माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७३
| सदृशत्वाद्वितथा एव तथाप्यवि- | स्तुओंके समान होनेके कारण असत् |
| तथा इव लक्षिता मूढैरात्म- | ही हैं; तथापि मूढ अनात्मज्ञ पुरुषों- |
| विद्भिः ॥ ६ ॥ | द्वारा वे सद्रूप समझे जाते हैं ॥६॥ |
| स्वप्नदृश्यवज्जागरितदृश्याना- | **शङ्का—**स्वप्नदृश्योंके समान जाग- |
| मप्यसत्त्वमिति यदुक्तं तदयुक्तम् । | रित अवस्थाके दृश्योंका भी जो |
| यस्माज्जाग्रद्दृश्या अन्नपानवाह- | असत्यत्व बतलाया गया है वह ठीक |
| नादयः क्षुत्पिपासादिनिवृत्तिं | नहीं क्योंकि जाग्रद्दृश्य अन्न, पान |
| कुर्वन्तो गमनागमनादिकार्यं च | और वाहन आदि पदार्थ भूख-प्यास- |
| सप्रयोजना दृष्टाः । न तु | की निवृत्ति तथा गमनागमन आदि |
| स्वप्नदृश्यानां तदस्ति । तस्मात्स्वप्न- | कार्योंके करनेके कारण प्रयोजनवाले |
| दृश्यवज्जाग्रद्दृश्यानामसत्त्वं | देखे गये हैं । किन्तु स्वप्नदृश्योंके |
| मनोरथमात्रमिति । | विषयमें ऐसी बात नहीं है । अतः |
| स्वप्नदृश्योंके समान जाग्रद्दृश्योंकी | |
| असत्यता केवल मनोरथमात्र है । | |
| तन्न । कस्मात् ? यस्मात्— | **समाधान—**ऐसी बात नहीं है । |
| क्यों नहीं है ? क्योंकि— |
सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।
तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ७ ॥
स्वप्नमें उन (जाग्रत्पदार्थों) की सप्रयोजनतामें विपरीतता आ जाती है । अतः आदि-अन्तयुक्त होनेके कारण वे निश्चय मिथ्या ही माने गये हैं ॥ ७ ॥
| सप्रयोजनता दृष्टा यान्नपाना- | [जागरित अवस्थामें] जो अन्न- |
| दीनां स्वप्ने विप्रतिपद्यते । | पानादिकी सप्रयोजनता देखी गयी |