भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७३

सदृशत्वाद्वितथा एव तथाप्यवि-स्तुओंके समान होनेके कारण असत्
तथा इव लक्षिता मूढैरात्म-ही हैं; तथापि मूढ अनात्मज्ञ पुरुषों-
विद्भिः ॥ ६ ॥द्वारा वे सद्रूप समझे जाते हैं ॥६॥

स्वप्नदृश्यवज्जागरितदृश्याना-**शङ्का—**स्वप्नदृश्योंके समान जाग-
मप्यसत्त्वमिति यदुक्तं तदयुक्तम् ।रित अवस्थाके दृश्योंका भी जो
यस्माज्जाग्रद्दृश्या अन्नपानवाह-असत्यत्व बतलाया गया है वह ठीक
नादयः क्षुत्पिपासादिनिवृत्तिंनहीं क्योंकि जाग्रद्दृश्य अन्न, पान
कुर्वन्तो गमनागमनादिकार्यं चऔर वाहन आदि पदार्थ भूख-प्यास-
सप्रयोजना दृष्टाः । न तुकी निवृत्ति तथा गमनागमन आदि
स्वप्नदृश्यानां तदस्ति । तस्मात्स्वप्न-कार्योंके करनेके कारण प्रयोजनवाले
दृश्यवज्जाग्रद्दृश्यानामसत्त्वंदेखे गये हैं । किन्तु स्वप्नदृश्योंके
मनोरथमात्रमिति ।विषयमें ऐसी बात नहीं है । अतः
स्वप्नदृश्योंके समान जाग्रद्दृश्योंकी
असत्यता केवल मनोरथमात्र है ।
तन्न । कस्मात् ? यस्मात्—**समाधान—**ऐसी बात नहीं है ।
क्यों नहीं है ? क्योंकि—

सप्रयोजनता तेषां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।

तस्मादाद्यन्तवत्त्वेन मिथ्यैव खलु ते स्मृताः ॥ ७ ॥

स्वप्नमें उन (जाग्रत्पदार्थों) की सप्रयोजनतामें विपरीतता आ जाती है । अतः आदि-अन्तयुक्त होनेके कारण वे निश्चय मिथ्या ही माने गये हैं ॥ ७ ॥

सप्रयोजनता दृष्टा यान्नपाना-[जागरित अवस्थामें] जो अन्न-
दीनां स्वप्ने विप्रतिपद्यते ।पानादिकी सप्रयोजनता देखी गयी