माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ५८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| विश्वस्यात्वमकारमात्रत्वं यदा विवक्ष्यते तदादित्यसामान्यमुक्तन्यायेनोत्कटमुद्भूतं दृश्यत इत्यर्थः । अत्वविवक्षायामित्यस्य व्याख्यानं मात्रासंप्रतिपत्ताविति विश्वस्याकारमात्रत्वं यदा संप्रतिपद्यत इत्यर्थः । आप्तिसामान्यमेव चोत्कटमित्यनुवर्तते चशब्दात् ॥ १९॥ | जिस समय विश्वका अत्व यानी अकारमात्रत्व कहना इष्ट होता है उस समय पूर्वोक्त न्यायसे उनके प्राथमिकत्वकी समानता उत्कट अर्थात् उद्भूत (प्रकटरूपसे) दिखायी देती है । 'मात्रासम्प्रतिपत्तौ'—यह 'अत्वविवक्षायाम्' इस पदकी ही व्याख्या है । तात्पर्य यह है कि जिस समय विश्वके अकारमात्रत्वका ज्ञान होता है उस समय उनकी व्याप्तिकी समानता तो स्पष्ट ही है । यहाँ 'च' शब्दसे 'उत्कटम्' इस पदकी अनुवृत्ति की जाती है ॥१९॥ |
तैजसस्योत्वविज्ञाने उत्कर्षो दृश्यते स्फुटम् ।
मात्रासंप्रतिपत्तौ स्यादुभयत्वं तथाविधम् ॥ २० ॥
तैजसको उकाररूप जाननेपर अर्थात् तैजस उकारमात्रारूप है ऐसा जाननेपर उनका उत्कर्ष स्पष्ट दिखायी देता है । तथा उनका उभयत्व भी स्पष्ट ही है ॥ २० ॥
| तैजसस्योत्वविज्ञान उकारत्वविवक्षायामुत्कर्षो दृश्यते स्फुटं स्पष्ट इत्यर्थः । उभयत्वं च स्फुटमेवेति । पूर्ववत्सर्वम् ॥ २० ॥ | तैजसके उत्व-विज्ञानमें अर्थात् उसका उकाररूपसे प्रतिपादन करनेमें उसका उत्कर्ष तो स्पष्ट ही दिखलायी देता है । इसी प्रकार उभयत्व भी स्पष्ट ही है । शेष सब पूर्ववत् है॥२०॥ |