माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३८ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० कां० |
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| वसाना तदा नान्तरीयकं घट- | निवृत्तिरूप फलमें ही समाप्त हो जाने- | | विज्ञानं न तत्प्रमाणफलम् । | वाला है तब घटज्ञान तो अवश्यम्भावी है, वह प्रमाणका फल नहीं है । | | न च तद्वदप्यात्मन्यध्यारो- | उसीके समान आत्मामें आरोपित | | पितान्तःप्रज्ञत्वादिविवेककरणे | अन्तःप्रज्ञत्वादिके विवेक करनेमें | | प्रवृत्तस्य प्रतिषेधविज्ञानप्रमाणस्य | प्रवृत्त प्रतिषेधविज्ञानरूप प्रमाणका, | | अनुपादित्सितान्तःप्रज्ञत्वादिनि- | अनुपादित्सित (जिसका स्वीकार | | वृत्तिव्यतिरेकेण तुरीये व्यापारो- | करना इष्ट नहीं है उस) अन्तःप्रज्ञत्वादि- | | पपत्तिः । अन्तःप्रज्ञत्वादिनि- | की निवृत्तिके सिवा तुरीय आत्मामें | | वृत्तिसमकालमेव प्रमातृत्वादि- | कोई अन्य व्यापार होना सम्भव | | भेदन्निवृत्तेः । तथा च वक्ष्यति— | नहीं है, क्योंकि अन्तःप्रज्ञत्वादिकी | | "ज्ञाते द्वैतं न विद्यते" (माण्डू० | निवृत्तिके समकालमें ही प्रमातृत्वादि | | का० १ । १८) इति । ज्ञानस्य | भेदकी निवृत्ति हो जाती है । ऐसा | | द्वैतनिवृत्तिक्षणव्यतिरेकेण क्षणा- | ही "ज्ञान हो जानेपर द्वैत नहीं | | न्तरानवस्थानात् । अवस्थाने | रहता" इत्यादि वाक्यद्वारा आगे कहेंगे | | चानवस्थाप्रसङ्गादद्वैतानिवृत्तिः । | भी; क्योंकि वृत्तिज्ञानकी भी स्थिति | | | द्वैतनिवृत्तिके क्षणके सिवा दूसरे | | | क्षणमें नहीं रहती; और यदि स्थिति | | | मानी जाय तो अनवस्थाका प्रसङ्ग* | | | उपस्थित हो जानेसे द्वैतकी निवृत्ति |
कोई कारण दिखायी नहीं देता; अतः विषयज्ञान होना ही नहीं चाहिये—ऐसी आशङ्का करके आगेकी बात कहते हैं ।
* अद्वैत-बोधके लिये जिन-जिन प्रमाणोंका आश्रय लिया जाता है वे सब द्वैतप्रपञ्चके ही अन्तर्गत हैं । निखिलद्वैतकी निवृत्ति करनेवाला वृत्तिज्ञान भी वृत्तिरूप होनेके कारण द्वैतके ही अन्तर्गत है । यदि वह सम्पूर्ण द्वैतकी निवृत्ति करके भी बना रहे तो उसकी निवृत्तिके लिये किसी अन्य वृत्तिकी अपेक्षा होगी और उसके लिये किसी तीसरीकी । इस प्रकार अनवस्था दोष उपस्थित हो जायगा और द्वैतकी निवृत्ति कभी न हो पावेगी । इसलिये निखिलद्वैतकी निवृत्ति