भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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७२ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०


इस प्रकार प्रसिद्ध हेतुसे ही पदार्थोंमें समानता होनेके कारण विवेकी पुरुषोंने स्वप्न और जागरित अवस्थाओंको एक ही बतलाया है ॥५॥

प्रसिद्धेनैव भेदानां ग्राह्य-पदार्थोंके ग्राह्यग्राहकत्वरूप प्रसिद्ध
ग्राह्यग्राहक- ग्राहकत्वेन हेतुनाहेतुसे समानता होनेके कारण ही
स्वाच्च समत्वेन स्वप्न-विवेकी पुरुषोंने स्वप्न और जागरित
जागरितस्थानयोरेकत्वमाहुर्विवे-अवस्थाओंका एकत्व प्रतिपादन किया
किन इति पूर्वप्रमाणसिद्धस्यैवहै—इस प्रकार यह पूर्व प्रमाणसे
फलम् ॥ ५ ॥सिद्ध हुए हेतुका ही फल है ॥५॥

इतश्च वैतथ्यं जाग्रद्दृश्यानां भेदानामाद्यन्तयोरभावात् ।जाग्रत्-अवस्थामें दिखलायी देने-वाले पदार्थोंका मिथ्यात्व इसलिये भी है, क्योंकि आदि और अन्तमें उनका अभाव है।

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा ।
वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ ६ ॥

जो आदि और अन्तमें नहीं है [अर्थात् आदि और अन्तमें अस-द्रूप है] वह वर्तमानमें भी वैसा ही है। ये पदार्थसमूह असत्के समान होकर भी सत्-जैसे दिखायी देते हैं ॥ ६ ॥

यदादावन्ते च नास्ति वस्तुजो मृगतृष्णादि वस्तु आदि और
मृगतृष्णिकादि तन्म-अन्तमें नहीं है वह मध्यमें भी नहीं
आदावन्ते ध्येऽपि नास्तीतिहोती—यह बात लोकमें निश्चित
चाभावात् निश्चितं लोके तथेमेही है। इसी प्रकार ये जाग्रत्
जाग्रद्दृश्या भेदाः। आद्यन्तयोर-अवस्थामें दिखलायी देनेवाले भिन्न-
भावाद्वितथैरेव मृगतृष्णिकादिभिःभिन्न पदार्थ भी आदि और अन्तमें न होनेसे मृगतृष्णा आदि असद्-