भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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शां० भा० ] आगम-प्रकरण ५९

मकारभावे प्राज्ञस्य मानसामान्यमुत्कटम् ।
मात्रासंप्रतिपत्तौ तु लयसामान्यमेव च ॥ २१ ॥

प्राज्ञको मकाररूपतामें अर्थात् प्राज्ञ मकारमात्रारूप है—ऐसा जाननेमें उनकी मान करनेकी समानता स्पष्ट है । इसी प्रकार उनमें लय-स्थान होनेकी समानता भी स्पष्ट ही है ॥ २१ ॥

मकारत्वे प्राज्ञस्य मितिलया-द्युत्कृष्टे सामान्ये इत्यर्थः ॥ २१ ॥प्राज्ञके मकाररूप होनेमें मान और लयरूप समानता स्पष्ट हैं—यह इसका तात्पर्य है ॥ २१ ॥

ॐकारोपासकका प्रभाव

त्रिषु धामसु यस्तुल्यं सामान्यं वेत्ति निश्चितः ।
स पूज्यः सर्वभूतानां वन्द्यश्चैव महामुनिः ॥ २२ ॥

जो पुरुष तीनों स्थानोंमें [बतलायी गयी] तुल्यता अथवा समानताको निश्चयपूर्वक जानता है वह महामुनि समस्त प्राणियोंका पूजनीय और वन्दनीय होता है ॥ २२ ॥

यथोक्तस्थानत्रये यस्तुल्यमुक्तं सामान्यं वेत्त्येवमेवैतदिति निश्चितो सन् स पूज्यो वन्द्यश्च ब्रह्मविल्लोके भवति ॥ २२ ॥उपर्युक्त तीनों स्थानोंमें तुल्य-रूपसे बतलायी गयी समानताको जो 'यह इसी प्रकार है' ऐसा निश्चय-पूर्वक जानता है वह ब्रह्मवेत्ता लोकमें पूजनीय एवं वन्दनीय होता है ॥२२॥

ॐकारकी व्यस्तोपासनाके फल

यथोक्तैः सामान्यैरात्मपादानां मात्राभिः सहैकत्वं कृत्वा यथोक्तमोङ्कारं प्रतिपद्य यो ध्यायति तम्—पूर्वोक्त समानताओंसे आत्माके पादोंका मात्राओंके साथ एकत्व करके उपर्युक्त ओंकारको जानते हुए जो उसका ध्यान करता है उसे—