मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 106, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंउठ जायेगा ।
मनुवा तो पंछी भया, उड़ि के चला अकास ।
ऊपर ही ते गिर पड़ा, फिरि माया के पास ॥
यह मन तो पंछी की तरह है, जो कभी अच्छा बनकर आकाश में ऊँचा चला जाता है, पर दूसरे ही क्षण फिर नीचे आकर माया में लिपट जाता है.....गन्दा हो जाता है ।
जेती लहर समुद्र की, तेती मन की दौर ।
सहजै हीरा नीपजै, जो मन आवै ठौर ॥
जितनी समुद्र में लहरे हैं, उतनी ही मन में इच्छाएँ हैं । बहुत ही चंचल है यह मन । यदि इच्छाएँ समाप्त होकर यह मन शान्त हो जाए तो आत्म-ज्ञान रूपी हीरा सहज ही प्राप्त हो जाए ।
पहिले यह मन काग था, करता जीवन घात ।
अब तो मन हँसा भया, मोती चुनि चुनि खात ॥
गुरु का नाम मिलने से पहले तो यह मन कौवे की तरह था.....अन्य जीवों को मारता फिरता था, पर अब यह कौवे से हँस बन गया है.....ज्ञान रूपी मोती चुन-चुन कर खाता है ।
बिना सीस का मिरग है, चहुँ दिशि चरने जाय ।
बाँधि लगाओ गुरु ज्ञानसों, राखो तत्व समाय ॥
यह मन बिना सिर का पशु है, जो चारों ओर विषय-विकारों की घास चरता रहता है । इसे गुरु ज्ञान की रस्सी से बाँध कर नाम रूपी तत्व में लीन कर दो ।
धरती फाटै मेघ मिलै, कपड़ा फाटै डौर ।
तन फाटै को औषधी, मन फाटै नहिं ठौर ॥
धरती फट जाए तो जल बरसने से मिल जाती है, कपड़ा फट जाए तो धागे से मिला लिया जाता है, तन फट जाए तो औषध से ठीक हो जाता है, पर यदि मन फट जाए तब कोई रास्ता नहीं है.....फिर नहीं