माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमांडू० भा० ] आगम-प्रकरण ३७
| रज्जुसर्पविवेकसमकाल इव रज्ज्वां सर्पनिवृत्तिफले सति रज्ज्यधिगमस्य । | कि रज्जु और सर्पका विवेक होनेके समानकालमें ही रज्जुमें सर्पनिवृत्ति-रूप फलकी प्राप्ति होते ही रज्जुका ज्ञान हो जाता है [उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये] । |
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| येषां पुनस्तमोऽपनयव्यतिरेकेण घटाधिगमे प्रमाणं व्यापार्यते तेषां छेद्यावयवसम्बन्धवियोग-व्यतिरेकेणान्यतरावयवेऽपि-च्छिदिक्रियाप्रियत इत्युक्तं स्यात् । | किन्तु जिनके मतमें घटज्ञानमें अन्धकारकी निवृत्तिके सिवा किसी और कार्यमें भी प्रमाणकी प्रवृत्ति होती है उनका तो मानों ऐसा कथन है कि छेद्य पदार्थोंके अवयवोंका सम्बन्धविच्छेद करनेके अतिरिक्त भी छेदनक्रियाका वस्तुके किसी एक अवयवमें कोई व्यापार होता है।* |
| यदा पुनर्घटतमसोर्विवेककरणे प्रवृत्तं प्रमाणमनुपादित्सिततमो-निवृत्तिफलावसानं छिदिरिव-च्छेद्यावयवसम्बन्धविवेककरणे प्रवृत्ता तदवयवद्वैधीभावफला- | छेद्य अवयवोंका सम्बन्धच्छेद करनेमें प्रवृत्त छेदनक्रिया जिस प्रकार उसके अवयवोंके विभक्त हो जानेमें समाप्त होनेवाली है उसी प्रकार जब कि घट और अन्धकारका पार्थक्य करनेमें प्रवृत्त प्रमाण अनिष्ट अन्धकारकी |
* तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अन्धकारमें रहते हुए घटका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये अन्धकारकी निवृत्तिमात्र ही आवश्यक है, अन्य किसी क्रियाकी अपेक्षा नहीं है उसी प्रकार तुरीयका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उसमें आरोपित अन्तःप्रज्ञत्वादिका निषेध ही कर्त्तव्य है। जो लोग घटज्ञानमें अन्धकार-निवृत्तिके सिवा उसके उत्पादक प्रमाणका कोई और व्यापार भी स्वीकार करते हैं वे मानों ऐसा कहते हैं कि छेदनक्रिया छेद्यपदार्थके अवयवोंका सम्बन्धच्छेद करनेके सिवा उसके किसी भी अवयवमें कोई अन्य कार्य भी कर देती है। परन्तु यह बात सर्वसम्मत है कि छेदनक्रियाका अवयवविश्लेषणके सिवा कोई अन्य व्यापार नहीं होता। इसीलिये उनका कथन माननीय नहीं है।
१. यदि प्रमाण अज्ञानका ही निवर्तक है तो विषयके स्फुरण होनेका तो