माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ६० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम् ।
मकारश्च पुनः प्राज्ञं नामात्रे विद्यते गतिः ॥ २३ ॥
अकार विश्वको प्राप्त करा देता है तथा उकार तैजसको और मकार प्राज्ञको; किन्तु अमात्रमें किसीकी गति नहीं है ॥ २३ ॥
| अकारो नयते विश्वं प्रापयति । अकारालम्बनमोङ्कारं विद्वान्वैश्वानरो भवतीत्यर्थः । तथोकारस्तैजसम् । मकारश्चापि पुनः प्राज्ञम्। चशब्दान्नयत इत्यनुवर्तते । क्षीणे तु मकारे बीजभावक्षयादमात्र ओङ्कारे गतिर्न विद्यते क्वचिदित्यर्थः ॥ २३ ॥ | अकार विश्वको प्राप्त करा देता है; अर्थात् अकारके आश्रित ओंकारको जाननेवाला पुरुष वैश्वानर होता है। इसी प्रकार उकार तैजसको और मकार पुनः प्राज्ञको प्राप्त करा देता है। 'च' शब्दसे 'नयते' (प्राप्त करा देता है) इस क्रियाकी अनुवृत्ति होती है। तथा मकारका क्षय होनेपर बीजभावका क्षय हो जानेसे मात्राहीन ओंकारमें कोई गति नहीं होती—यह इसका तात्पर्य है ॥२३॥ |
अमात्र और आत्माका तादात्म्य
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ॥ १२ ॥
मात्रारहित ओंकार तुरीय आत्मा ही है। वह अव्यवहार्य, प्रपञ्चोपशम, शिव और अद्वैत है। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है। जो उसे इस प्रकार जानता है वह स्वतः अपने आत्मामें ही प्रवेश कर जाता है ॥ १२ ॥