ट्वप्रतिपादनपरया प्रकाशितमाहुर्ब्रह्मविदः ॥ ३ ॥ (रथाद्यभावश्रुतेर्मिथ्यात्वम्) | "उस अवस्था में रथ नहीं हैं" इत्यादि श्रुतिमें भी स्वप्नदृष्ट रथादिका अभाव युक्तिपूर्वक सुना गया है । अतः अन्तःस्थान तथा स्थानके सङ्कोच आदि हेतुओंसे सिद्ध हुआ मिथ्यात्व, उसका अनुवाद करनेवाली तथा स्वप्नमें आत्माका स्वयंप्रकाशत्व प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिद्वारा ब्रह्मवेत्ता स्पष्ट बतलाते हैं ॥ ३ ॥

शां० भा० ] : वैतथ्यप्रकरण ७१


जाग्रद्दृश्य पदार्थोंके मिथ्यात्वमें हेतु

अन्तःस्थानात्तु भेदानां तस्माज्जागरिते स्मृतम् ।
यथा तत्र तथा स्वप्ने संवृतत्वेन भिद्यते ॥ ४ ॥

इसीसे जाग्रत् अवस्थामें भी पदार्थोंका मिथ्यात्व है, क्योंकि जिस प्रकार वे वहाँ स्वप्नावस्थामें [ मिथ्या ] होते हैं उसी प्रकार जाग्रत्में भी होते हैं। केवल शरीरके भीतर स्थित होने और स्थानके संकुचित होनेमें ही स्वप्नदृष्ट पदार्थोंका भेद है ॥ ४ ॥


[स्वप्रपदार्थवद्-दृश्यत्वेन मिथ्यात्वम्] जाग्रद्दृश्यानां भावानां वैतथ्यमिति प्रतिज्ञा । दृश्यत्वादिति हेतुः । स्वप्नदृश्यभाववदिति दृष्टान्तः । यथा तत्र स्वप्ने दृश्यानां भावानां वैतथ्यं तथा जागरितेऽपि दृश्यत्वमविशिष्टमिति हेतूपनयः । तस्माज्जागरितेऽपि वैतथ्यं स्मृतमिति निगमनम् । अन्तःस्थानात्संवृतत्वेन च स्वप्नदृश्यानां भावानां जाग्रद्दृश्येभ्यो भेदः । दृश्यत्वमसत्यत्वं चाविशिष्टमुभयत्र ॥४॥जाग्रत्-अवस्थामें देखे हुए पदार्थ मिथ्या हैं—यह प्रतिज्ञा है। दृश्य होनेके कारण—यह उसका हेतु है। स्वप्नमें देखे हुए पदार्थोंके समान—यह दृष्टान्त है। जिस प्रकार वहाँ स्वप्नमें देखे हुए पदार्थोंका मिथ्यात्व है उसी प्रकार जाग्रत्में भी उनका दृश्यत्व समानरूपसे है—यह हेतूपनय^१ है। अतः जागृतिमें भी उनका मिथ्यात्व माना गया है—यह निगमन है। अन्तःस्थ होने और स्थानका संकोच होनेमें स्वप्नदृष्ट भावोंका जाग्रद्दृष्ट भावोंसे भेद है। दृश्यत्व और असत्यत्व तो दोनों ही अवस्थाओंमें समान हैं ॥ ४ ॥

स्वप्नजागरितस्थाने ह्येकमाहुर्मनीषिणः ।
भेदानां हि समत्वेन प्रसिद्धेनैव हेतुना ॥ ५ ॥


१. व्याप्तिविशिष्ट हेतु पक्षमें है—ऐसा प्रतिपादन करना 'हेतूपनय' कहलाता है।

७२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


इस प्रकार प्रसिद्ध हेतुसे ही पदार्थोंमें समानता होनेके कारण विवेकी पुरुषोंने स्वप्न और जागरित अवस्थाओंको एक ही बतलाया है ॥५॥

प्रसिद्धेनैव भेदानां ग्राह्य-पदार्थोंके ग्राह्यग्राहकत्वरूप प्रसिद्ध
ग्राह्यग्राहक- ग्राहकत्वेन हेतुनाहेतुसे समानता होनेके कारण ही
स्वाच्च समत्वेन स्वप्न-विवेकी पुरुषोंने स्वप्न और जागरित
जागरितस्थानयोरेकत्वमाहुर्विवे-अवस्थाओंका एकत्व प्रतिपादन किया
किन इति पूर्वप्रमाणसिद्धस्यैवहै—इस प्रकार यह पूर्व प्रमाणसे
फलम् ॥ ५ ॥सिद्ध हुए हेतुका ही फल है ॥५॥

इतश्च वैतथ्यं जाग्रद्दृश्यानां भेदानामाद्यन्तयोरभावात् ।जाग्रत्-अवस्थामें दिखलायी देने-वाले पदार्थोंका मिथ्यात्व इसलिये भी है, क्योंकि आदि और अन्तमें उनका अभाव है।

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ ६ ॥

जो आदि और अन्तमें नहीं है [अर्थात् आदि और अन्तमें अस-द्रूप है] वह वर्तमानमें भी वैसा ही है। ये पदार्थसमूह असत्के समान होकर भी सत्-जैसे दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥

यदादावन्ते च नास्ति वस्तुजो मृगतृष्णादि वस्तु आदि और
मृगतृष्णिकादि तन्म-अन्तमें नहीं है वह मध्यमें भी नहीं
आदावन्ते ध्येऽपि नास्तीतिहोती—यह बात लोकमें निश्चित
चाभावात् निश्चितं लोके तथेमेही है। इसी प्रकार ये जाग्रत्
जाग्रद्दृश्या भेदाः। आद्यन्तयोर-अवस्थामें दिखलायी देनेवाले भिन्न-
भावाद्वितथैरेव मृगतृष्णिकादिभिःभिन्न पदार्थ भी आदि और अन्तमें न होनेसे मृगतृष्णा आदि असद्-

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७३

सदृशत्वाद्वितथा एव तथाप्यवि-स्तुओंके समान होनेके कारण असत्
तथा इव लक्षिता मूढैरात्म-ही हैं; तथापि मूढ अनात्मज्ञ पुरुषों-
विद्भिः ॥ ६ ॥द्वारा वे सद्रूप समझे जाते हैं ॥६॥

स्वप्नदृश्यवज्जागरितदृश्याना-**शङ्का—**स्वप्नदृश्योंके समान जाग-
मप्यसत्त्वमिति यदुक्तं तदयुक्तम् ।रित अवस्थाके दृश्योंका भी जो
यस्माज्जाग्रद्दृश्या अन्नपानवाह-असत्यत्व बतलाया गया है वह ठीक
नादयः क्षुत्पिपासादिनिवृत्तिंनहीं क्योंकि जाग्रद्दृश्य अन्न, पान
कुर्वन्तो गमनागमनादिकार्यं चऔर वाहन आदि पदार्थ भूख-प्यास-
सप्रयोजना दृष्टाः । न तुकी निवृत्ति तथा गमनागमन आदि
स्वप्नदृश्यानां तदस्ति । तस्मात्स्वप्न-कार्योंके करनेके कारण प्रयोजनवाले
दृश्यवज्जाग्रद्दृश्यानामसत्त्वंदेखे गये हैं । किन्तु स्वप्नदृश्योंके
मनोरथमात्रमिति ।विषयमें ऐसी बात नहीं है । अतः
स्वप्नदृश्योंके समान जाग्रद्दृश्योंकी
असत्यता केवल मनोरथमात्र है ।
तन्न । कस्मात् ? यस्मात्—**समाधान—**ऐसी बात नहीं है ।
क्यों नहीं है ? क्योंकि—

सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।

तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ७ ॥

स्वप्नमें उन (जाग्रत्पदार्थों) की सप्रयोजनतामें विपरीतता आ जाती है । अतः आदि-अन्तयुक्त होनेके कारण वे निश्चय मिथ्या ही माने गये हैं ॥ ७ ॥

सप्रयोजनता दृष्टा यान्नपाना-[जागरित अवस्थामें] जो अन्न-
दीनां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।पानादिकी सप्रयोजनता देखी गयी
७४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
जागरिते हि भुक्त्वा पीत्वा च तृप्तो विनिवर्तिततृट्सुप्तमात्र एव क्षुत्पिपासाद्यार्तमहोरात्रोषितमभुक्तवन्तमात्मानं मन्यते । यथा स्वप्ने भुक्त्वा पीत्वा चातृप्तोत्थितस्तथा । तस्माज्जाग्रद्दृश्यानां स्वप्ने विप्रतिपत्तिर्दृष्टा । अतो मन्यामहे तेषामप्यसत्त्वं स्वप्नदृश्यवदनाशङ्कनीयमिति । तस्मादाद्यन्तवत्त्वमुभयत्र समानमिति मिथ्यैव खलु ते स्मृताः॥७॥है वह स्वप्नमें नहीं रहती । जागरित अवस्थामें खा-पीकर तृप्त हुआ पुरुष तृषारहित होकर सोनेपर भी [स्वप्नमें] अपनेको क्षुधा-पिपासा आदिसे आर्त, दिन-रात उपवास किया हुआ और बिना भोजन किया हुआ मानता है; जिस प्रकार कि स्वप्नमें, खा-पीकर जागा हुआ पुरुष अपनेको अतृप्त अनुभव करता है । अतः स्वप्नावस्था-में जाग्रद्दृश्योंकी विपरीतता देखी जाती है । इसलिये स्वप्नदृश्योंके समान उनकी असत्यताको भी हम शङ्का न करनेयोग्य मानते हैं । इस प्रकार दोनों ही अवस्थाओंमें आदि-अन्तवत्त्व समान है; अतः वे निश्चय मिथ्या ही माने गये हैं ॥ ७ ॥

स्वप्नजाग्रद्भेद्योः समत्वाज्जाग्रद्भेदानामसत्त्वमिति यदुक्तं तदसत्, कस्मात् ? दृष्टान्तस्यासिद्धत्वात् ? कथम् । न हि जाग्रद्दृष्टा एवैते भेदाः स्वप्ने दृश्यन्ते । किं तर्हि ?स्वप्न और जाग्रत्पदार्थोंके समान होनेसे जाग्रत्पदार्थोंकी जो असत्यता बतलायी गयी है वह ठीक नहीं है। क्यों ? क्योंकि यह दृष्टान्त सिद्ध नहीं हो सकता । कैसे सिद्ध नहीं हो सकता ? क्योंकि जो पदार्थ जाग्रत् अवस्थामें देखे जाते हैं वे ही स्वप्नमें नहीं देखे जाते । तो उस समय और क्या देखा जाता है ?

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७५


अपूर्व्वं स्वप्ने पश्यतिः चतुर्दन्त-स्वप्नमें तो यह अपूर्व वस्तुएँ
गजमारूढमष्टभुजमात्मानं मन्यते।देखता है । अपनेको चार दाँतोंवाले
हाथीपर चढ़ा हुआ तथा आठ
अन्यदप्येवंप्रकारमपूर्व्वं पश्यतिभुजाओंवाला मानता है । इसी प्रकार
स्वप्नमें और भी अपूर्व वस्तुएँ देखा
स्वप्ने । तन्नान्येनासता सममितिकरता है । वे किसी अन्य असत्
सदेव । अतो दृष्टान्तोऽसिद्धः।वस्तुके समान नहीं होतीं; इसलिये वे
सत् ही हैं। अतः यह दृष्टान्त सिद्ध
तस्मात्स्वप्नवज्जागरितस्यासत्त्वसि-नहीं हो सकता । अतः स्वप्नके समान
द्ध्ययुक्तम् ।जागरितकी भी असत्यता है—यह
कथन ठीक नहीं ।
तन्न; स्वप्ने दृष्टमपूर्व्वंऐसी बात नहीं है । स्वप्नमें देखी
यन्मन्यसे न तत्स्वतः सिद्धम् ।हुई जिन वस्तुओंको अपूर्व समझता है
किं तर्हि ?वे स्वतःसिद्ध नहीं हैं । तो कैसी हैं ?

अपूर्व्वं स्थानिधर्मो हि यथा स्वर्गनिवासिनाम् ।
तानयं प्रेक्षते गत्वा यथैवेह सुशिक्षितः ॥ ८ ॥

जिस प्रकार [ इन्द्रादि ] स्वर्गनिवासियोंकी [ सहस्रनेत्रत्वादि ] अलौकिक अवस्थाएँ सुनी जाती हैं उसी प्रकार यह (स्वप्न) भी स्थानी (स्वप्नद्रष्टा आत्मा) का अपूर्व धर्म है । उन स्वाप्न पदार्थोंको यह इसी प्रकार जाकर देखता है जैसे कि इस लोकमें [ किसी मार्गविशेषके सम्बन्धमें ] सुशिक्षित पुरुष [ उस मार्गसे जाकर अपने अभीष्ट लक्ष्यपर पहुँचकर उसे देखता है ] ॥ ८ ॥

अपूर्व्वं स्थानिधर्मो हि स्थानिनोवे स्थानीका अपूर्व धर्म ही हैं; स्थानी
द्रष्टुरेव हि स्वप्नस्थानवतोअर्थात् स्वप्नस्थानवाले द्रष्टाका ही धर्म
धर्मः । यथा स्वर्गनिवासि-हैं। जैसे कि स्वर्गनिवासी इन्द्रादिके
नामिन्द्रादीनां सहस्राक्षत्वादिसहस्राक्षत्वादि धर्म हैं उसी प्रकार

.७६ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


.तथा स्वप्नदृशोऽपूर्वोऽयं धर्मः। न स्वतः सिद्धो द्रष्टुः स्वरूपवत्। तानेवंप्रकारानपूर्वान्स्वचित्तविकल्पानयं स्थानी स्वप्नदृक्स्वप्नस्थानं गत्वा प्रेक्षते। यथैवेह लोके सुशिक्षितो देशान्तरमार्गस्तेन मार्गेण देशान्तरं गत्वा तान्पदार्थान्पश्यति तद्वत्। तस्माद्यथा स्थानिधर्माणां रज्जुसर्पमृगतृष्णिकादीनामसत्त्वं तथा स्वप्नदृश्यानामपूर्वाणां स्थानिधर्मत्वमेवेत्यसत्त्वमतो न स्वप्नदृष्टान्तस्यासिद्धत्वम् ॥ ८ ॥स्वप्नद्रष्टाका यह अपूर्व धर्म है। द्रष्टाके स्वरूपके समान यह स्वतः-सिद्ध नहीं है। इस प्रकारके अपने चित्तद्वारा कल्पना किये हुए उन धर्मोंको यह जो स्वप्न देखनेवाला स्थानी है स्वप्नस्थानमें जाकर देखा करता है; जिस प्रकार इस लोकमें देशान्तरके मार्गके विषयमें सुशिक्षित पुरुष उस मार्गसे देशान्तरमें जाकर वहाँके पदार्थोंको देखता है उसी प्रकार [यह भी देखता है]। अतः जिस प्रकार स्थानीयके धर्म रज्जु-सर्प और मृगतृष्णा आदिकी असत्यता है उसी प्रकार स्वप्नमें देखे जानेवाले अपूर्व पदार्थोंका भी स्थानिधर्मत्व ही है, अतः वे भी असत् हैं। इसलिये स्वप्नदृष्टान्तकी असिद्धता नहीं है ॥८॥

स्वप्नमें मनःकल्पित और इन्द्रियग्राह्य दोनों ही प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं

अपूर्वत्वाशङ्का निराकृता स्वप्नदृष्टान्तस्य पुनः स्वप्नतुल्यतां जाग्रद्भेदानां प्रपञ्चयन्नाह—स्वप्नदृष्टान्तके अपूर्वत्वकी आशंकाका निराकरण कर दिया। अब पुनः जाग्रत्पदार्थोंकी स्वप्नतुल्यताका विस्तृतरूपसे प्रतिपादन करते हुए कहते हैं—

स्वप्नवृत्तावपि त्वन्तश्चेतसा कल्पितं त्वसत्।
बहिश्चेतोगृहीतं सद् दृष्टं वैतथ्यमेतयोः ॥ ९ ॥

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७५


स्वप्नावस्था में भी चित्तके भीतर कल्पना किया हुआ पदार्थ असत् और चित्तसे बाहर [इन्द्रियोंद्वारा] ग्रहण किया हुआ पदार्थ सत् जान पड़ता है; किन्तु इन दोनोंका ही मिथ्यात्व देखा गया है ॥ ९ ॥

स्वप्नवृत्तावपि स्वप्नस्थानेऽपि अन्तश्चेतसा मनोरथसङ्कल्पितमसत्। सङ्कल्पानन्तरसमकालमेवादर्शनात्तत्रैव स्वप्ने बहिश्चेतसा गृहीतं चक्षुरादिद्वारेणोपलब्धं घटादि सत्। इत्येवमसत्यमिति निश्चितेऽपि सदसद्विभागो दृष्टः। उभयोरप्यन्तर्बहिश्चेतःकल्पितयोर्वैंतथ्यमेव दृष्टम् ॥ ९ ॥स्वप्नकी वृत्ति अर्थात् स्वप्नस्थानमें भी चित्तके भीतर मनोरथसे सङ्कल्प की हुई वस्तु असत् होती है; क्योंकि वह सङ्कल्पके पश्चात् तत्क्षण ही दिखायी नहीं देती। तथा उस स्वप्नावस्थामें ही चित्तसे बाहर चक्षु आदिद्वारा ग्रहण किये हुए घट आदि सत् होते हैं। इस प्रकार स्वप्न असत्य है—ऐसा निश्चय हो जानेपर भी उसमें सत्-असत्‌का विभाग देखा जाता है। किन्तु चित्तसे कल्पना किये हुए इन आन्तरिक और बाह्य दोनों ही प्रकारके पदार्थोंका मिथ्यात्व देखा गया है ॥ ९ ॥

जाग्रत्‌में भी दोनों प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं

जाग्रद्वृत्तावपि त्वन्तश्चेतसा कल्पितं त्वसत् ।
बहिश्चेतो गृहीतं सद्युक्तं वैतथ्यमेतयोः ॥ १० ॥

इसी प्रकार जाग्रदवस्थामें भी चित्तके भीतर कल्पना किया हुआ पदार्थ असत् तथा चित्तसे बाहर ग्रहण किया हुआ पदार्थ सत् समझा जाता है। परन्तु इन दोनोंहीका मिथ्यात्व मानना उचित है ॥ १० ॥

७८माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
सदसतोर्वैतथ्यं युक्तम्, अन्तर्बहिश्चेतःकल्पितत्वाविशेषादिति व्याख्यातमन्यत् ॥१०॥इन सत् और असत् पदार्थोंका मिथ्यात्व ठीक ही है, क्योंकि हृदयके भीतर या बाहर कल्पित होनेसे उनमें कोई विशेषता नहीं होती । शेष सबकी व्याख्या हो चुकी है ॥१०॥

इन मिथ्या पदार्थोंकी कल्पना करनेवाला कौन है ?

चोदक आह—[ इसपर ] पूर्वपक्षी कहता है-

उभयोरपि वैतथ्यं भेदानां स्थानयोर्यदि ।
क एतान्बुध्यते भेदान्को वै तेषां विकल्पकः ॥ ११ ॥

यदि [ जागरित और स्वप्न ] दोनों ही स्थानोंके पदार्थोंका मिथ्यात्व है तो इन पदार्थोंको जानता कौन है और कौन इनकी कल्पना करनेवाला है ? ॥ ११ ॥

स्वप्नजाग्रत्स्थानयोर्भेदानां यदि वैतथ्यं क एतानन्तर्बहिश्चेतःकल्पितान्बुध्यते । को वै तेषां विकल्पकः । स्मृतिज्ञानयोः क आलम्बनमित्यभिप्रायः, न चेन्निरात्मवाद इष्टः ॥ ११ ॥यदि स्वप्न और जागरित [ दोनों ही स्थानों ] के पदार्थोंका मिथ्यात्व है तो चित्तके भीतर या बाहर कल्पना किये हुए इन पदार्थोंको जानता कौन है ? और कौन उनकी कल्पना करनेवाला है ? तात्पर्य यह है कि यदि निरात्मवाद अभीष्ट नहीं है तो [ यह बताना चाहिये कि ] उक्त स्मरण ( स्वप्न ) और ज्ञान ( जागरित ) का आलम्बन कौन है ? ॥ ११ ॥

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७९


इनकी कल्पना करनेवाला और इनका साक्षी आत्मा ही है

कल्पयत्यात्मनात्मानमात्मा देवः स्वमायया ।
स एव बुध्यते भेदानिति वेदान्तनिश्चयः ॥ १२ ॥

स्वयंप्रकाश आत्मा अपनी मायासे स्वयं ही कल्पना करता है और वही सब भेदोंको जानता है—यही वेदान्तका निश्चय है ॥ १२ ॥

स्वयं स्वमायया स्वमात्मानमात्मा देव आत्मन्येव वक्ष्यमाणं भेदाकारं कल्पयति रज्ज्वादाविव सर्पादीन् स्वयमेव च तान्बुध्यते भेदांस्तद्वद्देवेत्येवं वेदान्तनिश्चयः। नान्योऽस्ति ज्ञानस्मृत्याश्रयः । न च निरास्पदे एव ज्ञानस्मृती वैनाशिकानामिवेत्यभिप्रायः।१२।स्वयंप्रकाश आत्मा अपनी मायासे रज्जुमें सर्पादिके समान अपनेमें आपहीको आगे बतलाये जानेवाले भेदरूपसे कल्पना करता है और स्वयं ही उन भेदोंको जानता है—इस प्रकार यही वेदान्तका निश्चय है । उसके सिवा स्मृति और ज्ञानका कोई और आश्रय नहीं है । तात्पर्य यह कि वैनाशिकों (बौद्धों) के कथनके समान ये ज्ञान और स्मृति निराधार नहीं हैं ॥ १२ ॥

पदार्थकल्पनाकी विधि

सङ्कल्पयन्केन प्रकारेण कल्पयतीत्युच्यते—वह संकल्प करते हुए किस प्रकार कल्पना करता है ? सो बतलाया जाता है—

विकरोत्यपरान्भावानन्तश्चित्ते व्यवस्थितान् ।
नियतांश्च बहिश्चिन्त एवं कल्पयते प्रभुः ॥ १३ ॥

८० माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


प्रभु आत्मा अपने अन्तःकरणमें [ वासनारूपसे ] स्थित अन्य (लौकिक) भावोंको नानारूप करता है तथा बहिश्चित्त होकर पृथिवी आदि नियत और अनियत पदार्थोंकी भी इसी प्रकार कल्पना करता है ॥१३॥

विकरोति नाना करोत्यपरान् लौकिकान् भावान् पदार्थान् शब्दादीनन्यांश्चान्तश्चित्ते वासनारूपेण व्यवस्थितानव्याकृतान् नियतांश्च पृथ्व्यादीननियतांश्च कल्पनाकालान्यहिश्चित्तःसंस्तथान्तश्चित्तो मनोरथादिलक्षणानित्येवं कल्पयति प्रभुरीश्वर आत्मेत्यर्थः ॥ १३ ॥वह चित्तके भीतर वासनारूपसे स्थित अव्याकृत लौकिक भावों—शब्दादि पदार्थोंको तथा अन्य पृथिवी आदि नियत और कल्पनाकालमें ही उत्पन्न होनेवाले अनियत पदार्थोंको बहिश्चित्त होकर एवं मनोरथादिरूप पदार्थोंको अन्तश्चित्त होकर विकृत करता अर्थात् नाना करता है—इस प्रकार प्रभु—ईश्वर अर्थात् आत्मा कल्पना करता है ॥ १३ ॥

आन्तरिक और बाह्य दोनों प्रकारके पदार्थ मिथ्या हैं

स्वप्नवच्चित्तपरिकल्पितं सर्वमित्येतदाशङ्क्यते। यस्माच्चित्तपरिकल्पितैर्मनोरथादिलक्षणैश्चित्तपरिच्छेद्यैर्वैलक्षण्यं बाह्यानामन्योन्यपरिच्छेद्यत्वमिति।स्वप्नके समान सब कुछ चित्तका ही कल्पना किया हुआ है—इस विषयमें यह शंका होती है—क्योंकि केवल चित्तपरिकल्पित और चित्तसे ही परिच्छेद्य मनोरथादिसे बाह्य पदार्थोंकी अन्योन्यपरिच्छेद्यत्वरूप विलक्षणता है [अतः स्वप्नके समान ये मिथ्या नहीं हो सकते]।
सा न युक्ताशङ्का।समाधान—यह शंका ठीक नहीं है, [क्योंकि—]

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८१


चित्तकाला हि येऽन्तस्तु द्वयकालाश्च ये बहिः ।

कल्पिता एव ते सर्वे विशेषो नान्यहेतुकः ॥ १४ ॥

जो आन्तरिक पदार्थ केवल कल्पनाकालतक ही रहनेवाले हैं और जो बाह्य पदार्थ द्विकालिक [ अर्थात् अन्योन्यपरिच्छेद्य ] हैं वे सभी कल्पित हैं । उनकी विशेषताका [ अर्थात् आन्तरिक पदार्थ असत्य हैं और बाह्य सत्य हैं-इस प्रकारकी भेदकल्पनाका ] कोई दूसरा कारण नहीं है ॥ १४ ॥

चित्तकाला हि येऽन्तस्तु चित्तपरिच्छेद्याः नान्यश्चित्तकालव्यतिरेकेण परिच्छेदकः कालो येषां ते चित्तकालाः । कल्पनाकाल एवोपलभ्यन्त इत्यर्थः । द्वयकालाश्च भेदकाला अन्योन्यपरिच्छेद्याः । यथा- गोदोहनमास्ते; यावदास्ते तावद्गां दोग्धि यावद्गां दोग्धि तावदास्ते । तावानयमेतावान्स इति परस्परपरिच्छेद्यपरिच्छेदकत्वं बाह्यानां भेदानां ते द्वयकालाः । अन्तश्चित्तकाला बाह्याश्च द्वयकालाः कल्पिता एव ते सर्वे । न बाह्यो द्वयकालत्वविशेषः कल्पितत्व-जो आन्तरिक हैं अर्थात् चित्तपरिच्छेद्य हैं वे चित्तकाल हैं; जिनका चित्तकालके सिवा और कोई काल परिच्छेदक न हो उन्हें चित्तकाल कहते हैं। अर्थात् वे केवल कल्पनाके समय ही उपलब्ध होते हैं। तथा बाह्य पदार्थ दो कालवाले-भेदकालिक यानी अन्योन्यपरिच्छेद्य हैं। जैसे गोदोहनपर्यन्त बैठता है; यानी जबतक बैठता है तबतक गौ दुहता है और जबतक गौ दुहता है तबतक बैठता है। उतने समयतक यह रहता है और इतने समयतक वह रहता है- इस प्रकार बाह्य पदार्थोंका परस्पर परिच्छेद्य-परिच्छेदकत्व है; अतः वे दो कालवाले हैं। किन्तु आन्तरिक चित्तकालिक और बाह्य द्विकालिक- ये सब कल्पित ही हैं। बाह्य पदार्थोंकी जो द्विकालिकत्वरूप विशेषता है

११-१२

८२माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
व्यतिरेकेणान्यहेतुकः । अत्रापि हि स्वप्नदृष्टान्तो भवतीत्येव ॥१४॥वह कल्पितत्वके सिवा किसी अन्य कारणसे नहीं है। इस विषयमें भी स्वप्नका दृष्टान्त* है ही ॥ १४ ॥

आन्तरिक और बाह्य पदार्थोंका भेद केवल इन्द्रियजनित हैं

अव्यक्ता एव येऽन्तस्तु स्फुटा एव च ये बहिः ।
कल्पिता एव ते सर्वे विशेषस्त्विन्द्रियान्तरे ॥ १५ ॥

जो आन्तरिक पदार्थ हैं वे अव्यक्त ही हैं और जो बाह्य हैं वे स्पष्ट प्रतीत होनेवाले हैं । किन्तु वे सब हैं कल्पित ही । उनकी विशेषता तो केवल इन्द्रियोंके ही भेदमें है ॥ १५ ॥

यदप्यन्तरव्यक्तत्वं भावानां मनोवासनामात्राभिव्यक्तानां स्फुटत्वं वा बहिश्चक्षुरादीन्द्रियान्तरे विशेषो नासौ भेदानामस्तित्वकृतः स्वप्नेऽपि तथा दर्शनात् । किं तर्हि ? इन्द्रियान्तरकृत एव । अतः कल्पिता एव जाग्रद्भावा अपि स्वप्नभाववदिति सिद्धम् ॥ १५ ॥चित्तकी वासनामात्रासे अभिव्यक्त हुए पदार्थोंका जो अन्तःकरणमें अव्यक्तत्व ( अस्फुटत्व ) और बाह्य चक्षु आदि अन्य इन्द्रियोंमें जो उनका स्फुटत्व है वह विशेषता पदार्थोंकी सत्ताके कारण नहीं है, क्योंकि ऐसा ही स्वप्नमें भी देखा जाता है । तो फिर इसका क्या कारण है ? यह इन्द्रियोंके भेदके ही कारण है । अतः सिद्ध हुआ कि स्वप्नके पदार्थोंके समान जाग्रत्कालीन पदार्थ भी कल्पित ही हैं ॥१५॥

* अर्थात् जाग्रत्के समान स्वप्नके भी चित्तपरिकल्पित पदार्थ कल्पनाकालिक और बाह्य पदार्थ द्विकालिक ही होते हैं; परन्तु वे होते दोनों ही मिथ्या हैं। इसी प्रकार जाग्रत्में भी समझो ।

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ८३


पदार्थकल्पनाकी मूल जीवकल्पना है

बाह्याध्यात्मिकानां भावानामितरेतरनिमित्तनैमित्तिकतया कल्पनायां किं मूलमित्युच्यते—बाह्य और आन्तरिक पदार्थोंकी परस्पर निमित्त और नैमित्तिकरूपसे कल्पना होनेमें क्या कारण है ? सो बतलाया जाता है—

जीवं कल्पयते पूर्वं ततो भावान्पृथग्विधान् ।
बाह्यानाध्यात्मिकांश्चैव यथाविद्यस्तथास्मृतिः ॥ १६ ॥

[ वह प्रभु ] सबसे पहले जीवकी कल्पना करता है; फिर तरह-तरहके बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थोंकी कल्पना करता है। उस जीवका जैसा विज्ञान होता है वैसी ही स्मृति भी होती है ॥ १६ ॥

जीवं हेतुफलात्मकम्; अहं करोमि मम सुखदुःखे इत्येवंलक्षणम्; अनेवंलक्षण एव शुद्ध आत्मनि रज्जाविव सर्पं कल्पयते पूर्वम् । ततस्तदर्थ्येन क्रियाकारकफलभेदेन प्राणादीन्नानाविधान्भावान्बाह्यानाध्यात्मिकांश्चैव कल्पते । <br><br> तत्र कल्पनायां को हेतुरित्युच्यते । योऽसौ स्वयं कल्पितो जीवः सर्वकल्पनायामधिकृतः स यथाविद्यः, यादृशी विद्या विज्ञानमस्येति यथाविद्यः; तथाविधैव स्मृतिस्तस्येति तथास्मृतिर्भवतिसबसे पहले 'मैं करता हूँ, मुझे सुख-दुःख हैं' इस प्रकारके हेतुफलात्मक जीवकी [ वह प्रभु ] इससे विपरीत लक्षणोंवाले शुद्ध आत्मामें रज्जुमें सर्पके समान कल्पना करता है। फिर उसीके लिये क्रिया, कारक और फलके भेदसे प्राण आदि नाना प्रकारके बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थोंकी कल्पना करता है । <br><br> उस कल्पनामें क्या हेतु है—इसपर कहा जाता है—यह जो स्वयं कल्पना किया हुआ जीव सब प्रकारकी कल्पनाका अधिकारी है, वह जैसी विद्यावाला होता है अर्थात् उसकी जैसी विद्या यानी विज्ञान होता है वैसी ही स्मृति भी होती है । अतः वह वैसी ही स्मृतिवाला होता है ।
८४माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| स इति । अतो हेतुकल्पना- | इस प्रकार [अन्नभक्षणादि] हेतुकी | | विज्ञानात्फलविज्ञानं ततो हेतुफल- | कल्पनाके विज्ञानसे ही [तृप्ति आदि] | | | फलका विज्ञान होता है; उससे [दूसरे | | | दिन भी] उन हेतु और फलकी स्मृति | | स्मृतिस्ततस्तद्विज्ञानं तदर्थक्रिया- | होती है और उस स्मृतिसे उनका ज्ञान | | | तथा उनके लिये होनेवाले [पाकादि] | | कारकतत्फलभेदविज्ञानानि । | कर्म, [तण्डुलादि] कारक और उनके | | | [तृप्ति आदि] फलभेदके ज्ञान होते हैं। | | तेभ्यस्तत्स्मृतिस्तत्स्मृतेश्च पुन- | उनसे उनकी स्मृति होती है तथा उस | | स्तद्विज्ञानानीत्येवं बाह्यानाध्या- | स्मृतिसे फिर उन [हेतु आदि] के | | | विज्ञान होते हैं। इस प्रकार यह जीव | | त्मिकांश्चेतरेतरनिमित्तनैमित्तिक- | बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थोंकी | | | पारस्परिक निमित्त-नैमित्तिकभावसे | | भावेनानेकधा कल्पयते ॥१६॥ | अनेक प्रकार कल्पना करता है ॥१६॥ |

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जीवकल्पनाका हेतु अज्ञान है

| तत्र जीवकल्पना सर्वकल्पना- | यहाँतक जीवकल्पना ही सब | | मूलमित्युक्तं सैव जीवकल्पना | कल्पनाओंका मूल है—यह कहा गया; | | किंनिमित्तेति दृष्टान्तेन प्रति- | किन्तु वह जीव-कल्पना है किस | | पादयति— | निमित्तसे ?—इस बातका दृष्टान्तसे | | | प्रतिपादन करते हैं— |

अनिश्चिता यथा रज्जुरन्धकारे विकल्पिता ।
सर्पधारादिभिर्भावैस्तद्वदात्मा विकल्पितः ॥ १७ ॥

जिस प्रकार [अपने स्वरूपसे] निश्चय न की हुई रज्जु अन्धकारमें सर्प-धारा आदि भावोंसे कल्पना की जाती है उसी प्रकार आत्मामें भी तरह-तरहकी कल्पनाएँ हो रही हैं ॥ १७ ॥

| यथा लोके स्वेन रूपेणानिश्चि- | जिस प्रकार अपने स्वरूपसे | | तानवधारितैवंमेवेति रज्जुर्मन्दा- | अनिश्चित अर्थात् यह ऐसी ही है— |