भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

शां० भा० ] आगम-प्रकरण ३९


तस्मात्प्रतिषेधविज्ञानप्रमाणव्यापा-ही नहीं होगी । अतः यह सिद्ध
हुआ कि प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाणके
रसमकालैवात्मन्यध्यारोपितान्तः-प्रवृत्त होनेके समकालमें ही आत्मामें
आरोपित अन्तःप्रज्ञत्वादि अनर्थकी
प्रज्ञत्वाद्यनर्थनिवृत्तिरिति सिद्धम्।निवृत्ति हो जाती है ।
नान्तःप्रज्ञमिति तैजसप्रतिषेधः।'अन्तःप्रज्ञ नहीं है' ऐसा कहकर
तैजसका प्रतिषेध किया है; 'बहि-
न बहिष्प्रज्ञमिति विश्वप्रतिषेधः।ष्प्रज्ञ नहीं है' इससे विश्वका निषेध
नोभयतःप्रज्ञमिति जाग्रत्स्वप्नयोःकिया है; 'उभयतःप्रज्ञ नहीं है'
इस वाक्यसे जाग्रत् और स्वप्नके
अन्तरालावस्थाप्रतिषेधः । नबीचकी अवस्थाका प्रतिषेध किया है;
प्रज्ञानघनमिति सुषुप्तावस्थाप्रति-'प्रज्ञानघन नहीं है' इससे सुषुप्तिका
प्रतिषेध हुआ है, क्योंकि वह बीज-
षेधः। बीजभावाविवैकरूपत्वात्।भावमय-अविवेकस्वरूपा है; 'प्रज्ञ
न प्रज्ञमिति युगपत्सर्वविषयप्रज्ञा-नहीं है' इससे एक साथ सब
विषयोंके ज्ञातृत्वका प्रतिषेध किया है;
तृत्वप्रतिषेधः । नाप्रज्ञमित्य-तथा 'अप्रज्ञ नहीं है' इससे
चैतन्यप्रतिषेधः ।अचेतनताका निषेध किया है ।
कथं पुनरन्तःप्रज्ञत्वादीना-किन्तु जब कि अन्तःप्रज्ञत्वादि
धर्म आत्मामें प्रत्यक्ष उपलब्ध होते हैं
मात्मनि गम्यमानानां रज्ज्वादौतो केवल प्रतिषेधके ही कारण
उनका रज्जुमें प्रतीत होनेवाले
सर्पादिवत्प्रतिषेधादसत्त्वं गम्यतसर्पादिके समान असत्यत्व कैसे सिद्ध
हो सकता है ? इसपर कहते हैं—
इत्युच्यते । ज्ञस्वरूपाविशेषेऽपिरज्जु आदिमें प्रतीत होनेवाले सर्प,

करनेके उत्तर-क्षणमें ही वृत्तिज्ञान स्वयं भी निवृत्त हो जाता है—यही मत समीचीन है ।