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माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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[ २ ]
| कारिकाप्रतीकानि | प्रकरणाङ्कः | कारिकाङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| अभूताभिनिवेशाद्धि | ४ | ७९ | २४८ |
| अभूताभिनिवेशोऽस्ति | ४ | ७५ | २४५ |
| अमात्रोऽनन्तमात्रश्च | १ | २९ | ६५ |
| अन्वग्धावरणाः सर्वे | ४ | ९८ | २६७ |
| अलाते स्पन्दमाने वै | ४ | ४९ | २२७ |
| अवस्त्वनुपलम्भं च | ४ | ८८ | २५७ |
| अव्यक्ता एव येऽन्तस्तु | २ | १५ | ८२ |
| अशक्तिरपरिज्ञानम् | ४ | १९ | १९४ |
| असज्जागरिते दृष्ट्वा | ४ | ३९ | २१७ |
| असतो मायया जन्म | ३ | २८ | १५३ |
| अस्ति नास्त्यस्ति नास्तीति | ४ | ८३ | २५१ |
| अस्पन्दमानमलातम् | ४ | ४८ | २२६ |
| अस्पर्शयोगो वै नाम | ३ | ३९ | १६७ |
| अस्पर्शयोगो वै नाम | ४ | २ | १८० |
| आत्मसत्यानुबोधेन | ३ | ३२ | १५६ |
| आत्मा ह्याकाशवज्जीवैः | ३ | ३ | ११२ |
| आदावन्ते च यन्नास्ति | ४ | ३१ | २१२ |
| आदावन्ते च यन्नास्ति | २ | ६ | ७२ |
| आदिबुद्धाः प्रकृत्यैव | ४ | ९२ | २६१ |
| आदिशान्ता ह्यनुत्पन्नाः | ४ | ९३ | २६२ |
| आश्रमास्त्रिविधा हीन० | ३ | १६ | १३५ |
| इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिः | १ | ८ | ३१ |
| उत्पादस्याप्रसिद्धत्वात् | ४ | ३८ | २१६ |
| उत्सेक उदधेर्यद्वत् | ३ | ४१ | १६९ |
| उपलम्भात्समाचारात् | ४ | ४२ | २२० |
| उपलम्भात्समाचारात् | ४ | ४४ | २२३ |
| उपायेन निगृह्णीयात् | ३ | ४२ | १७० |
| उपासनाश्रितो धर्मः | ३ | १ | १०८ |
| उभयोरपि वैतथ्यम् | २ | ११ | ७८ |
| उभे ह्यन्योन्यदृश्ये ते | ४ | ६७ | २३९ |
| ऋजुवक्रादिकाभासम् | ४ | ४७ | २२६ |
| एतैरेषोऽपृथग्भावैः | २ | ३० | ९१ |
| एवं न चित्तजा धर्माः | ४ | ५४ | २३० |
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[ ३ ]
| कारिकाप्रतीकानि | प्रकरणाङ्कः | कारिकाङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| एवं न जायते चित्तम् | ४ | ४६ | २२५ |
| ओङ्कारं पादशो विद्यात् | १ | २८ | ६२ |
| कल्पयत्यात्मनात्मानम् | २ | १२ | ७९ |
| कारणं यस्य वै कार्यम् | ४ | ११ | १८८ |
| कारणाद्यद्यनन्यत्वम् | ४ | १२ | १८९ |
| कार्यकारणबद्धौ तौ | १ | ११ | ४३ |
| काल इति कालविदः | २ | २४ | ८८ |
| कोट्यश्चतस्र एतास्तु | ४ | ८४ | २५३ |
| क्रमते न हि बुद्धस्य | ४ | ९९ | २६८ |
| ख्याप्यमानामजातिं तैः | ४ | ५ | १८३ |
| ग्रहणाज्जागरितवत् | ४ | ३७ | २१५ |
| ग्रहो न तत्र नोत्सर्गः | ३ | ३८ | १६५ |
| घटादिषु प्रलीनेषु | ३ | ४ | ११३ |
| चरञ्जागरिते जाग्रत् | ४ | ६५ | २३८ |
| चित्तं न संस्पृशत्यर्थम् | ४ | २६ | २०६ |
| चित्तकाला हि येऽन्तस्तु | २ | १४ | ८१ |
| चित्तस्पन्दितमेवेदम् | ४ | ७२ | २४२ |
| जरामरणनिर्मुक्ताः | ४ | १० | १८५ |
| जाग्रच्चित्तेक्षणीयास्ते | ४ | ६६ | २३८ |
| जाग्रद्वृत्तावपि त्वन्तः | २ | १० | ७७ |
| जात्याभासं चलाभासम् | ४ | ४५ | २२४ |
| जीवं कल्पयते पूर्वम् | २ | १६ | ८३ |
| जीवात्मनोः पृथक्त्वं यत् | ३ | १४ | १२८ |
| जीवात्मनोरनन्यत्वम् | ३ | १३ | १२७ |
| ज्ञाने च त्रिविधे ज्ञेये | ४ | ८९ | २५८ |
| ज्ञानेनाकाशकल्पेन | ४ | १ | १७८ |
| तत्त्वमाध्यात्मिकं दृष्ट्वा | २ | ३८ | १०६ |
| तस्मादेवं विदित्वैनम् | २ | ३६ | १०४ |
| तस्मान्न जायते चित्तम् | ४ | २८ | २०८ |
| तैजसस्योत्वविज्ञाने | १ | २० | ५८ |
| त्रिषु धामसु यत्तुल्यम् | १ | २२ | ५९ |
५. कारिकानुक्रमणिका (परिशिष्ट)
पृष्ठ 297स्थायी लिंक
[ ४ ]
कारिकाप्रतीकानि प्रकरणाङ्कः कारिकाङ्कः पृष्ठम्
त्रिषु धामसु यद्भोज्यम् ... १ ५ २६
दक्षिणाक्षिमुखे विश्वः ... १ २ २०
दुःखं सर्वमनुस्मृत्य ... ३ ४३ १७१
दुर्दर्शमतिगम्भीरम् ... ४ ७० २७०
द्रव्यं द्रव्यस्य हेतुः स्यात् ... ४ ५३ २३०
द्वयोर्द्वयोर्मधुज्ञाने ... ३ १२ १२६
द्वैतस्याग्रहणं तुल्यम् ... १ १३ ४५
धर्मा य इति जायन्ते ... ४ ५८ २३४
न कश्चिज्जायते जीवः ... ३ ४८ १७५
न कश्चिज्जायते जीवः ... ४ ७१ २४१
न निरोधो न चोत्पत्तिः ... २ ३२ ९४
न निर्गता अलातात्ते ... ४ ५० २२८
न निर्गतास्ते विज्ञानात् ... ४ ५२ २२९
न भवत्यमृतं मर्त्यम् ... ३ २१ १४१
न भवत्यमृतं मर्त्यम् ... ४ ७ १८४
न युक्तं दर्शनं गत्वा ... ४ ३४ २१३
नाकाशस्य घटाकाशः ... ३ ७ १२१
नाजेषु सर्वधर्मेषु ... ४ ६० २३६
नात्मभावेन नानेदम् ... २ ३४ १०१
नात्मानं न परं चैव ... १ १२ ४४
नास्त्यसद्धेतुकमसत् ... ४ ४० २१८
नास्वादयेत्सुखं तत्र ... ३ ४५ १७२
निःस्तुतिर्निर्नमस्कारः ... २ ३७ १०४
निगृहीतस्य मनसः ... ३ ३४ १५९
निमित्तं न सदा चित्तम् ... ४ २७ २०७
निवृत्तस्याप्रवृत्तस्य ... ४ ८० २४९
निवृत्तेः सर्वदुःखानाम् ... १ १० ४२
निश्चितायां यथा रज्ज्याम् ... २ १८ ८५
नेह नानेति चाम्नायात् ... ३ २४ १४५
पञ्चविंशक इत्येके ... २ २६ ८९
पादा इति पादविदः ... २ २१ ८७
पूर्वापरपरिज्ञानम् ... ४ २१ १९८
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[ ५ ]
| कारिकाप्रतीकानि | प्रकरणाङ्कः | कारिकाङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| प्रकृत्याकाशवज्ज्ञेयाः | ४ | ९१ | २६० |
| प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वम् | ४ | २४ | २०२ |
| प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वम् | ४ | २५ | २०४ |
| प्रणवं हीश्वरं विद्यात् | १ | २८ | ६५ |
| प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म | १ | २६ | ६३ |
| प्रपञ्चो यदि विद्येत | १ | १७ | ५० |
| प्रभवः सर्वभावानाम् | १ | ६ | २७ |
| प्राण इति प्राणविदः | २ | २० | ८७ |
| प्राणादिभिरनन्तैश्च | २ | १९ | ८६ |
| प्राप्य सर्वज्ञतां कृत्स्नाम् | ४ | ८५ | २५३ |
| फलादुत्पद्यमानः सन् | ४ | १७ | १९३ |
| बहिःप्रज्ञो विभुर्विश्वः | १ | १ | १९ |
| बीजाङ्कुरसमो दृष्टान्तः | ४ | २० | १९६ |
| बुद्ध्वा निमित्ततां सत्याम् | ४ | ७८ | २४८ |
| भावैरसद्भिरेवायम् | २ | ३३ | १०० |
| भूतं न जायते किञ्चित् | ४ | ४ | १८२ |
| भूतोऽभूतो वापि | ३ | २३ | १४४ |
| भूतस्य जातिमिच्छन्ति | ४ | ३ | १८१ |
| भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये | १ | ९ | ३१ |
| मकारभावे प्राज्ञस्य | १ | २१ | ५९ |
| मन इति मनोविदः | २ | २५ | ८९ |
| मनसो निग्रहायत्तम् | ३ | ४० | १६८ |
| मनोदृश्यमिदं द्वैतम् | ३ | ३१ | १५५ |
| मरणे सम्भवे चैव | ३ | ९ | १२४ |
| मायया भिद्यते ह्येतत् | ३ | १९ | १३९ |
| मित्राद्यैः सह संमन्त्र्य | ४ | ३५ | २१३ |
| मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः | ३ | १५ | १३२ |
| यं भावं दर्शयेच्चेत्यः | २ | २९ | ९० |
| यथा निर्मितको जीवः | ४ | ७० | २४१ |
| यथा भवति बालानाम् | ३ | ८ | १२२ |
| यथा मायामयाद्बीजात् | ४ | ५९ | २३५ |
| यथा मायामयो जीवः | ४ | ६९ | २४१ |
पृष्ठ 299स्थायी लिंक
| कारिकाप्रतीकानि | प्रकरणाङ्कः | कारिकाङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| यथा स्वप्नमयो जीवः | ४ | ६८ | २४० |
| यथा स्वप्ने द्वयाभासम् | ३ | २९ | १५३ |
| यथा स्वप्ने द्वयाभासम् | ४ | ६१ | २३६ |
| यथैकस्मिन्घटाकाशे | ३ | ५ | १२४ |
| यदा न लभते हेतून् | ४ | ७६ | २४५ |
| यदा न लीयते चित्तम् | ३ | ४६ | १७३ |
| यदि हेतोः फलात्सिद्धिः | ४ | १८ | १९४ |
| यावद्धेतुफलावेशः | ४ | ५६ | २३२ |
| यावद्धेतुफलावेशः | ४ | ५५ | २३१ |
| युञ्जीत प्रणवे चेतः | १ | २५ | ६३ |
| योऽस्ति कल्पितसंवृत्या | ४ | ७३ | २४३ |
| रसादयो हि ये कोशाः | ३ | ११ | १२५ |
| रूपकार्यसमाख्याश्च | ३ | ६ | १२० |
| लये संबोधयेच्चित्तम् | ३ | ४४ | १७१ |
| लीयते हि सुषुप्ते तत् | ३ | ३५ | १६० |
| लोकाँल्लोकविदः प्राहुः | २ | २७ | ८९ |
| विकरोत्यपरान्भावान् | २ | १३ | ७९ |
| विकल्पो विनिवर्तेत | १ | १८ | ५१ |
| विज्ञाने स्पन्दमाने वै | ४ | ५१ | २२८ |
| विपर्यासाद्यथा जाग्रत् | ४ | ४१ | २१९ |
| विप्राणां विनयो ह्येषः | ४ | ८६ | २५४ |
| विभूतिं प्रसवं त्वन्ये | १ | ७ | २९ |
| विश्वस्यात्वविवक्षायाम् | १ | १९ | ५७ |
| विश्वो हि स्थूलभुङ् नित्यम् | १ | ३ | २६ |
| वीतरागभयक्रोधैः | २ | ३५ | १०३ |
| वेदा इति वेदविदः | २ | २२ | ८८ |
| वैतथ्यं सर्वभावानाम् | २ | १ | ६७ |
| वैशारद्यं तु वै नास्ति | ४ | ९४ | २६३ |
| स एष नेति नेतीति | ३ | २६ | १५० |
| संघाताः स्वप्नवत्सर्वे | ३ | १० | १२४ |
| सम्भवे हेतुफलयोः | ४ | १६ | १९२ |
| सम्भूतेरपवादाच्च | ३ | २५ | १४७ |
पृष्ठ 300स्थायी लिंक
$ \begin{array}{c} [ ७ ] \end{array} $
| कारिकाप्रतीकानि | प्रकरणाङ्कः | कारिकाङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| संवृत्या जायते सर्वम् | ४ | ५७ | २३३ |
| सतो हि मायया जन्म | ३ | २७ | १५१ |
| सप्रयोजनता तेषाम् | २ | ७ | ७३ |
| सप्रयोजनता तेषाम् | ४ | ३२ | २१३ |
| सर्वस्य प्रणवो ह्यादिः | १ | २७ | ६४ |
| सर्वाभिलापविगतः | ३ | ३७ | १६३ |
| सर्वे धर्मा मृषा स्वप्ने | ४ | ३३ | २१२ |
| सदस्तु सोपलम्भं न | ४ | ८७ | २५६ |
| सांसिद्धिकी स्वाभाविकी | ४ | ९ | १८५ |
| सुखमाव्रियते नित्यम् | ४ | ८२ | २५० |
| सूक्ष्म इति सूक्ष्मविदः | २ | २३ | ८८ |
| सृष्टिरीति सृष्टिविदः | २ | २८ | ८९ |
| स्थूलं तर्पयते विश्वम् | १ | ४ | २६ |
| स्वतो वा परतो वापि | ४ | २२ | १९९ |
| स्वप्नजागरितस्थाने | २ | ५ | ७१ |
| स्वप्नदृक्प्रचरन्स्वप्ने | ४ | ६४ | २३८ |
| स्वप्नदृक्प्रचरन्स्वप्ने | ४ | ६३ | २३७ |
| स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौ | १ | १४ | ४६ |
| स्वप्नमाये यथा दृष्टे | २ | ३१ | ९३ |
| स्वप्नवृत्तावपि त्वन्तः | २ | ९ | ७६ |
| स्वप्ने चावस्तुकः कायः | ४ | ३६ | २१४ |
| स्वभावेनामृतो यस्य | ३ | २२ | १४२ |
| स्वभावेनामृतो यस्य | ४ | ८ | १८४ |
| स्वसिद्धान्तव्यवस्थासु | ३ | १७ | १३७ |
| स्वस्थं शान्तं सुनिर्वाणम् | ३ | ४७ | १७४ |
| हेतोः फलं फलं येषाम् | ४ | १४ | १९१ |
| हेतोः फलं फलं येषाम् | ४ | १५ | १९२ |
| हेतोर्न जायतेऽनादिः | ४ | २३ | २०१ |
| हेयोपायावबोद्धव्यानि | ४ | ९० | २५९ |
❦ ❧
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श्रीहरिः
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
| मन्त्रप्रतीकानि | मन्त्राङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|
| अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः | १२ | ६० |
| एष सर्वेश्वरः | ६ | १८ |
| ओमित्येतदक्षरमिद ँ सर्वम् | १ | ६ |
| जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः | ३ | १० |
| जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः | ९ | ५३ |
| नान्तःप्रज्ञम् | ७ | ३५ |
| यत्र सुप्तः | ५ | १५ |
| सर्वं ह्येतद् | २ | ८ |
| सुषुप्तस्थानः | ११ | ५६ |
| सोऽयमात्मा | ८ | ५२ |
| स्वप्नस्थानस्तैजसः | १० | ५४ |
| स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः | ४ | १३ |